'आजू के दिनवा हो दीनानाथ, लागल एती बेर': शारदा सिन्हा के जिस छठ गीत में सूर्य देव से की गई मीठी शिकायत

'आजू के दिनवा हो दीनानाथ, लागल एती बेर': शारदा सिन्हा के जिस छठ गीत में सूर्य देव से की गई मीठी शिकायत

लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा की शुरुआत होते ही हर गली, घाट और घर में पारंपरिक लोकगीतों की गूंज सुनाई देने लगती है। यूं तो छठ के दर्जनों लोकप्रिय गीत हैं, लेकिन बिहार कोकिला व पद्म भूषण से सम्मानित स्वर्गीय शारदा सिन्हा द्वारा गाया गया पारंपरिक गीत 'सोना सट कुनिया हो दीनानाथ' अपने अनूठे भाव के कारण सबसे अलग पहचान रखता है। इस गीत की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें व्रती भगवान भास्कर (दीनानाथ) के प्रति केवल स्तुति नहीं करते, बल्कि उनसे एक आत्मीय भक्त की तरह सीधे सवाल पूछते हैं और उनके देर से निकलने पर मीठी शिकायत दर्ज कराते हैं। यूट्यूब पर इस पारंपरिक भजन को अब तक 4.3 करोड़ यानी 43 मिलियन से अधिक बार देखा और सुना जा चुका है। आधुनिक संगीत और रीमिक्स के दौर में भी इस शुद्ध पारंपरिक मैथिली-भोजपुरी लोकगीत का यह मुकाम साबित करता है कि आस्था और लोक परंपरा की जड़ें आज भी कितनी गहरी हैं।

'आन दिन उगइछा हो दीनानाथ...' गीत के भावुक बोल और शिकायत का गहरा अर्थ

शारदा सिन्हा के मशहूर एल्बम 'छठ मईया' का यह गीत सीधे तौर पर उस क्षण की भावनाओं को बयां करता है जब छठ व्रती उगते हुए सूर्य को दूसरा अर्घ्य देने के लिए कमर तक ठंडे पानी में खड़े होकर इंतजार करते हैं। गीत के शुरुआती बोल हैं:

'सोना सट कुनिया हो दीनानाथ, हे घूमइछा संसार...

आन दिन उगइछा हो दीनानाथ, आहे भोर भिनसार...

आजू के दिनवा हो दीनानाथ, हे लागल एती बेर...'

इन पंक्तियों का सरल अर्थ यह है कि हे दीनानाथ! आप सोने के रथ पर सवार होकर पूरे संसार का भ्रमण करते हैं। सामान्य दिनों में तो आप बिल्कुल तड़के यानी भोर की पहली किरण के साथ ही आकाश में प्रकट हो जाते हैं, लेकिन आज जब हम हाथ में सूप और अर्घ्य लिए ठंडे पानी में खड़े होकर आपका इंतजार कर रहे हैं, तो आज दर्शन देने में इतनी देर क्यों हो रही है? भक्त और भगवान के बीच का यह संवाद लोक संस्कृति के उस प्रेम और अधिकार को दर्शाता है जहां ईश्वर कोई दूर की शक्ति नहीं, बल्कि परिवार के सबसे बुजुर्ग और आत्मीय सदस्य जैसे प्रतीत होते हैं।

गीत में खुद सूर्य देवता ने दिया जवाब, बताया क्यों हुई आने में देरी

गीत केवल शिकायत पर खत्म नहीं होता, बल्कि आगे की पंक्तियों में सूर्य देव के देर से आने की वजह भी बेहद भावुक और लोक-कल्याणकारी रूप में सामने आती है। गीत के अनुसार, भगवान दीनानाथ अपने भक्त को समझाते हुए कहते हैं:

'बाट में भेटिए गेल गे अबला, एकटा अन्हरा पुरुष, अंखिया दिएइते गे अबला…

बाट में भेटिए गेल गे अबला, एकटा बाझिनिया, बालक दिएइते गे अबला…

बाट में भेटिए गेल गे अबला, एकटा कोडिया पुरुष, कायावा की एइते गे अबला..'

सूर्य देवता बताते हैं कि संसार के भ्रमण के दौरान रास्ते में उन्हें एक दृष्टिहीन (अंधा) व्यक्ति मिल गया था, जिसे वे आंखों की रोशनी और दृष्टि प्रदान कर रहे थे। आगे बढ़ने पर उन्हें एक निःसंतान महिला (बांझिन) मिली, जिसकी झोली में वे संतान का सुख भर रहे थे। इसके बाद मार्ग में एक गंभीर रोग से पीड़ित (कोढ़ी) व्यक्ति मिला, जिसके शरीर को उन्होंने निरोगी और सुंदर काया का वरदान दिया। दुखों से पीड़ित इन लाचार लोगों का उद्धार करने और उनका जीवन संवारने के कारण ही आज सुबह अर्घ्य के समय घाट तक पहुंचने में थोड़ी देरी हो गई। यह संवाद छठ पूजा के उस मूल दर्शन को भी उजागर करता है जो समाज के हर उपेक्षित और पीड़ित व्यक्ति के कल्याण की कामना करता है।

डिजिटल दौर में 4.3 करोड़ व्यूज, पीढ़ियों से अमर है शारदा सिन्हा का जादुई स्वर

छठ महापर्व और शारदा सिन्हा का स्वर एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं। पिछले कुछ दशकों में छठ पर कई नए गायकों के गीत आए और वायरल हुए, लेकिन जब बात घाटों पर बजने वाले गीतों की आती है, तो शारदा सिन्हा की आवाज के बिना पर्व अधूरा सा लगता है। यूट्यूब पर इस गीत को मिले 4.3 करोड़ से अधिक व्यूज यह तस्दीक करते हैं कि प्रवासी भारतीय हों या गांव-कस्बों में रहने वाले लोग, छठ आते ही उनकी पहली पसंद यह पारंपरिक धुन ही बनती है। गीत में प्रयुक्त पारंपरिक वाद्ययंत्र, राग और शारदा सिन्हा का गंभीर व ममतामयी आलाप सुनने वाले की आंखों में आंसू ला देता है। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं, बल्कि छठ महापर्व के त्याग, प्रतीक्षा और सूर्य देव के प्रति अटूट निष्ठा का सजीव दस्तावेज है।