
अयोध्या। राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की करोड़ों की चोरी के महाघोटाले के बाद अब ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के प्रशासनिक ढांचे को पूरी तरह बदलने की सुगबुगाहट बेहद तेज हो गई है। पूर्व महासचिव चंपत राय और सीनियर ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र के अचानक हुए इस्तीफों ने इस चर्चा को और हवा दे दी है। बिमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के निधन के बाद से एक ट्रस्टी का पद पहले से ही खाली चल रहा था, और अब इन दो बड़े इस्तीफों के बाद ट्रस्ट के तीन सबसे महत्वपूर्ण पद पूरी तरह रिक्त हो जाएंगे। राजनीतिक और कानूनी गलियारों में माना जा रहा है कि ऐसी गंभीर स्थिति में वर्तमान ट्रस्ट को भंग कर सरकार द्वारा इसके संपूर्ण पुनर्गठन (Reconstitution) का बड़ा फैसला लिया जा सकता है।
तिरुपति और वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तर्ज पर आ सकता है नया CEO
फरवरी 2020 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद इस ट्रस्ट का गठन किया था। ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास रहे, जबकि रोजाना का प्रशासनिक संचालन और वित्तीय फैसले चंपत राय व अनिल मिश्र ही संभालते थे। अब इन दोनों के हटने से ट्रस्ट का संतुलन पूरी तरह प्रभावित होना तय है। वर्तमान में राम मंदिर में रोजाना आने वाले करोड़ों के चढ़ावे, लाखों श्रद्धालुओं के प्रबंधन, हाई-टेक सुरक्षा, खरीद-बिक्री और मानव संसाधन (HR) जैसे कार्य इतने विशाल हो चुके हैं कि अब एक पूरी तरह पारदर्शी और पेशेवर (Professional) सिस्टम की जरूरत महसूस हो रही है। सूत्रों के मुताबिक, नए पुनर्गठन के बाद अब तिरुपति बालाजी और माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तर्ज पर अयोध्या में भी प्रशासनिक अनुभव वाले एक ‘मुख्य कार्यकारी अधिकारी’ (CEO) की तैनाती की जा सकती है।
क्या मौजूदा राम मंदिर ट्रस्ट को भंग करना इतना आसान होगा?
इस पूरे कानूनी पहलू पर विधि मामलों के प्रख्यात जानकार और अधिवक्ता दीनबंधु चौबे का कहना है कि चूंकि इस ट्रस्ट का गठन सीधे केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के आदेश के अनुपालन में किया था, इसलिए इसे भंग करना या इसकी जगह कोई नया बोर्ड बनाना महज एक साधारण प्रशासनिक फैसला नहीं हो सकता। इसके लिए केंद्र सरकार को पूरी वैधानिक और विधिक प्रक्रिया से गुजरना होगा। आवश्यकता पड़ने पर सरकार को संसद के जरिए या नई अधिसूचना (Notification) और कड़े वैधानिक प्रावधानों को लागू कर एक नया कानून बनाना पड़ सकता है।
बैंक की घोर लापरवाही उजागर- बिना किसी स्थायी स्टाफ के हो रही थी करोड़ों की गिनती!
इस महाघोटाले की पुलिसिया तफ्तीश में अब संबंधित बैंक की एक बहुत बड़ी और घोर लापरवाही सामने आ रही है। जांच में पता चला है कि प्रतिदिन मिलने वाले 20 से 25 लाख रुपये के दान की गिनती करने के लिए बैंक ने अपना एक भी स्थायी कर्मचारी (Permanent Staff) वहां तैनात नहीं किया था। बैंक ने सारा काम ट्रस्ट के जरिए आए उन अस्थाई कर्मियों के भरोसे छोड़ रखा था, जिन्हें खुद बैंक ही वेतन (Salary) दे रहा था। बैंक अधिकारी सिर्फ बीच-बीच में जायजा लेने आते थे।
जबकि, नियम के मुताबिक दान पेटिकाओं की दो चाबियां होती हैं— एक ट्रस्ट के पास और दूसरी बैंक के पास। दोनों चाबियां साथ लगने पर ही पेटिकाएं स्ट्रॉन्ग रूम में खोली जाती थीं। गिनती के बाद बकायदा तीन प्रतियों (रसीद) पर हस्ताक्षर होते थे, जिसमें से एक प्रति बैंक कर्मी, दूसरी बैंक और तीसरी ट्रस्ट को मिलती थी। इतनी पुख्ता कागजी व्यवस्था के बावजूद बैंक ने ऑन-ग्राउंड मॉनिटरिंग में भारी ढिलाई बरती, जिसका फायदा उठाकर चोरों ने मोटी रकम पार कर दी।
पदाधिकारियों की सिफारिश पर रखे गए थे कर्मी, ड्राइवर टिन्नू का भतीजा भी निकला चोर
जांच में यह भी चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि चोरी में शामिल अधिकतर कर्मियों को मंदिर ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों की सिफारिश पर ही बैंक ने इस काम में लगाया था। साल 2016 में बैंक से रिटायर हो चुके सुभाष श्रीवास्तव को नोटों की गिनती के समय ‘सुपरविजन’ (पर्यवेक्षण) की मुख्य जिम्मेदारी दी गई थी। वह पिछले 5 साल से बिना किसी सैलरी के मंदिर में मुफ्त सेवा दे रहे थे, लेकिन उन्होंने भी इस बेहद संवेदनशील काम की निगरानी में भारी लापरवाही बरती।
इसके अलावा, पकड़े गए आरोपियों में शामिल स्वर्गद्वार निवासी मनीष यादव महज दो महीने पहले ही काम पर लगा था, लेकिन वह भी इस गबन के खेल में शामिल हो गया। जांच में सामने आया है कि मनीष यादव कोई और नहीं, बल्कि बैंक के पर्यवेक्षणीय कार्यों में सीधा दखल रखने वाले चंपत राय के रसूखदार ड्राइवर टिन्नू यादव का सगा भतीजा है!
निगरानी छोड़कर ट्रस्ट के काम में व्यस्त रहते थे आरएमओ (RMO), सिपाही करते थे कैमरे की चेकिंग
इस महाचोरी को अंजाम देने में सुरक्षा और सर्विलांस सिस्टम की ढिलाई का भी पूरा फायदा उठाया गया। राम मंदिर परिसर में दो बड़े कंट्रोल रूम स्थापित हैं, जहां गिनती वाले हॉल के कैमरों की चौबीसों घंटे लाइव निगरानी करने की जिम्मेदारी आरएमओ (RMO) अर्जुन देव की थी। लेकिन सूत्रों के अनुसार, आरएमओ सुरक्षा कैमरों की लाइव मॉनिटरिंग कराने के बजाय मंदिर ट्रस्ट के रोजमर्रा के मैनेजमेंट और अन्य प्रबंधन कार्यों में ज्यादा सक्रिय रहते थे। सीसीटीवी (CCTV) स्क्रीन पर नजर रखने का यह अति-संवेदनशील काम सिर्फ गैर-जनपद से आए कुछ सिपाहियों के भरोसे छोड़ दिया गया था। फिलहाल पुलिस और एसआईटी आरएमओ की भूमिका की भी गहनता से जांच कर रही है।
दूसरी ओर, पुलिस अधिकारियों का दावा है कि श्रद्धालुओं द्वारा सीधे काउंटर पर ट्रस्ट को दान की गई कीमती वस्तुएं, आभूषण और सीधी नकदी पूरी तरह सुरक्षित हैं और चोरी सिर्फ दान पेटिकाओं (डोनेशन बॉक्स) के कैश से हुई है। हालांकि, निर्माण कार्य के दौरान दिए गए बड़े-बड़े ठेकों (Contracts) में हुई वित्तीय अनियमितताओं के सवाल पर अधिकारी मौन साधे हुए हैं और इसे अपने जांच दायरे से बाहर का मुद्दा बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं।
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