
News India Live, Digital Desk : इंटरनेशनल पॉलिटिक्स को लेकर हम अक्सर यही सोचते हैं कि दो देशों के बीच जो कुछ भी होता है, वो समझौतों और फाइलों पर टिका होता है। लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि दुनिया के दो सबसे बड़े नेताओं के बीच के रिश्ते किसी पुरस्कार की वजह से भी खराब हो सकते हैं? मशहूर राजनीति विज्ञानी (Political Scientist) फ्रांसिस फुकुयामा का ताज़ा दावा कुछ ऐसा ही है, जिसे सुनकर कोई भी हैरान रह जाए।फुकुयामा का कहना है कि डोनल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच की केमिस्ट्री में जो कड़वाहट आई थी, उसके पीछे कोई बड़ा आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ (Nobel Peace Prize) की इच्छा थी।मामला क्या है?दरअसल, ट्रंप को लगता था कि उन्होंने दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए जो बड़े काम किए (जैसे अब्राहम एकॉर्ड या नॉर्थ कोरिया के साथ बातचीत), उनके लिए उन्हें नोबेल मिलना चाहिए। फुकुयामा के अनुसार, ट्रंप चाहते थे कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी उनके नाम का समर्थन करें या उनकी दावेदारी को मजबूती दें। लेकिन जब मोदी की तरफ से उस स्तर का सपोर्ट नहीं मिला जैसा ट्रंप उम्मीद कर रहे थे, तो बात ‘इगो’ पर आ गई।क्या ये सिर्फ एक नाराज़गी थी या कुछ और?मज़े की बात ये है कि हम सबने टीवी पर ‘नमस्ते ट्रंप’ और ‘हाउडी मोदी’ जैसे बड़े इवेंट्स देखे थे। बाहर से देखने में लग रहा था कि दोनों देशों की दोस्ती की नई इबारत लिखी जा रही है। लेकिन फुकुयामा कहते हैं कि परदे के पीछे सब कुछ ठीक नहीं था। ट्रंप का स्वभाव हम सब जानते हैं; उन्हें ‘वैलिडेशन’ और तारीफ बहुत पसंद है। ऐसे में जब पीएम मोदी ने नोबेल वाले मामले में चुप्पी साधे रखी, तो ट्रंप के मन में एक टीस रह गई, जिसका असर बाद में भारत और अमेरिका के डिप्लोमैटिक रिश्तों पर भी दिखा।इंसानी जज्बात और वैश्विक राजनीतिये कहानी हमें ये भी सिखाती है कि दुनिया के बड़े-बड़े फैसले लेने वाले लोग भी आखिरकार इंसान ही हैं। उनके भी अपने सपने, अपना मान-सम्मान और अपनी असुरक्षाएं होती हैं। अगर फुकुयामा की बात में ज़रा भी दम है, तो ये बड़ी अजीब बात है कि दो देशों की किस्मत एक छोटे से व्यक्तिगत लगाव या उम्मीद पर टिकी हो सकती है।हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स का यह भी मानना है कि ये सिर्फ एक कयास हो सकता है। क्योंकि भारत-अमेरिका के रिश्ते किसी एक व्यक्ति की चाहत से बहुत बड़े हैं। व्यापार से लेकर डिफेंस तक, हमारी रणनीतिक जरूरतें हमें साथ जोड़ती हैं।भारत का रुख हमेशा सधा हुआ रहापीएम मोदी ने हमेशा भारत के हितों को ऊपर रखा है। भारत ने कूटनीति के मंच पर किसी देश के साथ ‘दबाव’ में आकर फैसला नहीं लिया, बल्कि अपनी गरिमा बनाए रखी। शायद यही बात ट्रंप को खली हो।बहरहाल, फ्रांसिस फुकुयामा का ये दावा एक बार फिर चाय की टेबल पर चर्चा का विषय बन गया है। आप क्या सोचते हैं? क्या सच में नोबेल पुरस्कार इतना बड़ा हो गया था कि उसने रिश्तों पर पानी फेर दिया?
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