लखनऊ। उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सियासत की बिसात पर मोहरे तेजी से बदले जा रहे हैं। सूबे की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपनी पारंपरिक सियासी लाइन में एक ऐसा बड़ा बदलाव किया है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अब अपनी चिर-परिचित ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति के साथ-साथ बेहद खामोशी से ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में अखिलेश यादव के राजनीतिक संदेश, मंदिरों में लगातार हाजिरी, भगवान श्रीराम और सनातन पर दिए गए बयान इसके साफ संकेत दे रहे हैं। इसके अलावा राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर उनका मुखर रुख और धार्मिक आयोजनों में उनकी बढ़ती सक्रियता इस समय प्रदेश के सियासी गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा का विषय बनी हुई है।
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा बुलंद कर सूबे में बंपर सफलता हासिल की थी। इस बड़ी जीत के बाद पार्टी अब इस सामाजिक गठजोड़ को पूरी मजबूती से बनाए रखना चाहती है, लेकिन साथ ही वह बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं के बीच भी अपनी स्वीकार्यता को नया विस्तार देने की कोशिश में जुट गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव अब एक ऐसी महीन सियासी लकीर खींच रहे हैं, जिसमें सामाजिक न्याय के साथ-साथ धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान दोनों को एक साथ साधने का पुरजोर प्रयास साफ नजर आ रहा है।
राम मंदिर को लेकर सपा का बदला रुख और ‘सबके राम’ का संदेश
एक दौर था जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लगातार समाजवादी पार्टी पर राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दों से दूरी बनाने और तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। हालांकि, अब जमीनी तस्वीर पूरी तरह बदलती हुई नजर आ रही है। राम मंदिर चढ़ावा चोरी के कथित मामले को लेकर अखिलेश यादव लगातार सरकार और ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर आक्रामक हैं और तीखे सवाल उठा रहे हैं। खास बात यह है कि इन हमलों के बीच वे अपने बयानों में बार-बार यह दोहराना नहीं भूलते कि ‘प्रभु श्रीराम सबके हैं’ और देश के हर सनातनी परिवार में सदियों से रामदरबार पूजे जाने की समृद्ध परंपरा रही है। उन्होंने साफ लहजे में भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा कि भगवा दल ने अपनी सियासत के चक्कर में ‘आस्था और संविधान’ दोनों के साथ बड़ा खिलवाड़ किया है।
मंदिरों में अखिलेश परिवार की बढ़ी सक्रियता और कन्नौज में केदारेश्वर महादेव
पिछले कुछ समय पर नजर डालें तो अखिलेश यादव और उनके परिवार की धार्मिक गतिविधियां अप्रत्याशित रूप से बढ़ी हैं। सपा मुखिया देश और प्रदेश के अलग-अलग प्रसिद्ध मंदिरों में शीश नवाते और पूजा-अर्चना करते दिखाई दे रहे हैं। इतना ही नहीं, वे इत्र नगरी कन्नौज में भव्य ‘केदारेश्वर महादेव मंदिर’ का निर्माण भी करवा रहे हैं, जिसका जिक्र वह अपनी लगभग हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में बेहद गर्व के साथ करते हैं। अखिलेश के साथ-साथ उनकी पत्नी और सांसद डिंपल यादव सहित उनके बच्चे भी लगातार मंदिरों में अनुष्ठान कर रहे हैं। हाल ही में उनके बेटे अर्जुन और बेटी टीना ने काशी विश्वनाथ मंदिर जाकर बाबा का आशीर्वाद लिया था, जबकि सैफई में एक विशाल भंडारे का आयोजन भी किया गया था। सार्वजनिक मंचों से सनातन परंपराओं का बार-बार जिक्र करना अब उनकी नई राजनीतिक शैली का एक अहम हिस्सा बन चुका है।
PDA और हिंदुत्व का संतुलन: भाजपा के ध्रुवीकरण को रोकने की काट
राजनीतिक पंडितों के मुताबिक, अखिलेश यादव के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अपने पारंपरिक और मजबूत पीडीए (PDA) वोट बैंक को छिटकने न दें और साथ ही हिंदू मतदाताओं के एक बड़े हिस्से में पैठ बनाएं। यही वजह है कि वे तराजू के दोनों पलड़ों को बराबर रखने की कोशिश कर रहे हैं। वे एक तरफ सामाजिक न्याय, जातिगत जनगणना, आरक्षण, संविधान और पिछड़े-दलितों के अधिकारों की हुंकार भर रहे हैं, तो दूसरी तरफ धार्मिक आयोजनों, मंदिरों और भगवान श्रीराम से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर भी उतनी ही मुखरता से अपनी बात रख रहे हैं। माना जा रहा है कि इस संतुलित रणनीति का मुख्य मकसद भाजपा को चुनाव के वक्त धार्मिक ध्रुवीकरण का एकतरफा राजनीतिक लाभ लेने से रोकना है।
डिजिटल PDA अभियान और बूथ स्तर पर पार्टी फंड जुटाने का नया प्लान
अपनी इस नई राजनीति को अमलीजामा पहनाने के लिए अखिलेश यादव ने हाल ही में ‘PDA स्वाभिमान सहयोग अभियान’ का शंखनाद किया है। इस हाईटेक अभियान के तहत QR कोड के माध्यम से आम जनता से न्यूनतम 20 रुपये का सहयोग लेकर पार्टी फंड जुटाने की अनोखी पहल की गई है। इसके साथ ही पार्टी ने बड़े पैमाने पर डिजिटल सदस्यता अभियान शुरू करने की भी घोषणा की है। समाजवादी पार्टी का दावा है कि यह अभियान सिर्फ चुनावी चंदा जुटाने का जरिया नहीं है, बल्कि इसके जरिए बूथ स्तर तक संगठन को फौलादी बनाने और नए युवाओं व समर्थकों को सीधे जोड़ने की एक बड़ी सांगठनिक रणनीति है।
भाजपा का ‘हार्ड हिंदुत्व’ बनाम सपा की ‘सॉफ्ट’ काट
उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा लंबे समय से ‘हार्ड हिंदुत्व’ की राजनीति की धुरी रही है। राम मंदिर, काशी, मथुरा, सनातन और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद उसके कोर एजेंडे में शामिल रहे हैं। इसके मुकाबले समाजवादी पार्टी अब सीधे तौर पर हिंदुत्व या धार्मिक प्रतीकों का विरोध करने की गलती नहीं कर रही है। इसके बजाय सपा धार्मिक आस्था को पूरी तरह स्वीकार करते हुए भाजपा को ही कटघरे में खड़ा कर रही है कि उसने आस्था का केवल राजनीतिक इस्तेमाल किया है। अखिलेश यादव का पूरा प्रयास जनता को यह समझाने का है कि भगवान श्रीराम किसी एक पार्टी के नहीं बल्कि सभी के हैं, इसलिए धार्मिक आस्था के नाम पर राजनीति बंद होनी चाहिए। राजनीतिक विश्लेषक इसे सपा की बेहद सोची-समझी ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की नीति मान रहे हैं।
ज्योतिष, शुभ-अशुभ संकेत और कार्यकर्ताओं को सख्त हिदायत
बदली हुई इस सियासी बयार में पिछले कुछ महीनों के दौरान अखिलेश यादव ने सार्वजनिक मंचों से ज्योतिष, धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं का भी खुलकर जिक्र किया है। उन्होंने प्रयागराज में संगम तट पर रात्रि विश्राम, मंदिर दर्शन और शुभ-अशुभ संकेतों पर भी खुलकर बातें की हैं। इन बयानों को उनकी बदली हुई राजनीतिक छवि से जोड़कर देखा जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अखिलेश ने अपने सभी प्रवक्ताओं, नेताओं और कार्यकर्ताओं को सख्त हिदायत दी है कि वे किसी भी धार्मिक मामले या देवी-देवताओं पर कोई भी विवादित टिप्पणी न करें, ताकि भाजपा को बैठे-बिठाए ध्रुवीकरण का कोई मौका न मिल सके।
क्या 2027 में भाजपा के अभेद्य किले को ढहा पाएगी सपा?
इस यक्ष प्रश्न पर राजनीतिक विश्लेषकों की राय बंटी हुई नजर आती है। कुछ विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि समाजवादी पार्टी अपने पीडीए (PDA) सामाजिक गठजोड़ को अटूट रखते हुए सवर्ण और गैर-यादव ओबीसी हिंदू मतदाताओं के एक वर्ग को अपने पाले में लाने में कामयाब हो जाती है, तो 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए अब तक का सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण मुकाबला साबित हो सकता है। वहीं, दूसरी ओर कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा की वैचारिक और सांगठनिक पकड़ आज भी बेहद मजबूत है, और केवल धार्मिक प्रतीकों या बयानों के सहारे उसकी काट खोजना सपा के लिए इतना आसान नहीं होने वाला है।
उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग का एक नया और दिलचस्प अध्याय
बहरहाल, राजनीतिक ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इतना बिल्कुल साफ हो चुका है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की सियासी जंग सिर्फ पुराने जातीय समीकरणों के भरोसे नहीं लड़ी जाएगी। एक तरफ जहां सत्ताधारी भाजपा अपने विकास कार्यों और ‘हार्ड हिंदुत्व’ के चिर-परिचित एजेंडे के साथ मैदान संभालेगी, वहीं दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी PDA, सामाजिक न्याय और धार्मिक-सांस्कृतिक स्वीकार्यता के एक नए ‘कॉकटेल’ के साथ अपनी सियासी जमीन को सींच रही है। अखिलेश यादव का यह नया अवतार और उनकी यह रणनीति कितनी कारगर साबित होगी, इसका अंतिम फैसला तो आने वाले वक्त में सूबे की जनता जनार्दन ही करेगी।
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