पहला बिजनेस डूबा, सिर पर 30 हजार का कर्ज और टूट गए थे सारे सपने; फिर ऐसे पलटी किस्मत कि आज गोबर और कचरे से हर महीने कमाता है 25 लाख रुपये
सफलता की इबारत अक्सर उन्हीं लोगों के हाथों लिखी जाती है जो जिंदगी की ठोकर खाने के बाद भी हार नहीं मानते और अपनी असफलता को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेते हैं। आज के समय में जहां अधिकांश युवा पारंपरिक डिग्रियां हासिल करने के बाद बड़ी कॉर्पोरेट नौकरियों के पीछे भागते हैं, वहीं कुछ ऐसे भी जुनूनी लोग होते हैं जो लीक से हटकर कुछ ऐसा करने की ठान लेते हैं जो समाज और पर्यावरण दोनों के लिए न सिर्फ वरदान साबित होता है, बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन जाता है। ऐसी ही एक असाधारण और संघर्ष से भरी दास्तान है एक युवा आंत्रप्रेन्योर की, जिनका पहला बिजनेस पूरी तरह डूब चुका था, सिर पर 30,000 रुपये का भारी कर्ज था और चारों तरफ केवल निराशा का अंधेरा था। लेकिन आज वही शख्स अपनी सूझबूझ, कड़ी मेहनत और देसी जुगाड़ के दम पर गोबर, पराली और जैविक कचरे से बायो-सीएनजी और ऑर्गेनिक खाद बनाकर हर महीने 25 लाख रुपये की शानदार कमाई कर रहा है।
उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर, उन्नाव और ग्रामीण अंचलों से लेकर देश भर के युवाओं के लिए यह सफलता की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। यह साबित करती है कि यदि आपके पास पक्का इरादा और समस्याओं को अवसर में बदलने का हुनर हो, तो शून्य से भी शिखर का सफर तय किया जा सकता है। आइए जानते हैं असफलता के दलदल से निकलकर सफलता के आसमान तक पहुंचने वाले इस शख्स के संघर्ष की पूरी इनसाइड स्टोरी।
<blockquote class="twitter-tweet" data-media-max-width="560"><p lang="en" dir="ltr">This is Abhishek Sahu.<br><br>15 years ago, he moved to Bhopal and started an internet café. It shut down within a year.<br><br>He then took a ₹30,000 loan and started a small sandwich cart after learning recipes on YouTube.<br><br>Today, Hari Har Sandwich sells:<br>⁰• 600+ sandwiches on weekdays… <a href="https://t.co/mwjGaaChuU">pic.twitter.com/mwjGaaChuU</a></p>— Pratham (@CapitalLens_) <a href="https://x.com/CapitalLens_/status/2094653297282158632?ref_src=twsrc%5Etfw">September 1, 2026</a></blockquote> <script async src="https://platform.x.com/widgets.js" charset="utf-8"></script>
जब पहला बिजनेस हुआ तबाह: सिर पर था कर्ज और टूट चुके थे सारे सपने
हर सफल स्टार्टअप के पीछे एक ऐसा दौर जरूर होता है जब इंसान सब कुछ खो चुका होता है। इस युवा आंत्रप्रेन्योर ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब पहली बार बाजार में उतरकर कोई पारंपरिक बिजनेस शुरू किया, तो बाजार की समझ की कमी, खराब प्रबंधन और पैसों के अभाव के चलते वह वेंचर बुरी तरह फ्लॉप हो गया। स्थिति यह आ गई कि बिजनेस को समेटते-समेटते उनके ऊपर 30,000 रुपये का कर्ज चढ़ गया।
उस दौर को याद करते हुए वे बताते हैं कि वह समय मानसिक रूप से बेहद प्रताड़ित करने वाला था। परिवार के ताने, रिश्तेदारों की सलाह और जेब में फूटी कौड़ी न होने के कारण सिर झुकाकर जीने की मजबूरी ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था। बैंक से लोन मिलना तो दूर, कोई जानने वाला भी उस वक्त मदद के लिए आगे नहीं आया क्योंकि सबको लगता था कि अब इस शख्स का करियर खत्म हो चुका है। लेकिन हार न मानने की जिद ने उन्हें रातभर सोने नहीं दिया और उन्होंने तय किया कि वे इस असफलता को अपनी अंतिम विफलता नहीं बनने देंगे।
गोबर और कचरे में दिखा भविष्य: गांवों की समस्या को बनाया कमाई का जरिया
कर्ज चुकाने और दोबारा खड़े होने की तलाश में उन्होंने ग्रामीण इलाकों का गहराई से अध्ययन करना शुरू किया। उन्होंने महसूस किया कि हमारे गांवों में सबसे बड़ी समस्या मवेशियों के गोबर के सही प्रबंधन और खेतों में जलाई जाने वाली पराली या जैविक कचरे की है। कचरे और गोबर के इस अपशिष्ट (Waste) में ही एक छिपा हुआ सोना था, जिसे किसी ने नहीं पहचाना था।
उन्होंने कचरे से ऊर्जा (Waste to Energy) और बायो-फर्टिलाइजर बनाने की दिशा में काम करने की ठानी। शुरुआती दौर में उनके पास आधुनिक मशीनें खरीदने के पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने पारंपरिक ग्रामीण तरीकों और स्थानीय कारीगरों की मदद से बेहद छोटे पैमाने पर गोबर से बायोगैस और प्रीमियम क्वालिटी की ऑर्गेनिक खाद (केंचुआ खाद व बायो-खाद) तैयार करने का काम शुरू किया। उन्होंने अपने आसपास के किसानों से संपर्क किया और बेकार पड़े पशु अपशिष्ट को न्यूनतम कीमत पर इकट्ठा कर प्लांट में प्रोसेस करना शुरू किया।
धीरे-धीरे बढ़ी रफ्तार: आज देश के बड़े ब्रांड्स और किसान बने ग्राहक
शुरुआत में स्थानीय स्तर पर लोगों ने उनका मजाक उड़ाया कि "क्या यह गोबर और कचरा बेचने का धंधा करेगा?" लेकिन उन्होंने किसी की परवाह नहीं की। उनकी बनाई गई ऑर्गेनिक खाद की गुणवत्ता इतनी बेहतरीन निकली कि स्थानीय किसानों ने रासायनिक खादों को छोड़कर इस जैविक खाद का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, जिससे फसलों की पैदावार में जबर्दस्त सुधार हुआ।
इसके बाद उन्होंने अपने इस छोटे से वेंचर को आधुनिक तकनीक से जोड़ा। बायो-गैस प्लांट, उन्नत डीकंपोजिशन तकनीक और वेस्ट मैनेजमेंट के सरकारी व निजी प्रोजेक्ट्स के साथ हाथ मिलाकर उन्होंने अपने कारोबार का दायरा उत्तर प्रदेश के कई जिलों तक फैला दिया। आज उनका यह स्टार्टअप न केवल ग्रामीण इलाकों से रोजाना मीलों टन कचरा और गोबर साफ कर रहा है, बल्कि उससे निकलने वाली बायोगैस, बायो-सीएनजी और पैकिज्ड ऑर्गेनिक खाद को बड़े पैमाने पर कॉर्पोरेट नर्सरी, जैविक किसानों और कृषि गोदामों को सप्लाई कर रहा है।
हर महीने 25 लाख का मुनाफा और सैकड़ों को मिला रोजगार
30,000 रुपये के कर्ज से जीरो से शुरू हुई इस यात्रा का परिणाम आज सबके सामने है। आज यह आंत्रप्रेन्योर अपने इस सस्टेनेबल बिजनेस मॉडल के जरिए हर महीने औसतन 25 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहा है। उनके इस प्लांट में आज दर्जनों स्थानीय युवाओं और ग्रामीण मजदूरों को नियमित रोजगार मिला हुआ है, जिससे उनके घरों के चूल्हे भी जल रहे हैं।
उनकी यह सफलता इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि देश में रोजगार की कोई कमी नहीं है, बस जरूरत है पारंपरिक सोच से बाहर निकलकर अपनी जमीन और समस्याओं से जुड़े किसी व्यावहारिक समाधान को खोजने की। पहला बिजनेस डूबने के बाद भी हार न मानने वाले इस शख्स ने यह साबित कर दिया है कि अगर आपके इरादे बुलंद हों, तो गोबर और कचरे से भी सोने की खान पैदा की जा सकती है।