महात्मा गांधी बनेंगे मनोज बाजपेयी: पर्दे पर उतरेगा बापू का अनदेखा संघर्ष, जानिए क्या होगी फिल्म की पूरी कहानी

महात्मा गांधी बनेंगे मनोज बाजपेयी: पर्दे पर उतरेगा बापू का अनदेखा संघर्ष, जानिए क्या होगी फिल्म की पूरी कहानी

भारतीय सिनेमा में अपनी सहज, यथार्थवादी और दमदार अदाकारी के लिए पहचाने जाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता मनोज बाजपेयी के खाते में एक और ऐतिहासिक और चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट जुड़ गया है। सिनेमा और ओटीटी की दुनिया में 'द फैमिली मैन' के श्रीकांत तिवारी से लेकर 'भीकू म्हात्रे' और 'प्रोफेसर सिरस' जैसे अनगिनत किरदारों को अमर कर चुके मनोज बाजपेयी अब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की भूमिका में बड़े पर्दे पर नजर आने वाले हैं। बापू के जीवन और उनके विचारों पर यूं तो वैश्विक स्तर पर रिचर्ड एटनबरो की 'गांधी' से लेकर कई कालजयी फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन मनोज बाजपेयी जैसे संजीदा अभिनेता का गांधी के रूप में सामने आना इस प्रोजेक्ट को बेहद खास और बहुप्रतीक्षित बनाता है। यह खबर सामने आते ही सिनेमा प्रेमियों और आलोचकों के बीच इस बात को लेकर भारी कौतूहल है कि आखिर इस फिल्म की पटकथा में गांधीजी के किस दौर और पहलू को मुख्य रूप से छुआ जाएगा।

क्या होगी फिल्म की कहानी और किस दौर पर रहेगा फोकस?

फिल्म से जुड़े करीबी सूत्रों और इंडस्ट्री की खबरों के अनुसार, यह कोई पारंपरिक बायोपिक नहीं होगी जिसमें गांधीजी के बचपन से लेकर उनके अंतिम समय तक की पूरी जीवनगाथा को सरसरी तौर पर दिखाया जाए। इसके बजाय, फिल्म का मुख्य फोकस गांधीजी के जीवन के सबसे अशांत, गहरे और मनोवैज्ञानिक रूप से चुनौतीपूर्ण दौर पर केंद्रित होगा।

कहानी मुख्य रूप से भारत की स्वतंत्रता के समय—विशेषकर 1946 से 1948 के विभाजन के उस दौर के इर्द-गिर्द बुनी जा रही है, जब पूरा उपमहाद्वीप भीषण सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। जब दिल्ली में सत्ता के हस्तांतरण और जश्न की तैयारियां चल रही थीं, तब बापू नोआखली, कोलकाता और बिहार की सड़कों पर नंगे पैर घूमकर शांति, सद्भाव और अहिंसा की अलख जगा रहे थे। फिल्म में यह दिखाया जाएगा कि कैसे एक अकेला 78 वर्षीय बुजुर्ग अपनी आत्मिक शक्ति और नैतिक संकल्प के दम पर लाखों की हिंसक भीड़ के सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया था। इस दौरान बापू के भीतर चल रहे गहरे अकेलेपन, निराशा और सत्य-अहिंसा की कठिन परीक्षा को बेहद मानवीय दृष्टिकोण से पर्दे पर उकेरा जाएगा।

मनोज बाजपेयी की शारीरिक और मानसिक तैयारी का बड़ा इम्तिहान

महात्मा गांधी का किरदार निभाना किसी भी अभिनेता के लिए शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर सबसे कठिन कसौटी माना जाता है। बेन किंग्सले, नसीरुद्दीन शाह और दर्शन जरीवाला जैसे दिग्गज कलाकार इस किरदार को अपने-अपने अंदाज में निभा चुके हैं। मनोज बाजपेयी के लिए भी बापू की देहभाषा, उनकी झुककर चलने की खास शैली, धीमी लेकिन वजनदार आवाज, गुजराती लहजे का हिंदी उच्चारण और आंखों में दिखने वाले आत्मबल को पकड़ना एक बड़ा काम होगा।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मनोज बाजपेयी इस किरदार में पूरी तरह उतरने के लिए विशेष डाइट प्लान, योग और शारीरिक बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं ताकि वे उस दौर के बापू के दुबले-पतले लेकिन फौलादी व्यक्तित्व को स्क्रीन पर वास्तविक रूप दे सकें। इसके अलावा वे गांधीजी द्वारा लिखी गई निजी डायरियों, पत्राचार और ऐतिहासिक भाषणों के ऑडियो-विजुअल आर्काइव्स का गहन अध्ययन कर रहे हैं ताकि उनके आंतरिक विचारों को गहराई से समझा जा सके।

बापू के दार्शनिक और मानवीय द्वंद्व को मिलेगा स्क्रीन स्पेस

निर्देशक और लेखकों की टीम इस बात पर विशेष ध्यान दे रही है कि गांधी को केवल एक 'महात्मा' या अछूते देवता की तरह न दिखाया जाए, बल्कि एक ऐसे हाड़-मांस के इंसान के रूप में पेश किया जाए जो अपनी ही विचारधारा की सीमाओं, अपनों के विरोध और बदलते राजनीतिक परिदृश्य के बीच जूझ रहा था। उनके पारिवारिक संबंधों, उनके आश्रम के कड़े नियमों और कांग्रेस के युवा नेताओं के साथ उनके वैचारिक मतभेदों को भी बिना किसी लाग-लपेट के निष्पक्षता से दर्शाने की योजना है।

भारतीय सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है यह प्रोजेक्ट

मनोज बाजपेयी हमेशा से लीक से हटकर की जाने वाली भूमिकाओं के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कभी भी किसी किरदार को सतही तौर पर नहीं निभाया। ऐसे में जब वे अहिंसा के सबसे बड़े वैश्विक प्रतीक की भूमिका में उतरेंगे, तो यह न केवल भारतीय दर्शकों बल्कि अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों के मंच पर भी गहरी छाप छोड़ने की क्षमता रखेगा। फिल्म के प्री-प्रोडक्शन, लोकेशन रेकी और कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग का काम ऐतिहासिक प्रामाणिकता को ध्यान में रखकर बेहद तेजी से पूरा किया जा रहा है।

 

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