'अगर नीयत साफ है तो 2027 के यूपी चुनाव में ही लागू हो 33 फीसदी महिला आरक्षण': अखिलेश यादव ने केंद्र और योगी सरकार की बढ़ाई मुश्किलें

'अगर नीयत साफ है तो 2027 के यूपी चुनाव में ही लागू हो 33 फीसदी महिला आरक्षण': अखिलेश यादव ने केंद्र और योगी सरकार की बढ़ाई मुश्किलें

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव का बिगुल अभी से बज चुका है और इस बार चुनावी जंग का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु प्रदेश की 48 प्रतिशत 'आधी आबादी' यानी महिला मतदाता बन चुकी हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी और केंद्र की मोदी-योगी सरकार पर चौतरफा राजनीतिक दबाव बनाते हुए एक बड़ा दांव चल दिया है। अखिलेश यादव ने संसद में पारित हो चुके महिला आरक्षण विधेयक यानी 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को बिना किसी देरी के 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ही तत्काल प्रभाव से लागू करने की मांग रखी है। अखिलेश यादव ने भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कहा है कि यदि सरकार की नीयत वास्तव में मातृशक्ति को अधिकार देने की है, तो महिलाओं को उनका हक देने के लिए 2029 या 2031 तक जनगणना और परिसीमन का बहाना बनाकर लंबा इंतजार क्यों कराया जा रहा है? लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सपा के इस आक्रामक रुख ने सत्ताधारी दल भाजपा के लिए असहज स्थितियां पैदा कर दी हैं।

2027 के यूपी चुनाव में ही लागू हो महिला आरक्षण: अखिलेश की सीधी चुनौती

लखनऊ स्थित पार्टी मुख्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता और हालिया सार्वजनिक मंचों से अखिलेश यादव ने दो टूक शब्दों में कहा कि केंद्र सरकार ने संसद के विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को धूमधाम से पास तो करवा लिया, लेकिन उसमें जनगणना और परिसीमन (Delimitation) की ऐसी जटिल और लंबी शर्तें जोड़ दीं जिससे यह कानून दशकों तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहे। अखिलेश यादव ने कहा कि उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है जहां 403 विधानसभा सीटें हैं। यदि केंद्र और राज्य सरकार वास्तव में महिलाओं के नेतृत्व का सम्मान करती हैं, तो वे एक अध्यादेश लाकर या विशेष संवैधानिक संशोधन के जरिए उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनावों में ही 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करें। सपा अध्यक्ष ने कहा कि आज जब देश डिजिटल हो चुका है और तमाम नीतियां फटाफट लागू हो रही हैं, तो बेटियों को विधायिका में उनका वाजिब हक देने के लिए 2029 के बाद की तारीखें देकर गुमराह करना पूरी तरह अनुचित है।

'पीडीए' की महिलाओं को मिले 'कोटा के भीतर कोटा': सामाजिक न्याय की मांग

अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण के भीतर सामाजिक न्याय और आरक्षण के वर्गीकरण (सब-कैटेगराइजेशन) का सबसे अहम मुद्दा उठाते हुए 'कोटा के भीतर कोटा' की मांग को फिर से प्रमुखता से उठाया है। सपा प्रमुख का कहना है कि जब तक 33 फीसदी महिला आरक्षण के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से उप-कोटा (सब-कोटा) तय नहीं किया जाएगा, तब तक गांव, देहात और वंचित तबकों की बेटियों को विधानसभा और संसद में कभी वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाएगा। अखिलेश यादव ने जोर देकर कहा कि सपा का 'पीडीए' फॉर्मूला केवल एक नारा नहीं है, बल्कि यह देश के 90 प्रतिशत शोषित और वंचित समाज को उनका हक दिलाने का संकल्प है। उन्होंने कहा कि बिना जातीय जनगणना और बिना सामाजिक वर्गीकरण के लाया गया महिला आरक्षण केवल कुछ खास और संभ्रांत वर्गों तक सीमित रह जाएगा, जिससे समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ी महिलाओं के साथ घोर अन्याय होगा।

केवल जुमला बनकर न रह जाए कानून: डिंपल यादव और महिला सांसदों का मोर्चा

सपा की स्टार प्रचारक और मैनपुरी से लोकसभा सांसद डिंपल यादव, कैराना सांसद इकरा हसन और मछलीशहर सांसद प्रिया सरोज ने भी इस मुद्दे पर भाजपा को आड़े हाथों लिया है। डिंपल यादव ने कहा कि भाजपा सरकार जब भी चुनाव आते हैं तो महिलाओं के नाम पर नए-नए लोक-लुभावन वादे करती है, लेकिन जब वास्तविक राजनीतिक सत्ता में महिलाओं को 33 फीसदी हिस्सेदारी देने का वक्त आता है तो नियमों और परिसीमन का जाल बिछा देती है। डिंपल यादव ने सवाल किया कि रक्षाबंधन और त्योहारों पर गैस सिलेंडर या चंद रुपयों की बात करने वाली सरकार महिलाओं को कानून बनाने वाली शीर्ष संस्थाओं में बैठने का पूरा अधिकार देने से क्यों कतरा रही है? उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ने हमेशा महिलाओं को वास्तविक मंच दिया है और पार्टी सड़क से लेकर संसद तक इस बात की लड़ाई लड़ेगी कि देश की संसद और उत्तर प्रदेश की विधानसभा में महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी बिना किसी विलंब के तुरंत सुनिश्चित की जाए।

मुफ्त योजनाओं बनाम वास्तविक राजनीतिक हिस्सेदारी: सपा का नीतिगत वार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय योजनाओं की भारी जंग छिड़ी हुई है। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 60 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए 'लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर मातृशक्ति योजना' के तहत रोडवेज बसों में आजीवन मुफ्त यात्रा का तोहफा दिया है, वहीं इसके जवाब में अखिलेश यादव ने 'स्त्री सम्मान समृद्धि योजना' का ऐलान कर हर गरीब महिला को सालाना 40,000 रुपये, सभी महिलाओं को शत-प्रतिशत फ्री बस यात्रा, महीने में 2 दिन की विशेष छुट्टी (पीरियड लीव), 12वीं पास छात्राओं को मुफ्त लैपटॉप और सरकारी नौकरियों में 33 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया है। इसके साथ ही अब 33 फीसदी राजनीतिक आरक्षण की मांग उठाकर सपा ने इस विमर्श को केवल कल्याणकारी योजनाओं (वेलफेयर) से आगे बढ़ाकर 'पावर शेयरिंग' यानी सीधे राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी के स्तर पर पहुंचा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव का यह कदम भाजपा को रक्षात्मक मुद्रा में लाने की एक सोची-समझी और सटीक रणनीति है।

403 विधानसभा सीटों पर क्या होगा असर? यूपी का बदलेगा सियासी नक्शा

यदि उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू होता है, तो प्रदेश के 403 विधानसभा क्षेत्रों में से लगभग 133 से 135 सीटें सीधे तौर पर महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हो जाएंगी। इसका सीधा मतलब यह होगा कि दशकों से पारंपरिक रूप से चुनाव लड़ते आ रहे कई बाहुबली, कद्दावर और दिग्गज पुरुष नेताओं को अपनी सीटें छोड़नी पड़ेंगी या अपनी पत्नियों, बेटियों और बहुओं को चुनावी मैदान में उतारना पड़ेगा। इससे न केवल जमीनी स्तर पर नए महिला नेतृत्व का तेजी से उदय होगा, बल्कि प्रदेश की चुनावी राजनीति की पूरी भाषा, मुद्दे और प्राथमिकताएं भी बदल जाएंगी। वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 50 के नीचे सिमटी हुई है, जो कुल संख्या का मात्र 11-12 प्रतिशत है। 33 फीसदी आरक्षण लागू होने से यह संख्या तीन गुना बढ़कर ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच जाएगी, जो पूरे उत्तर भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव साबित होगा।

'सरकार लागू नहीं करेगी तो भी हम महिलाओं को देंगे रिकॉर्ड टिकट': सपा का संकल्प

अखिलेश यादव ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार तकनीकी पेचों का हवाला देकर 2027 के चुनाव में 33 फीसदी आरक्षण लागू नहीं करती है, तो भी समाजवादी पार्टी अपने स्तर पर एक नया राजनीतिक कीर्तिमान स्थापित करेगी। अखिलेश ने कहा कि आगामी चुनाव में समाजवादी पार्टी अपने टिकट बंटवारे में 33 प्रतिशत से भी अधिक टिकट योग्य, शिक्षित और संघर्षशील महिला कार्यकर्ताओं व पीडीए की बेटियों को देकर यह साबित कर देगी कि सामाजिक न्याय को लागू करने के लिए केवल कानूनों की नहीं बल्कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि सपा की सूची में हर जाति, मजहब और वर्ग की महिलाओं को उनकी आबादी के अनुपात में सम्मानजनक भागीदारी दी जाएगी ताकि वे विधानसभा में पहुंचकर जनता की असली आवाज बन सकें।

2027 के चुनावी रण में महिला शक्ति बनेगी सबसे बड़ा गेमचेंजर

उत्तर प्रदेश के सियासी इतिहास पर नजर डालें तो पिछले कुछ चुनावों में महिला मतदाताओं ने 'साइलेंट वोटर' के रूप में चुनाव परिणामों को पूरी तरह पलटने का काम किया है। चाहे कानून-व्यवस्था का मुद्दा हो या सीधी नकद मदद की योजनाएं, महिलाएं अब स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में मतदान कर रही हैं। अखिलेश यादव द्वारा 33 प्रतिशत आरक्षण को 2027 के चुनाव से ही लागू करने की मांग ने भाजपा के सामने एक कठिन रणनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। यदि भाजपा इस मांग पर चुप्पी साधती है तो विपक्ष इसे उसकी कथनी और करनी का अंतर बताएगा, और यदि सरकार इस दिशा में कोई कदम उठाती है तो इसका पूरा श्रेय विपक्ष अपनी आक्रामक घेराबंदी को देगा। लखनऊ के राजनीतिक गलियारों से निकला यह सवाल अब पूरे देश की राजनीति का सबसे बड़ा विमर्श बन चुका है कि क्या 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव देश में महिला आरक्षण की पहली ऐतिहासिक प्रयोगशाला बनेगा।

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