
News India Live, Digital Desk : भारत में आरक्षण (Reservation) एक ऐसा मुद्दा है जिस पर अगर हल्की सी भी चिंगारी पड़े, तो आग लगते देर नहीं लगती। हाल ही में, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई के एक बयान ने इसी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। उन्होंने अपने मन की बात रखते हुए उस दर्द को साझा किया, जो उन्हें एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद मिला।मामला है आरक्षण के अंदर ‘क्रीमी लेयर’ (Creamy Layer) लागू करने का।क्या है यह ‘क्रीमी लेयर’ का पेंच?सीधे शब्दों में कहें तो ‘क्रीमी लेयर’ का मतलब है कि आरक्षित वर्ग के वे लोग जो अब अमीर हो चुके हैं, बड़े पदों पर हैं या संपन्न हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ छोड़ देना चाहिए ताकि उसी वर्ग के गरीब लोगों को मौका मिले। जस्टिस गवई ने इसी बात का समर्थन किया था। उनका मानना था कि आरक्षण का मकसद समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को उठाना है, न कि उसे जो पहले से मज़बूत है।लेकिन, जैसे ही उन्होंने यह बात कही, विवाद खड़ा हो गया।”मुझे कोसा गया, आलोचना हुई”जस्टिस गवई, जो खुद दलित समुदाय से आते हैं और डॉक्टर बी.आर. अंबेडकर की विचारधारा को मानते हैं, उन्होंने भावुक होते हुए बताया कि कैसे इस फैसले के बाद उनके अपने ही समाज के लोगों ने उनकी कड़ी आलोचना की। यह किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता जब वह समाज की भलाई की बात करे और समाज उसे ही “गद्दार” या “विरोधी” समझने लगे।उन्होंने एक बहुत ही तार्किक सवाल उठाया: “क्या एक IAS या IPS अधिकारी के बच्चे, जो अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं, और एक गांव के गरीब दलित के बच्चे के बीच तुलना हो सकती है?”असल मुद्दा: सुविधा बनाम संघर्षजस्टिस गवई का इशारा साफ़ था जो लोग आरक्षण की सीढ़ी चढ़कर ऊपर पहुंच चुके हैं, अगर वे ही इसका फायदा लेते रहेंगे, तो गांव में रहने वाला वो बच्चा, जिसके पास न ढंग का स्कूल है न किताबें, वो कब आगे बढ़ेगा?उनका यह दर्द और बयान सिर्फ़ एक जज का नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का है जो चाहता है कि फायदा असली हकदार तक पहुंचे। हालांकि, समाज का एक तबका इसे ‘दलितों को बांटने’ की साजिश के तौर पर देखता है। बहस जारी है, लेकिन पूर्व सीजेआई की बातों ने यह सोचने पर तो मजबूर कर दिया है कि क्या अब आरक्षण के ढांचे में बदलाव का वक्त आ गया है?यह मामला सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि भावनाओं और सामाजिक न्याय की उलझनों का है।
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