माउंट एवरेस्ट पर ग्लेशियर पिघला रहा इंसानी पेशाब! हिमालय की चोटियों पर मंडराया अजीबोगरीब खतरा

माउंट एवरेस्ट पर ग्लेशियर पिघला रहा इंसानी पेशाब! हिमालय की चोटियों पर मंडराया अजीबोगरीब खतरा

दुनिया के सबसे ऊंचे शिखर माउंट एवरेस्ट (8,848.86 मीटर) पर हर साल सैकड़ों पर्वतारोही अपने सपनों को पूरा करने पहुंचते हैं। लेकिन पर्वतारोहण के बढ़ते व्यावसायिक क्रेज ने हिमालय के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के सामने एक ऐसा अप्रत्याशित और अजीबोगरीब संकट खड़ा कर दिया है, जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। पर्यावरण वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि एवरेस्ट और उसके आसपास के कैंप्स में पर्वतारोहियों द्वारा किया जाने वाला इंसानी पेशाब (Human Urine) और मानव अपशिष्ट ग्लेशियरों को तेजी से पिघलाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।

ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन की मार पहले से झेल रहे हिमालय पर मानव जनित यह अपशिष्ट बर्फ की संरचना को रासायनिक रूप से कमजोर कर रहा है, जिससे एवरेस्ट का 'थर्ड पोल' कहे जाने वाला फ्रोजन रिजर्व तेजी से खतरे में पड़ रहा है।

यूरिन और मानव अपशिष्ट कैसे पिघला रहे हैं ग्लेशियर?

वैज्ञानिक शोधों और पर्वतारोहण विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक ऊंचाई और शून्य से नीचे के तापमान में मानव अपशिष्ट का व्यवहार सामान्य मैदानी इलाकों से बिल्कुल अलग होता है:

  • यूरिया और लवणों का रासायनिक प्रभाव: मानव मूत्र में भारी मात्रा में यूरिया, अमोनिया और सोडियम क्लोराइड (नमक) जैसे लवण होते हैं। विज्ञान का बुनियादी नियम है कि नमक और रासायनिक लवण बर्फ के जमाव बिंदु (Freezing Point) को कम कर देते हैं। जब हजारों लीटर यूरिन सीधे बर्फ की सतह पर गिरता है, तो यह वहां की प्राकृतिक बर्फ को रासायनिक रूप से पिघलाना (Chemical Melting) शुरू कर देता है।

  • तापमान का अंतर (Thermal Shock): मानव शरीर का तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस होता है। जब अत्यधिक ठंड (-20°C से -40°C) वाले ग्लेशियरों पर गर्म तरल पदार्थ लगातार डाला जाता है, तो यह बर्फ की गहरी परतों में दरारें और 'क्रैक्स' (Crevasses) पैदा करता है।

  • बर्फ का काला पड़ना और एल्बिडो इफेक्ट: मानव अपशिष्ट और गंदगी के जमाव के कारण शुद्ध सफेद बर्फ की सतह मटमैली और काली पड़ने लगती है। इससे बर्फ की सूर्य की किरणों को परावर्तित करने की क्षमता (Albedo Effect) घट जाती है और वह सूर्य की गर्मी को ज्यादा सोखने लगती है, जिससे सतह का तापमान बढ़ता है और ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं।

बेस कैंप से लेकर डेथ जोन तक: हर सीजन में हजारों लीटर अपशिष्ट

माउंट एवरेस्ट पर हर क्लाइंबिंग सीजन (खासकर अप्रैल और मई) में बेस कैंप, कैंप-1, कैंप-2, कैंप-3 और साउथ कोल (डेथ जोन) में लगभग 1,500 से अधिक पर्वतारोही, गाइड और शेरपा हफ्तों तक डेरा डालते हैं:

  • हजारों लीटर यूरिन का दबाव: एक अनुमान के अनुसार, पूरे सीजन के दौरान केवल एवरेस्ट बेस कैंप और उसके ऊपरी कैंप्स में पर्वतारोहियों द्वारा 50,000 लीटर से अधिक यूरिन बर्फ पर छोड़ा जाता है।

  • साउथ कोल (डेथ जोन) में विकट स्थिति: 8,000 मीटर से ऊपर स्थित कैंप-4 (साउथ कोल) में अत्यधिक ठंड और ऑक्सीजन की कमी के कारण पर्वतारोही किसी भी तरह के कचरा प्रबंधन के नियम का पालन नहीं कर पाते। वहां चारों तरफ फैला मानव मल-मूत्र और कचरा खुले आसमान के नीचे बर्फ में दब जाता है, जो गर्मियों में पिघलकर नीचे बहने लगता है।

निचले इलाकों में पानी के स्रोतों में घुल रहा जहर

यह संकट केवल एवरेस्ट की चोटियों तक सीमित नहीं है, बल्कि नीचे तराई में रहने वाले लाखों लोगों के जीवन पर भी सीधा प्रहार कर रहा है:

  • दूधकोशी और स्थानीय नदियों में प्रदूषण: एवरेस्ट के खूंभू ग्लेशियर से पिघलने वाला पानी दूधकोशी नदी और स्थानीय झरनों में जाता है, जो नामचे बाजार और पूरे खूंभू क्षेत्र के शेरपा समुदाय के लिए पीने के पानी का मुख्य स्रोत है।

  • बैक्टीरिया और बीमारियों का खतरा: अत्यधिक ठंड के कारण मानव अपशिष्ट में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया (जैसे ई-कोलाई) नष्ट नहीं होते, बल्कि बर्फ में सुरक्षित जम जाते हैं। जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो ये बैक्टीरिया पीने के पानी में घुलकर स्थानीय आबादी में जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ा रहे हैं।

नेपाल सरकार और अधिकारियों के नए नियम: क्या संभलेंगे हालात?

इस गंभीर चुनौती को देखते हुए नेपाल सरकार और स्थानीय पसांग ल्हामु ग्रामीण नगरपालिका ने हाल के वर्षों में सख्त नियम लागू किए हैं:

  • 'पूप बैग्स' (Wag Bags) का इस्तेमाल अनिवार्य: अब हर पर्वतारोही के लिए बेस कैंप से ऊपर जाते समय विशेष बायो-डिग्रेडेबल 'पूप बैग' ले जाना अनिवार्य कर दिया गया है, जिसमें विशेष रसायन होते हैं जो गंध को रोकते हैं और अपशिष्ट को ठोस बना देते हैं। पर्वतारोहियों को नीचे लौटते समय यह बैग वापस दिखाना होता है।

  • कचरा जमा राशि की जब्ती: जो टीमें या क्लाइंबर्स अपने कचरे और अपशिष्ट का उचित प्रबंधन नहीं करते, उनकी सिक्योरिटी डिपॉजिट जब्त कर ली जाती है।

  • यूरिन कलेक्शन यूनिट्स की मांग: वैज्ञानिक अब एवरेस्ट बेस कैंप में इको-फ्रेंडली यूरिन ट्रीटमेंट और कलेक्शन यूनिट्स लगाने की सिफारिश कर रहे हैं ताकि इस रासायनिक प्रदूषण को ग्लेशियरों की सतह पर सीधे मिलने से पूरी तरह रोका जा सके।

माउंट एवरेस्ट को फतह करने का इंसानी जुनून यदि इसी तरह प्रकृति के नियमों की अनदेखी करता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब हिमालय की ये प्राचीन और पवित्र बर्फ की चोटियां कचरे और पिघलते पानी के नालों में तब्दील हो जाएंगी।

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