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जब कंधा देने बेटा नहीं आया, तो 4 बेटियों ने रच दिया इतिहास… झांसी की इन बेटियों को हर कोई कर रहा है सलाम

बेटियां बेटों से कम होती हैं… सदियों से हमारे समाज में चली आ रही इस खोखली सोच पर झांसी की चार बेटियों ने ऐसा तमाचा जड़ा है,जिसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई दे रही है। उन्होंने जो किया,उसे करने के लिए हिम्मत और अपने पिता के लिए बेशुमार प्यार चाहिए।यह कहानी है झांसी के गोपाल दास जी की,जिनका लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। जब उनकी अंतिम यात्रा की तैयारी हुई,तो हर किसी की निगाहें एक सवाल ढूंढ रही थीं – अर्थी को कंधा कौन देगा?मुखाग्नि कौन देगा?उनका बेटा वहां नहीं था। ऐसे में,जब समाज शायद यह सोच रहा था कि अब क्या होगा,तब गोपाल दास जी की चारों बेटियां – नैंसी,प्रीति,ऋचा और कंचन – आगे आईं।आंसुओं को पीकर,निभाई बेटे की हर रस्मइन चारों बेटियों ने उन सारी रूढ़ियों और परंपराओं को तोड़ दिया,जो कहती हैं कि यह काम सिर्फ एक बेटे का है।उन्होंने मिलकर अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया और उसे श्मशान घाट तक ले गईं।श्मशान घाट पर भी,बेटों की तरह उन्होंने ही सारे रीति-रिवाज पूरे किए।और अंत में,उनकी सबसे बड़ी बेटी ने कांपते हाथों से,लेकिन फौलादी इरादों के साथ,अपने पिता की चिता को मुखाग्नि दी।उस वक्त वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं। यह आंसू सिर्फ एक पिता के जाने का गम नहीं थे,बल्कि उन बेटियों के साहस और प्रेम को देखकर भी थे,जिन्होंने सचमुच ‘बेटा-बेटी एक समान’होने का सबसे बड़ा और सबसेpoignantउदाहरण पेश किया था।यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं था। यह एक संदेश था,उन सभी लोगों के लिए जो आज भी बेटियों को बेटों से कम आंकते हैं। झांसी की इन बेटियों ने साबित कर दिया कि एक पिता की असली विरासत उसके बेटे नहीं,बल्कि उसकी वह संतान होती है जो अंतिम समय में उसका साथ निभाए,चाहे वह बेटी हो या बेटा।आज पूरे झांसी में इन चार बेटियों के साहस की चर्चा हो रही है। हर कोई यही कह रहा है – काश,ऐसी बेटियां हर किसी को मिलें।