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ज़मीन का मिलेगा मुँह माँगा दाम! हाईकोर्ट ने सुनाया वो फ़ैसला, जो हर ज़मीन मालिक के चेहरे पर ला देगा मुस्कान

अगर सरकार आपकी ज़मीन किसी प्रोजेक्ट के लिए लेती है,तो अब वह आपको कौड़ियों के भाव मुआवज़ा देकर पल्ला नहीं झाड़ सकती। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसा ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया है,जो भविष्य में उन सभी लोगों के लिए एक मिसाल बनेगा जिनकी ज़मीन सरकार अधिग्रहीत करती है। कोर्ट ने साफ़ कहा है कि ज़मीन के मालिक को उस समय के सबसे ऊँचे बाज़ार भाव (Highest Market Value)पर मुआवज़ा पाने का पूरा हक़ है।क्या है एक आम आदमी की जीत की यह पूरी कहानी?यह पूरा मामला मिर्ज़ापुर के नटवां गाँव के रहने वाले रूप नारायण और कुछ अन्य लोगों का है। कई साल पहले,उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड ने एक सब-स्टेशन बनाने के लिए उनकी6बीघा2बिस्वा ज़मीन ले ली थी। इसके बदले में,कलेक्टर ने28सितंबर1993को मुआवज़े के तौर पर सिर्फ़₹26,624प्रति बीघा की रक़म तय की,जो ऊँट के मुँह में जीरे के बराबर थी। इसके अलावा घर,कुएँ और पेड़ों के लिए भी कुछ मामूली रक़म तय की गई।रूप नारायण जी इस मामूली मुआवज़े से ख़ुश नहीं थे और उन्होंने इस फ़ैसले को चुनौती दी। पहले निचली अदालत (विशेष न्यायाधीश,मिर्ज़ापुर) में उनकी बात नहीं सुनी गई और पुराने मुआवज़े को ही सही ठहरा दिया गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।हाईकोर्ट ने कैसे बदला पूरा खेल?हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया कि किसी भी ज़मीन का मुआवज़ा उस समय के सबसे ऊँचे बाज़ार भाव के हिसाब से मिलना चाहिए।कोर्ट ने दिखाया रास्ता:हाईकोर्ट ने साफ़ शब्दों में कहा कि ज़मीन के मालिक को उसकी ज़मीन का सबसे अच्छा दाम मिलना चाहिए। कोर्ट ने पता लगाया कि जिस समय रूप नारायण जी की ज़मीन ली गई थी,ठीक उसी समय पास में ही एक और ज़मीन₹34,125प्रति बिस्वा के हिसाब से बिकी थी।एक ज़रूरी नियम:अब चूँकि वह बिकी हुई ज़मीन सिर्फ़ चार बिस्वा यानी एक छोटा टुकड़ा थी,और रूप नारायण की ज़मीन उससे काफ़ी बड़ी थी,इसलिए कोर्ट ने एक नियम का इस्तेमाल किया (‘हॉरमल बनाम हरियाणा राज्य’केस)। इस नियम के मुताबिक,अगर एक छोटे प्लॉट के आधार पर बड़े प्लॉट की क़ीमत तय की जाती है,तो उसमें50%तक की कटौती की जा सकती है ताकि सही बाज़ार मूल्य निकल सके।मिला हक़ का पैसा:इसी आधार पर,कोर्ट ने50%की कटौती के बाद मुआवज़े की नई दर₹17,062.50 प्रति बिस्वातय की। यह रक़म पहले मिल रहे मुआवज़े से कई गुना ज़्यादा है।हाईकोर्ट का यह फ़ैसला उन सभी ज़मीन मालिकों के लिए एक बड़ी जीत है,जिनकी ज़मीन विकास परियोजनाओं के लिए ली जाती है। यह सुनिश्चित करता है कि उन्हें उनकी संपत्ति का सही और सम्मानजनक मूल्य मिले।