अदालत में अधिकारी का चिल्लाना जजों को नहीं हुआ बर्दाश्त; सुप्रीम कोर्ट ने लगाई कड़ी फटकार, बोले- 'अपनी आवाज नीची रखिए
देश की सबसे बड़ी अदालत के भीतर गरिमा और शिष्टाचार (Court Decorum) से समझौता किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, यह सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कड़े शब्दों में साफ कर दिया है। एक संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत रूप से पेश हुए एक सरकारी अधिकारी द्वारा ऊंची आवाज में बोलने और आक्रामक तेवर दिखाने पर पीठ बुरी तरह नाराज हो गई।
न्यायाधीशों ने अधिकारी के इस आचरण पर सख्त ऐतराज जताते हुए तुरंत बीच में टोका और दो टूक कहा, "अपनी आवाज नीची रखिए। यह सुप्रीम कोर्ट है, कोई सड़क या मछली बाजार नहीं। अदालत के सामने खड़े होकर चिल्लाने या दबाव बनाने की कोशिश कतई स्वीकार नहीं की जाएगी।" पीठ की इस तल्ख टिप्पणी के बाद कोर्ट रूम में सन्नाटा पसर गया और अधिकारी को तत्काल अपना लहजा बदलते हुए माफी मांगने पर मजबूर होना पड़ा।
क्या था पूरा मामला और क्यों बढ़ा तनाव?
अदालत में प्रशासनिक आदेशों और जनहित से जुड़े एक मुकदमे की सुनवाई चल रही थी। संबंधित विभाग का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिकारी से जब जजों ने कुछ सीधे और तीखे सवाल पूछे, तो वह असहज हो गए:
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सवालों के जवाब में आक्रामक रुख: पीठ ने जब विभाग की कथित लापरवाही और आदेशों के पालन में हुई देरी को लेकर जवाबदेही तय करने की बात कही, तो अधिकारी ने खुद का बचाव करने के लिए तेज आवाज में बोलना शुरू कर दिया।
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दस्तावेजों को लेकर बहस: अधिकारी अपनी बात को सही ठहराने के लिए फाइलें लहराते हुए लगभग चिल्लाने के अंदाज में जजों के सामने अपनी दलीलें रखने लगे, जिससे कोर्ट की कार्यवाही में बाधा पैदा होने लगी।
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मर्यादा लांघने पर तुरंत हस्तक्षेप: जजों ने तुरंत कार्यवाही रोक दी और स्पष्ट किया कि एक उच्च पदस्थ प्रशासनिक अधिकारी से ऐसे अभद्र और अमर्यादित आचरण की कतई उम्मीद नहीं की जाती।
'पद की हनक बाहर छोड़ें, यह कानून का मंदिर है': पीठ की खरी-खरी
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मौजूद सभी वकीलों और अधिकारियों को अदालत के कायदे-कानून की याद दिलाते हुए कई तल्ख टिप्पणियां कीं:
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अदालत की गरिमा सर्वोच्च: पीठ ने कहा कि अधिकारी चाहे किसी भी पद या ओहदे पर हों, अदालत के भीतर वे केवल एक पक्षकार या गवाह हैं। अपनी प्रशासनिक हनक या पद का रुआब कोर्ट रूम के भीतर नहीं दिखाया जा सकता।
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संयम और तथ्य सबसे जरूरी: जजों ने नसीहत दी कि अगर किसी के पास कानूनी तथ्य और मजबूत दस्तावेज हैं, तो उसे चिल्लाने की जरूरत नहीं पड़ती। ठोस दलीलें शांत और संयमित आवाज में भी अदालत को प्रभावित करती हैं।
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अवमानना की सख्त चेतावनी: पीठ ने मौखिक रूप से यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि दोबारा इस तरह से अदालत के शिष्टाचार को तोड़ा गया या जजों की आवाज दबाने की कोशिश की गई, तो अदालत अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का नोटिस जारी करने से पीछे नहीं हटेगी।
सरकारी अधिकारियों के रवैये पर अक्सर उठते रहे हैं सवाल
यह पहला मौका नहीं है जब शीर्ष अदालत ने नौकरशाहों और सरकारी अधिकारियों के कोर्ट रूम में गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार पर नाराजगी जताई हो। इससे पहले भी कई मामलों में अदालती आदेशों की अनदेखी करने, हलफनामे दाखिल करने में टालमटोल करने या जजों के सामने अनुचित बॉडी लैंग्वेज दिखाने पर सुप्रीम कोर्ट अधिकारियों को सख्त फटकार लगा चुका है।
अदालत ने निर्देश दिया कि अधिकारी अपने विभाग की तरफ से केवल कानूनी और तथ्यात्मक जवाब दाखिल करें और भविष्य में कोर्ट की मर्यादा का पूरा ध्यान रखें। इसके बाद अधिकारी द्वारा हाथ जोड़कर बिना शर्त माफी मांगने पर पीठ ने मामले की आगे की सुनवाई निर्धारित तारीख के लिए टाल दी।