ISRO में 'सब कुछ प्राइवेट' होने की खबर पूरी तरह बेबुनियाद: स्पेस एजेंसी ने आधिकारिक बयान जारी कर किया साफ
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के निजीकरण और इसकी गतिविधियों को निजी कंपनियों के हवाले किए जाने को लेकर सोशल मीडिया और मीडिया के एक वर्ग में चल रही अटकलों पर स्पेस एजेंसी ने पूर्ण विराम लगा दिया है। एजेंसी के नौ कर्मचारी संगठनों द्वारा अध्यक्ष एवं अंतरिक्ष विभाग के सचिव को पत्र लिखकर भविष्य की सुरक्षा पर सवाल उठाए जाने के बाद, इसरो ने एक विस्तृत और आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया है। एजेंसी ने दो टूक शब्दों में कहा है कि इसरो के निजीकरण या उसकी भूमिका को कम करने की खबरें पूरी तरह "निराधार और गलत" हैं। इसरो देश का प्रमुख अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान बना रहेगा और चल रहे सुधारों का उद्देश्य एजेंसी का निजीकरण करना नहीं, बल्कि भारत के पूरे स्पेस इकोसिस्टम का विस्तार करना है।
'न निजीकरण होगा, न घटेगा महत्व': इसरो का आधिकारिक बयान
कर्मचारियों के पत्र और सार्वजनिक चिंताओं के जवाब में इसरो ने अपने बयान में स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा:
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निजीकरण की बात गलत: एजेंसी ने स्पष्ट किया कि न तो इसरो का निजीकरण किया जाएगा और न ही इसकी राष्ट्रीय महत्ता में कोई कमी आएगी।
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प्रमुख अनुसंधान संस्थान की भूमिका बरकरार: इसरो उन्नत अंतरिक्ष अनुसंधान (Advanced R&D), प्रौद्योगिकी विकास, राष्ट्रीय व रणनीतिक मिशनों, अंतरिक्ष विज्ञान और गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण (Space Exploration) के लिए भारत की सर्वोच्च संस्था बनी रहेगी।
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इकोसिस्टम का विस्तार, निजीकरण नहीं: अंतरिक्ष क्षेत्र में 2020 से शुरू किए गए सुधारों और 'भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023' का मकसद निजी क्षेत्र, स्टार्टअप्स और शिक्षा जगत को जोड़कर भारत के स्पेस इकोसिस्टम को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना है, न कि सरकारी एजेंसी को खत्म करना।
निजी कंपनियों को क्या काम मिलेगा और इसरो क्या करेगा?
इसरो और इन-स्पेस (IN-SPACe) के चेयरमैन पवन गोयनका ने इस विभाजन (Division of Work) को साफ-साफ समझाया है:
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निजी उद्योग और पीएसयू (Mature Technologies): जो तकनीकें पूरी तरह विकसित (Mature) और स्थापित हो चुकी हैं—जैसे नियमित सैटेलाइट्स का निर्माण और स्थापित रॉकेट्स (जैसे PSLV/GSLV) की असेंबली व उत्पादन—उन्हें उद्योग और सार्वजनिक उपक्रमों (जैसे NSIL) के जरिए बड़े पैमाने पर तैयार कराया जाएगा। इससे देश में मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी बढ़ेगी।
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इसरो का फोकस (Frontier Research): रोजमर्रा के विनिर्माण कार्यों का बोझ घटने से इसरो के वैज्ञानिक और इंजीनियर भविष्य की जटिल और अगली पीढ़ी की तकनीकों पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
'स्पेस विजन 2047': इसरो के कंधों पर हैं सबसे बड़े राष्ट्रीय मिशन
इसरो ने स्पष्ट किया कि आने वाले दशकों में एजेंसी की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ने वाली है। निजी कंपनियां केवल वाणिज्यिक और स्थापित उत्पादन का हिस्सा बन सकती हैं, लेकिन राष्ट्र के मुख्य वैज्ञानिक और रणनीतिक अभियानों का नेतृत्व केवल इसरो ही करेगा:
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भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS): वर्ष 2035 तक भारत का अपना स्थायी अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने का विशाल प्रोजेक्ट।
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मानवयुक्त चंद्र मिशन: वर्ष 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर सुरक्षित उतारने और वापस लाने की रूपरेखा।
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अगली पीढ़ी के रॉकेट और डीप स्पेस: नेक्स्ट-जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV), रीयूजेबल रॉकेट (RLV), चंद्रयान-4 (सैंपल रिटर्न मिशन), मार्स ऑर्बिटर मिशन-2 (MOM-2) और शुक्र मिशन (शुक्रयान) जैसे वैज्ञानिक कार्यक्रम पूरी तरह इसरो के वैज्ञानिक ही आगे बढ़ाएंगे।
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रणनीतिक और सुरक्षा क्षमताएं: राष्ट्रीय सुरक्षा, उन्नत रिमोट सेंसिंग, अत्याधुनिक नेविगेशन और रक्षा उपग्रहों के संचालन पर नियंत्रण पूरी तरह सरकार और इसरो के पास ही रहेगा।
क्यों खड़ा हुआ था विवाद?
यह पूरा विवाद तब गहराया था जब हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान उद्योग जगत को रॉकेट उत्पादन सौंपने के संदर्भ में यह टिप्पणी सामने आई थी कि भविष्य में इसरो पारंपरिक लॉन्च व्हीकल का निर्माण खुद नहीं करेगा। इसके बाद इसरो के नौ कर्मचारी संगठनों (जिनमें यूआरएससी, एसडीएससी शार, एलपीएससी आदि के संगठन शामिल थे) ने 4 सितंबर को चेयरमैन को पत्र भेजकर कर्मचारियों के भविष्य, पदोन्नति और सेवा सुरक्षा पर स्पष्टीकरण मांगा था।
इसरो और इन-स्पेस दोनों के आधिकारिक बयानों के बाद अब यह तस्वीर साफ हो चुकी है कि इसरो को किसी निजी हाथों में नहीं सौंपा जा रहा है, बल्कि उत्पादन और व्यावसायिक विस्तार का काम बाहर सौंपकर इसरो को अमेरिकी नासा (NASA) के मॉडल की तरह शुद्ध अनुसंधान, अत्याधुनिक नवाचार और ऐतिहासिक अंतरिक्ष अभियानों की मुख्य कमान सौंपी जा रही है।