कभी फिल्मों में जादू लगते थे ये 7 अनोखे आविष्कार, जिन्हें देख वैज्ञानिकों ने असल जिंदगी में कर दिखाया सच

कभी फिल्मों में जादू लगते थे ये 7 अनोखे आविष्कार, जिन्हें देख वैज्ञानिकों ने असल जिंदगी में कर दिखाया सच

सिनेमा केवल मनोरंजन, ड्रामा और भावनाओं का माध्यम नहीं है, बल्कि यह इंसानी कल्पनाओं की वह खुली उड़ान है जो समय से दशकों आगे देखने का साहस रखती है। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी लेखक या निर्देशक ने अपनी साइंस-फिक्शन फिल्मों में भविष्य की दुनिया की परिकल्पना की, तब दुनिया भर के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को नई प्रेरणा मिली। 1960 और 1970 के दशक में जिन गैजेट्स, मशीनों और डिजिटल प्रणालियों को देखकर दर्शक दांतों तले उंगली दबा लेते थे और उन्हें मात्र एक निर्देशक का तिलिस्म या जादू समझते थे, आज वे हमारी जेब, घर और दफ्तरों का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। परदे पर दिखाई गई एक धुंधली सी सोच ने किस तरह प्रयोगशालाओं में रिसर्च का रूप लिया और फिर एक अरब लोगों की जिंदगी को पूरी तरह बदल कर रख दिया, यह समझना किसी रोमांचक थ्रिलर से कम नहीं है। विज्ञान और सिनेमा का यह अनोखा रिश्ता यह साबित करता है कि जो कुछ भी मानव मस्तिष्क सोच सकता है, उसे विज्ञान एक न एक दिन हकीकत में तब्दील करने की कुव्वत रखता है।

'स्टार ट्रेक' के कम्युनिकेटर से उपजा पहली बार मोबाइल फोन का क्रांतिकारी विचार

आज के दौर में स्मार्टफोन हमारी हथेली का ऐसा हिस्सा बन चुका है जिसके बिना आधुनिक जीवन की कल्पना करना भी असंभव लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया के पहले मोबाइल फोन की नींव हॉलीवुड की मशहूर टेलीविजन और फिल्म सीरीज 'स्टार ट्रेक' से पड़ी थी? वर्ष 1966 में जब स्टार ट्रेक का प्रसारण शुरू हुआ, तो उसमें कैप्टन किर्क और उनकी क्रू को हाथ में एक छोटा सा वायरलेस डिब्बा खोलकर दूर बैठे लोगों से सीधे आवाज में बात करते दिखाया गया था, जिसे उस समय 'कम्युनिकेटर' नाम दिया गया था। उस दौर में जब दुनिया भारी-भरकम लैंडलाइन टेलीफोन और तारों के जाल में उलझी थी, तब यह दृश्य किसी चमत्कार जैसा था। मोटोरोला कंपनी के चीफ इंजीनियर और मोबाइल फोन के जनक माने जाने वाले डॉ. मार्टिन कूपर ने खुद सार्वजनिक मंचों पर यह स्वीकार किया था कि 1973 में दुनिया का पहला पोर्टेबल हैंडहेल्ड मोबाइल फोन 'Motorola DynaTAC 8000X' बनाते समय उनकी मुख्य प्रेरणा स्टार ट्रेक का वही फ्लिप कम्युनिकेटर था। इसके बाद 90 के दशक में आए फ्लिप फोन्स का पूरा डिजाइन इसी फिल्मी गैजेट की हूबहू नकल था, जिसने दूरसंचार क्रांति की नींव रखी।

'2001: ए स्पेस ओडिसी' में 1968 में ही दिख गया था आज का आईपैड और टैबलेट

महान फिल्म निर्देशक स्टेनली कुब्रिक की 1968 में रिलीज हुई क्लासिक साइंस-फिक्शन मास्टरपीस '2001: ए स्पेस ओडिसी' को भविष्य की सटीक भविष्यवाणी करने वाली फिल्मों में सबसे शीर्ष पर गिना जाता है। इस फिल्म के एक दृश्य में अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष यान के भीतर भोजन करते समय टेबल पर एक बेहद पतली, चौकोर और फ्लैट डिजिटल स्क्रीन रखकर उस पर लाइव खबरें और वीडियो देखते हुए नजर आते हैं। फिल्म में इस उपकरण को 'न्यूजपैड' (NewsPad) कहा गया था। उस दौर में जब पर्सनल कंप्यूटर का नामोनिशान नहीं था और टेलीविजन भारी कैथोड रे ट्यूब (CRT) बक्सों में आते थे, तब ऐसी फ्लैट स्क्रीन पर डिजिटल कंटेंट पढ़ना अविश्वसनीय था। जब वर्ष 2010 में एप्पल कंपनी ने अपना पहला 'आईपैड' लॉन्च किया, तो पूरी दुनिया हैरान रह गई क्योंकि उसका रूप-रंग और काम करने का तरीका 42 साल पहले बनी उस फिल्म के न्यूजपैड जैसा ही था। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जब एप्पल और सैमसंग के बीच टैबलेट डिजाइन को लेकर कोर्ट में पेटेंट का मुकदमा चल रहा था, तब सैमसंग के वकीलों ने कुब्रिक की इसी फिल्म की क्लिप को अदालत में सबूत के तौर पर पेश कर यह दलील दी थी कि फ्लैट टैबलेट स्क्रीन का विचार एप्पल का नहीं, बल्कि सिनेमा की पुरानी देन है।

'माइनॉरिटी रिपोर्ट' का मोशन सेंसर और जेस्चर कंट्रोल आज है हमारा टचलेस इंटरफेस

वर्ष 2002 में रिलीज हुई स्टीवन स्पीलबर्ग की थ्रिलर फिल्म 'माइनॉरिटी रिपोर्ट' में हॉलीवुड सुपरस्टार टॉम क्रूज़ का वह सीन शायद ही कोई सिनेमा प्रेमी भूल सकता है, जिसमें वह बिना किसी माउस या कीबोर्ड को छुए, हवा में केवल अपने हाथों और उंगलियों के इशारे से कांच की पारदर्शी स्क्रीन पर डेटा, फोटो और फाइलों को इधर-उधर स्वाइप करते दिखाई देते हैं। उस समय दर्शकों को लगा था कि यह सिर्फ कंप्यूटर ग्राफिक्स और वीएफएक्स का कमाल है जो असल जिंदगी में कभी संभव नहीं होगा। लेकिन इस फिल्म के तकनीकी सलाहकार जॉन अंडरकॉफलर ने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) की लैब में इस पर शोध जारी रखा। महज एक दशक के भीतर दुनिया ने गेमिंग कंसोल माइक्रोसॉफ्ट किनेक्ट, स्मार्ट टीवी में जेस्चर रिकॉग्निशन और आधुनिक ऑपरेशन थियेटरों में सर्जनों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले टचलेस मेडिकल मॉनिटर्स के रूप में इस तकनीक को असलियत में काम करते देखा। आज कारों के डैशबोर्ड पर बिना हाथ लगाए केवल उंगली घुमाकर गाने बदलना या वॉल्यूम कम-ज्यादा करना उसी फिल्मी सीन की जीती-जागती मिसाल है।

'डिक ट्रेसी' और जेम्स बॉन्ड की कलाई घड़ी जो आज बन चुकी है हेल्थ ट्रैकर स्मार्टवॉच

1930 के दशक की कॉमिक्स और 1990 में आई फिल्म 'डिक ट्रेसी' में जासूस को अपनी कलाई पर बंधी घड़ी से सीधे हेडक्वार्टर बात करते दिखाया गया था। इसके बाद 'जेम्स बॉन्ड' की कई फिल्मों में 007 की कलाई पर ऐसी घड़ियां दिखीं जो गुप्त संदेश प्राप्त करती थीं, लोकेशन ट्रैक करती थीं और स्वास्थ्य का हाल बताती थीं। उस वक्त लोग इसे केवल जासूसी कहानियों का अतिशयोक्तिपूर्ण मसाला मानते थे। लेकिन आज हर दूसरे युवा और बुजुर्ग की कलाई पर बंधी एप्पल, सैमसंग या अन्य कंपनियों की 'स्मार्टवॉच' जेम्स बॉन्ड के उस गैजेट से भी कई गुना ज्यादा ताकतवर साबित हो चुकी है। आज की स्मार्टवॉच न केवल फोन कॉल और मैसेजेस को हैंडल करती है, बल्कि दिल की धड़कन (ईसीजी), ब्लड ऑक्सीजन (SpO2), स्लीप साइकिल और गिरने पर ऑटोमैटिक इमरजेंसी अलर्ट भेजने तक का काम करती है। जो गैजेट कभी परदे पर किसी काल्पनिक सीक्रेट एजेंट की जान बचाता था, आज वह अस्पतालों और घरों में लाखों आम इंसानों की जान बचाने का प्राथमिक उपकरण बन चुका है।

'टोटल रिकॉल' से टेस्ला तक: ड्राइवरलेस ऑटोनॉमस कारों का सच हुआ सपना

1990 में आई अर्नोल्ड श्वार्जनेगर की साइंस-फिक्शन फिल्म 'टोटल रिकॉल' में एक पीले रंग की टैक्सी दिखाई गई थी जिसे 'जॉनी कैब' कहा जाता था। उस टैक्सी में कोई इंसानी ड्राइवर नहीं था, बल्कि वह पूरी तरह ऑटोमैटिक थी और वॉयस कमांड पर यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाती थी। इसी तरह 2004 में विल स्मिथ की फिल्म 'आई, रोबोट' में पूरी तरह कंप्यूटर से नियंत्रित और ऑटो-पायलट पर चलने वाली हाई-स्पीड गाड़ियां दिखाई गई थीं। उस दौर में यह विचार हास्यास्पद लगता था कि बिना ड्राइवर के स्टेयरिंग पकड़े कोई गाड़ी शहर की व्यस्त सड़कों पर सुरक्षित कैसे दौड़ सकती है। आज एलन मस्क की टेस्ला, गूगल की वेमो और अन्य वैश्विक ऑटोमोबाइल दिग्गज कंपनियों ने 'सेल्फ-ड्राइविंग ऑटोनॉमस कार' तकनीक को धरातल पर उतार दिया है। रडार, लिडार (LiDAR) सेंसर्स, 360-डिग्री कैमरों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दम पर आज गाड़ियां बिना इंसानी मदद के लेन बदल रही हैं, ट्रैफिक सिग्नल्स पहचान रही हैं और यात्रियों को सुरक्षित उनके गंतव्य तक पहुंचा रही हैं।

सुपरहीरो का वॉयस असिस्टेंट 'जार्विस' और चैटजीपीटी व जेनेरेटिव एआई का मौजूदा दौर

साल 2008 में जब मार्वल की फिल्म 'आयरन मैन' रिलीज हुई थी, तो दर्शकों को रॉबर्ट डाउनी जूनियर के किरदार टोनी स्टार्क से ज्यादा उनके आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस असिस्टेंट 'जार्विस' (J.A.R.V.I.S.) ने आकर्षित किया था। जार्विस कोई इंसान नहीं था, बल्कि एक सुपर-इंटेलिजेंट कंप्यूटर प्रोग्राम था जो टोनी स्टार्क की हर मौखिक आज्ञा को समझता था, विशाल डेटा का विश्लेषण सेकंडों में करता था, प्रयोगशाला के रोबोट्स को नियंत्रित करता था और बातचीत में इंसानों जैसा ह्यूमर भी दिखाता था। 1968 की '2001: ए स्पेस ओडिसी' का 'HAL 9000' कंप्यूटर भी इसी एआई परिकल्पना का पूर्वज था। आज महज दो दशकों के भीतर जेनेरेटिव एआई, चैटजीपीटी, जेमिनी और क्लाउड-बेस्ड न्यूरल नेटवर्क्स ने इस फिल्मी कल्पना को हर आम इंसान के फोन और लैपटॉप में स्थापित कर दिया है। आज आधुनिक एआई असिस्टेंट्स कोडिंग कर रहे हैं, मेडिकल डायग्नोसिस में डॉक्टरों की मदद कर रहे हैं, मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगा रहे हैं और प्राकृतिक इंसानी भाषा में किसी भी जटिल विषय पर तार्किक बातचीत कर रहे हैं।

भविष्य का कैनवास: जब इंसानी सोच बनेगी आने वाले कल का सबसे बड़ा विज्ञान

सिनेमाई आविष्कारों का यह सफर केवल यहीं थमता नजर नहीं आ रहा है। आज की फिल्मों में दिखाई जाने वाली क्वांटम टेलीपोर्टेशन, स्पेस टूरिज्म, इंसानी दिमाग में सीधे चिप लगाने वाली न्यूरो-टेक्नोलॉजी और 3D होलोग्राम्स पर भी वैश्विक प्रयोगशालाओं में युद्धस्तर पर काम जारी है। जेम्स कैमरून की फिल्म 'अवतार' में दिखाए गए बायोनिक एक्सोस्केलेटन आज दिव्यांगों और भारी वजन उठाने वाले सैनिकों के लिए हकीकत बन रहे हैं, जबकि 'स्टार वॉर्स' में प्रिंसेस लेइया का प्रोजेक्टेड थ्री-डायमेंशनल होलोग्राम आज मेडिकल सम्मेलनों और डिजिटल कंसर्ट्स में सजीव हो रहा है। यह पूरी यात्रा एक निर्विवाद सत्य को रेखांकित करती है कि विज्ञान की हर बड़ी खोज से पहले किसी कलाकार या लेखक की एक असीम कल्पना का जन्म होता है। जब तक मनुष्य का सिनेमा नए सपने देखता रहेगा, तब तक विज्ञान की प्रयोगशालाएं उन सपनों को सच करने के नए रास्ते तलाशती रहेंगी और यह साबित करती रहेंगी कि असंभव लगने वाली हर चीज असल में कल की हकीकत बनने की कतार में खड़ी एक संभावना भर है।