'100 करोड़ या 1000 करोड़ की फिल्में नहीं हैं, मुझे कोई मलाल नहीं': बॉक्स ऑफिस नंबर गेम पर भड़कीं तापसी पन्नू, बोलीं- 'मैं ऐसी फिल्में करती हूं जिन्हें 20 साल बाद भी गर्व से देख सकूं
हिंदी और दक्षिण भारतीय सिनेमा में अपनी सशक्त, लीक से हटकर और सामाजिक रूप से झकझोरने वाली भूमिकाओं के लिए पहचानी जाने वाली अभिनेत्री तापसी पन्नू ने बॉलीवुड में बॉक्स ऑफिस के '100 करोड़ क्लब' और कमाई के आंकड़ों को लेकर जारी अंधी दौड़ पर खुलकर अपनी राय रखी है। 'पिंक', 'थप्पड़', 'बदला', 'मुल्क' और 'हसीन दिलरुबा' जैसी फिल्मों से अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाली तापसी पन्नू ने एक बेबाक साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि उनके करियर में बहुत ज्यादा 100 करोड़, 1000 करोड़ या 5000 करोड़ कमाने वाली फिल्में नहीं हैं, लेकिन उन्हें इसका रत्ती भर भी अफसोस या मलाल नहीं है। तापसी ने दो टूक शब्दों में कहा कि वे तात्कालिक व्यावसायिक मुनाफे या रिकॉर्ड्स के लिए फिल्में नहीं चुनतीं, बल्कि उनका पूरा ध्यान ऐसी फिल्मोग्राफी तैयार करने पर है जिसे आज से 20 साल बाद भी जब वे पीछे मुड़कर देखें, तो उन्हें अपने काम पर गर्व हो सके।
आगामी भावनात्मक-एक्शन थ्रिलर फिल्म 'गांधारी' (Gandhari) के प्रीमियर से पहले दिए गए इस बयान ने फिल्म इंडस्ट्री के गलियारों में बॉक्स ऑफिस सफलता की पारंपरिक परिभाषा पर एक नई बहस छेड़ दी है। तापसी पन्नू का कहना है कि आज के दौर में सिनेमा का मूल्यांकन केवल इस बात से किया जाने लगा है कि पहले वीकेंड में कितने टिकट बिके, जबकि कई महान और कालजयी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल होने के बावजूद दशकों बाद 'कल्ट क्लासिक' का दर्जा हासिल करती हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने करियर में जानबूझकर 'अस्थायी पुरस्कारों' (Temporary Rewards) के बजाय एक टिकाऊ और यादगार विरासत को प्राथमिकता दी है।
'100 करोड़ या 1000 करोड़ की फिल्में नहीं हैं तो ठीक है, मुझे फर्क नहीं पड़ता'
तापसी पन्नू ने बॉक्स ऑफिस के दबाव और 100 करोड़ के तमगे पर बात करते हुए बेहद सहजता से कहा, "मैं पूरी तरह ठीक हूं कि मेरे खाते में 100 करोड़, 1000 करोड़ या 5000 करोड़ की ढेरों फिल्में नहीं हैं। मेरे पूरे करियर में ऐसी बहुत कम फिल्में रही हैं जिन्होंने इतने बड़े वित्तीय आंकड़े छुए हों। लेकिन मुझे इस बात से कोई परेशानी नहीं है। मैं हमेशा से एक ऐसी अभिनेत्री के रूप में याद की जाना चाहती हूं जिसने यादगार और मजबूत किरदार निभाए हैं, न कि किसी ऐसे चेहरे के रूप में जिसका नाम सिर्फ बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के साथ चिपका हो। मेरे लिए मेरे किरदारों का प्रभाव इन नंबरों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण है।"
उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि एक कलाकार के रूप में आपको शुरुआत में ही यह तय करना पड़ता है कि आप किस रास्ते पर चलना चाहते हैं। क्या आप केवल एक ऐसी फिल्म का हिस्सा बनना चाहते हैं जो उस वक्त की बहुत बड़ी कमर्शियल हिट बन जाए, या फिर आप ऐसी कहानी का हिस्सा बनना चाहते हैं जिसे दर्शक न सिर्फ आज, बल्कि 10 या 15 साल बाद भी याद रखें और उसकी चर्चा करें? तापसी ने कहा कि उन्होंने बिना किसी संकोच के हमेशा दूसरा विकल्प चुना है।
'10 साल बाद फिल्मों को मिलता है कल्ट स्टेटस, लेकिन तब तक कहा जाता है फ्लॉप'
तापसी पन्नू ने फिल्म इंडस्ट्री के उस दोमुंहे और अजीबोगरीब चक्र पर गहरा तंज कसा, जहां अच्छी फिल्मों को रिलीज के समय नकार दिया जाता है और बाद में उन्हें सिर-आंखों पर बैठाया जाता है। तापसी ने कहा, "हमारे यहां बहुत सी ऐसी शानदार फिल्में बनती हैं जो बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलतीं। उस वक्त उन फिल्मों को 'फ्लॉप' करार दे दिया जाता है और कलाकारों से कहा जाता है कि आपकी फिल्मोग्राफी खराब हो गई। फिर 10 साल बीतते हैं, वही फिल्में दशक की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की सूची में शामिल कर ली जाती हैं। लोग उन्हें कल्ट का दर्जा देते हैं, उनकी पूजा करते हैं और नई फिल्मों के लिए उनके संदर्भ (रेफरेंस) दिए जाते हैं। मैंने अपने करियर में ऐसा कई बार देखा है।"
तापसी ने कहा कि एक कलाकार को इस अजीब विडंबना की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। जिस साल आपकी संजीदा फिल्म फ्लॉप होती है, आपको आलोचनाएं झेलनी पड़ती हैं। फिर जब 10 साल बाद उसी फिल्म पर बड़े-बड़े विश्लेषण लिखे जाते हैं, तब कोई उन तत्कालीन हिट फिल्मों का नाम तक नहीं लेता जो उसी साल रिलीज हुई थीं। उन्होंने कहा, "यह एक बेहद अजीब और क्रूर चक्र है जिससे हर संजीदा कलाकार को गुजरना पड़ता है। इसीलिए मैंने यह सचेत फैसला लिया कि वक्त बदलेगा, आज ऐसी फिल्में बन रही हैं, कल वैसी बनेंगी, लेकिन मेरी बनाई फिल्मोग्राफी हमेशा वैसी ही रहेगी। इसे कोई नहीं बदल सकता।"
टाइपकास्ट होने का डर: जब निर्माताओं से कहा- 'मुझे मत लो, सस्पेंस खुल जाएगा'
तापसी पन्नू ने हाल ही में बॉलीवुड में अभिनेत्रियों के चयन और टाइपकास्टिंग के ढर्रे पर भी खुलकर अपनी बात रखी थी। तापसी का कहना था कि जब कोई अभिनेत्री एक शैली में सफल हो जाती है, तो इंडस्ट्री उसे उसी खांचे में कैद करने की कोशिश करती है। उन्होंने खुलासा किया था कि थ्रिलर फिल्मों में उनकी मजबूत छवि के चलते वे कई बार निर्माताओं को यह कहकर रोल ठुकरा चुकी हैं कि "अगर आप मुझे इस सस्पेंस फिल्म में लेंगे, तो दर्शक पहले ही सीन में समझ जाएंगे कि कातिल या मुख्य राजदार मैं ही हूं, इसलिए मुझे मत कास्ट कीजिए, यह आपकी फिल्म के लिए नुकसानदेह होगा।"
तापसी ने यह भी उजागर किया था कि इंडस्ट्री में महिला-केंद्रित फिल्मों के बजट को लेकर आज भी पूर्वाग्रह मौजूद है। निर्माता उनके नाम पर 25 करोड़ की थ्रिलर फिल्म में तुरंत पैसा लगाने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन अगर वे 15 करोड़ की एक सादी प्रेम कहानी बनाना चाहें, तो निवेशक हिचकिचाने लगते हैं। उन्होंने कहा कि स्क्रीन पर लगातार 'मजबूत महिला' का किरदार निभाना भी कभी-कभी एक किस्म का बंधन बन जाता है, जबकि वे मानवीय कमजोरियों और मासूमियत वाले किरदारों को भी उतनी ही शिद्दत से तलाशती हैं।
'गांधारी' में एक्शन और मां का जज्बा: एक नए अवतार की तैयारी
तापसी पन्नू का यह बयान उनकी आने वाली फिल्म 'गांधारी' की रिलीज के ठीक पहले आया है। इस फिल्म में वे एक ऐसी मां के किरदार में नजर आने वाली हैं, जिसकी मासूम बेटी का अपहरण हो जाता है और वह अपनी बच्ची को वापस पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाती है। फिल्म में जबरदस्त एक्शन के साथ-साथ एक मां के बेबस आक्रोश और भावनात्मक दर्द को केंद्र में रखा गया है।
लेखक कनिका ढिल्लों और निर्देशक देवाशीष मखीजा के साथ तापसी का यह नया प्रोजेक्ट उनके उसी सिद्धांत का विस्तार माना जा रहा है, जहां वे संख्यात्मक बॉक्स ऑफिस की परवाह किए बिना कंटेंट और किरदार के प्रभाव पर भरोसा जताती हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर देश भर के सिनेमा प्रेमियों और तापसी के प्रशंसकों ने उनके इस बयान की सराहना करते हुए कहा है कि 100-200 करोड़ की सतही फिल्मों की भीड़ में तापसी जैसी अभिनेत्रियों का यह रुख ही अच्छे और विचारोत्तेजक सिनेमा को जीवित रखे हुए है। तापसी पन्नू ने यह साबित कर दिया है कि बॉक्स ऑफिस के आंकड़े भले ही एक शुक्रवार से दूसरे शुक्रवार तक बदलते रहें, लेकिन सिनेमा के इतिहास में केवल वही काम जिंदा रहता है जो दर्शक की आत्मा और स्मृतियों में हमेशा के लिए अपनी जगह बना लेता है।