Shah Rukh Khan Kashmir Story: पूरी दुनिया घूमी पर दशकों तक कश्मीर जाने से क्यों बचते रहे शाहरुख खान

Shah Rukh Khan Kashmir Story: पूरी दुनिया घूमी पर दशकों तक कश्मीर जाने से क्यों बचते रहे शाहरुख खान

बॉलीवुड के 'बादशाह' शाहरुख खान ने अपने तीन दशकों से अधिक के शानदार सिनेमाई करियर में शोहरत, दौलत और कामयाबी के वे शिखर छुए हैं जिनका ख्वाब दुनिया का हर इंसान देखता है। सिल्वर स्क्रीन पर बाहें फैलाकर दुनिया भर के करोड़ों दिलों पर राज करने वाले शाहरुख खान को जब भी अपने संघर्ष, माता-पिता और बचपन के दिनों को याद करने का मौका मिलता है, तो उनकी आंखों में वही पुराना भावुक और मासूम बेटा नजर आने लगता है। शाहरुख खान ने दुनिया का शायद ही कोई ऐसा कोना छोड़ा हो जहां उन्होंने अपनी फिल्मों की शूटिंग न की हो या छुट्टियां न बिताई हों—चाहे वो स्विट्जरलैंड की बर्फबारी हो, लंदन की गलियां हों, पेरिस के स्मारक हों या अमेरिका के शहर। किंतु एक ऐसा बेहद खूबसूरत और जन्नत जैसा कोना था जहां जाने से शाहरुख खान ने अपनी जिंदगी के कई दशक तक खुद को रोके रखा, और वह जगह थी भारत का स्वर्ग यानी 'कश्मीर'। दुनिया भर के टूरिस्ट डेस्टिनेशंस पर सैकड़ों बार जाने वाले किंग खान आखिर अपने ही मुल्क के सबसे खूबसूरत हिस्से कश्मीर में जाने से क्यों कतराते रहे? इस रहस्य के पीछे किसी डर या व्यस्तता का हाथ नहीं था, बल्कि इसके पीछे छिपा था एक मासूम बेटे का अपने दिवंगत वालिद (पिता) से किया गया एक बेहद भावुक और अटूट वादा।

'रोम, इस्तांबुल और कश्मीर...': जब वालिद ने दी थी जिंदगी की सबसे खूबसूरत नसीहत

शाहरुख खान के पिता मीर ताज मोहम्मद खान एक स्वतंत्रता सेनानी, उच्च शिक्षित और बेहद जिंदादिल इंसान थे। जब शाहरुख बहुत छोटे थे और दिल्ली के राजेंद्र नगर में अपने परिवार के साथ रहा करते थे, तब उनके पिता अक्सर उनसे दुनिया, संस्कृति और इंसानी जज्बातों पर गहरी बातें किया करते थे। शाहरुख ने एक इंटरव्यू के दौरान अपने पिता के साथ हुई उस यादगार बातचीत को याद करते हुए बताया था कि उनके वालिद ने उनसे कहा था—"बेटा, जिंदगी में जब भी मौका मिले, दुनिया की तीन जगहें जरूर देखना। पहली रोम (इटली), दूसरी इस्तांबुल (तुर्की) और तीसरा हमारा अपना कश्मीर। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना, इन तीनों जगहों को कभी भी अकेले या बिना अपनों के मत देखना। अगर जिंदगी में इन जगहों पर जाना, तो सिर्फ उसके साथ जाना जिससे तुम बेइंतहा मोहब्बत करते हो, क्योंकि इन शहरों और वादियों की असली खूबसूरती केवल प्यार करने वाले की नजरों से ही महसूस की जा सकती है।" पिता ने न सिर्फ यह नसीहत दी, बल्कि नन्हे शाहरुख के सिर पर हाथ रखकर यह वादा भी किया था कि वे खुद अपने बेटे की उंगली पकड़कर उसे कश्मीर की हसीन वादियों की सैर कराने ले जाएंगे।

अचानक उजड़ गया बचपन: पिता का इंतकाल और सीने में चुभती टूटी ख्वाहिश

नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। शाहरुख खान अभी महज 15 वर्ष के किशोर ही थे कि उनके पिता मीर ताज मोहम्मद खान कैंसर जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी की चपेट में आ गए। इलाज के तमाम प्रयासों और संघर्षों के बावजूद उनके पिता का असमय निधन हो गया। पिता के अचानक चले जाने से पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और युवा शाहरुख के दिल में पिता के साथ कश्मीर जाने का वह सपना हमेशा के लिए अधूरा रह गया।

पिता के इंतकाल के बाद शाहरुख ने अपने दिल में एक सख्त और भावुक गांठ बांध ली। उन्होंने खुद से यह तय कर लिया कि जिस जगह को उनके पिता ने खुद दिखाने का वादा किया था, वहां वे कभी अकेले या यूं ही किसी काम के सिलसिले में नहीं जाएंगे। पिता की गैर-मौजूदगी में कश्मीर जाना उन्हें उस टूटे हुए वादे और गहरे जख्म की याद दिलाता था। यही कारण था कि दिल्ली से मुंबई आने, फिल्मों में कदम रखने और वैश्विक सुपरस्टार बनने के बाद भी शाहरुख ने दशकों तक कश्मीर की तरफ मुड़कर नहीं देखा। कई निर्माताओं और निर्देशकों ने उन्हें कश्मीर में शूटिंग करने के बड़े-बड़े ऑफर्स दिए, दोस्तों ने वेकेशन पर चलने की मिन्नतें कीं, लेकिन शाहरुख हर बार मुस्कुराकर उस ऑफर को टाल दिया करते थे।

पूरी दुनिया नापी लेकिन मुल्क के स्वर्ग से खुद को क्यों रखा दूर?

90 के दशक और 2000 के दौर में जब बॉलीवुड की ज्यादातर रोमांटिक फिल्मों की शूटिंग स्विट्जरलैंड, मॉरीशस, लंदन और यूरोप के अलग-अलग मुल्कों में हो रही थी, तब शाहरुख खान ने 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे', 'कुछ कुछ होता है', 'कभी खुशी कभी गम', 'वीर-जारा' और 'डॉन' जैसी कालजयी फिल्मों के लिए पूरी दुनिया की यात्रा की। वे रोम भी गए, वे इस्तांबुल भी गए और अपने पिता द्वारा बताए गए उन दो शहरों को अपनी आंखों से देखा।

लेकिन कश्मीर जाने का ख्याल आते ही उनका दिल भारी हो जाता था। शाहरुख ने एक टीवी शो में इस बात का खुलासा करते हुए कहा था, "मेरी अम्मी कश्मीर से थीं और मेरे वालिद हमेशा कहते थे कि मैं तुम्हें कश्मीर घुमाऊंगा। जब वालिद साहब नहीं रहे, तो मुझे लगा कि अगर मैं उनके बिना कश्मीर गया तो शायद मैं उस दर्द को बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा। मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि कश्मीर मेरे पिता की अमानत है, और जब तक कोई ऐसा खास इंसान मेरी जिंदगी में न आए जो मुझे पिता जैसा दुलार दे सके, तब तक मैं उस वादी में कदम नहीं रखूंगा।" यह उस इंसान का अपने पिता के प्रति सच्चा और निष्कपट समर्पण था जो बाहर से दुनिया का सबसे बड़ा सितारा था, लेकिन भीतर से आज भी अपने वालिद की उंगली ढूंढ रहा था।

जब यश चोपड़ा बने पिता तुल्य सहारा: 'जब तक है जान' और वादियों में पहला कदम

शाहरुख खान के इस दशकों पुराने प्रण और भावनात्मक अवरोध को यदि किसी ने तोड़ा, तो वे थे भारतीय सिनेमा के महान रोमांस किंग और दिग्गज निर्देशक यश चोपड़ा। यश चोपड़ा शाहरुख खान को केवल अपनी फिल्मों का हीरो नहीं मानते थे, बल्कि उन्हें अपने सगे बेटे की तरह असीम स्नेह और सम्मान देते थे। शाहरुख भी यश चोपड़ा को अपने पिता की तरह पूजते थे और उनकी किसी भी बात को कभी नहीं टालते थे।

साल 2012 में जब यश चोपड़ा अपनी अंतिम डायरेक्टोरियल फिल्म 'जब तक है जान' (Jab Tak Hai Jaan) की तैयारी कर रहे थे, तो उन्होंने फिल्म के मेजर क्लाइमेक्स और रोमांटिक गानों (जैसे 'जिया रे' और आर्मी सीन्स) की शूटिंग के लिए कश्मीर के पहलगाम, गुलमर्ग और श्रीनगर की लोकेशंस को चुना। जब यश चोपड़ा ने शाहरुख से कश्मीर चलने को कहा, तो शाहरुख ने पहले थोड़ा संकोच किया और उन्हें अपने पिता से जुड़ा वह भावुक किस्सा सुनाया।

यश चोपड़ा ने शाहरुख के कंधे पर हाथ रखा और बेहद प्यार से कहा—"शाहरुख, तुम्हारे पिता तुम्हें कश्मीर नहीं ले जा सके, लेकिन आज तुम्हारा यह दूसरा पिता तुम्हें अपनी उंगली पकड़कर कश्मीर ले जाएगा।" यश चोपड़ा के इन आत्मीय शब्दों ने शाहरुख के दिल के सारे बंधन खोल दिए। 2012 में पहली बार शाहरुख खान ने कश्मीर की धरती पर कदम रखा।

पहलगाम और डल झील के किनारे जब नम हो गईं किंग खान की आंखें

'जब तक है जान' की शूटिंग के दौरान जब शाहरुख खान पहली बार कश्मीर की खूबसूरत वादियों, चिनार के दरख्तों, बर्फ से ढके पहाड़ों और डल झील के शिकारे के बीच पहुंचे, तो वे घंटों तक शांत खड़े होकर केवल कुदरत के उस नजारे को निहारते रहे। उस वक्त यूनिट के लोगों ने देखा कि कैसे बॉलीवुड का यह सबसे बड़ा सुपरस्टार अपनी पुरानी यादों में खोकर भावुक हो गया था।

शाहरुख ने बाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नम आंखों से कहा था, "जब मैंने पहली बार कश्मीर की वादियों में सांस ली, तो मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरे वालिद मेरे बिल्कुल पास खड़े होकर मुस्कुरा रहे हों। मुझे लगा कि जैसे मैं अपनी मां की गोद में वापस आ गया हूं। कश्मीर वाकई जन्नत है, और यश जी ने मुझे यहां लाकर मेरे जीवन का सबसे बड़ा खालीपन भर दिया।" विडंबना देखिए कि 'जब तक है जान' की शूटिंग पूरी करने के कुछ ही हफ्तों बाद यश चोपड़ा का भी निधन हो गया, जिससे शाहरुख के लिए कश्मीर का यह पहला और ऐतिहासिक दौरा जिंदगी भर के लिए एक अमिट और रूहानी याद बन गया।

माता-पिता के संस्कारों की खुशबू: क्यों आज भी करोड़ों दिलों के सरताज हैं शाहरुख?

शाहरुख खान का अपने पिता से जुड़ा यह किस्सा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि इंसान चाहे कितनी भी शोहरत और बुलंदी हासिल कर ले, उसकी असली दौलत उसके माता-पिता के दिए हुए संस्कार और उनसे जुड़ी यादें ही होती हैं। आज के इस भौतिकवादी और भागदौड़ भरे दौर में जहां लोग अक्सर रिश्तों और पुरानी यादों को पीछे छोड़ देते हैं, शाहरुख खान का अपने वालिद के एक छोटे से कहे शब्द को दशकों तक अपने दिल में संजोकर रखना हर किसी के दिल को छू जाता है।

यही वह सादगी, गहरा पारिवारिक जुड़ाव और जज्बातों के प्रति ईमानदारी है जो शाहरुख खान को केवल फिल्मों का 'एक्टर' नहीं, बल्कि करोड़ों फैंस के दिलों का 'बादशाह' बनाती है। कश्मीर की वादियों में बिताए गए वे पल आज भी शाहरुख के जीवन की सबसे अनमोल धरोहर हैं, जो यह साबित करते हैं कि सच्ची मोहब्बत और वादे मौत के बाद भी कभी खत्म नहीं होते।

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