जिस तरह से पिछले तीन चार दिन से कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा की टीम फिल्म दिल बेचारा को लेकर रिलीज पर रिलीज भेजे जा रही है, उसे मेल के इनबॉक्स में देखकर बुरा लगता है। बुरा ये भी लगता है कि सुशांत सिंह राजपूत की ये फिल्म कम से कम समीक्षकों को तो देखनी ही होगी, ये देखने के लिए कि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान सुशांत का दिल आखिर इतना कैसे दरक गया कि बेचारे को अपनी जान ही लेनी पड़ गई।

बच्चे जब भी अपने माता पिता से कहानियां सुनाने की जिद करते हैं तो बेचारा थके हारे मां बाप झुंझलाहट में कभी कभी कह देते हैं, एक था राजा, एक थी रानी, दोनों मर गए खत्म कहानी। लेकिन जिन्होंने अपना बचपन दादी और नानी के साथ बिताया है, वे जानते हैं कि दादी हों या नानी, उनकी कहानी बच्चों के लिए कभी एक लाइन की और ऐसी दुखांत कतई नहीं होतीं। दादी का राजकुमार लड़ाई जीतता ही है। नानी की राजकुमारी एक दिन रानी बनती ही है। दुख ये है कि ये ट्रेलर इसी लाइन से शुरू होता है और ये भी बताता है कि आज के लेखक अपनी जड़ों से कितना ऊपर निकल गए हैं। पता नहीं खार, बांद्रा और जूहू के एसी बंगलों या ऊंची इमारतों से वे नीचे देखते भी हैं कि नहीं।