
News India Live, Digital Desk: पौष मास की पुत्रदा एकादशी का हिंदू धर्म में बहुत खास महत्व है. माना जाता है कि जो दंपत्ति निःसंतान होते हैं, वे संतान, खासकर पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए इस व्रत को पूरे श्रद्धाभाव से रखते हैं. इस एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है. इस साल 2025 में पौष पुत्रदा एकादशी29 दिसंबर, रविवार को पड़ रही है.पुत्रदा एकादशी 2025: शुभ मुहूर्तएकादशी तिथि का प्रारंभ: 28 दिसंबर 2025, शनिवार की रात 11 बजकर 27 मिनट परएकादशी तिथि का समापन: 29 दिसंबर 2025, रविवार की रात 08 बजकर 28 मिनट परपारण का शुभ समय: 30 दिसंबर 2025, सोमवार की सुबह 07 बजकर 12 मिनट से सुबह 09 बजकर 17 मिनट तकपूजा विधि:पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने वाले दंपत्ति को कुछ विशेष नियमों का पालन करना चाहिए:पूजा-अर्चना: भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें. उन्हें गंगाजल से स्नान कराएं, फिर चंदन, हल्दी, अक्षत, धूप, दीप, फूल, तुलसी दल और नैवेद्य (फलों और मिठाइयों का भोग) अर्पित करें. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें.कथा श्रवण: एकादशी की व्रत कथा जरूर सुनें या पढ़ें.जागरण और दान: रात्रि में जागरण कर भगवान विष्णु के भजन करें. अगले दिन द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें, इसके बाद ही व्रत का पारण करें.पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा:पौराणिक कथा के अनुसार, भद्रावती नगरी में राजा सुकेतु शासन करते थे. उनके पास सब कुछ था, लेकिन कोई संतान नहीं थी, जिसकी वजह से वे बहुत दुखी रहते थे. राजा की पत्नी शैब्या भी पुत्र न होने के कारण हमेशा चिंतित रहती थीं. उन्होंने अपने दुख के निवारण के लिए कई तीर्थ यात्राएं कीं और तपस्या भी की, लेकिन कोई फल नहीं मिला.एक दिन, वे अपने घोड़े पर सवार होकर शिकार के लिए जंगल गए. दोपहर के समय वे प्यास बुझाने के लिए एक आश्रम में पहुंचे. वहाँ उन्होंने लोमेश मुनि को देखा, जो तपस्या कर रहे थे. राजा ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाई. लोमेश मुनि ने राजा को बताया कि पौष माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘पुत्रदा एकादशी’ के नाम से जाना जाता है. उन्होंने राजा और रानी को यह व्रत रखने की सलाह दी.मुनि की आज्ञा मानकर राजा सुकेतु और रानी शैब्या ने श्रद्धापूर्वक पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा. उन्होंने पूरी विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की और नियमों का पालन किया. व्रत के प्रभाव से कुछ समय बाद रानी शैब्या गर्भवती हुईं और उन्होंने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया. राजा सुकेतु और रानी शैब्या बहुत प्रसन्न हुए और तब से उन्होंने इस व्रत के महत्व का प्रचार-प्रसार किया.इसलिए, पुत्रदा एकादशी का व्रत संतानहीन दंपतियों के लिए बेहद फलदायी माना जाता है.
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