स्वामी प्रसाद मौर्य पर सपा-कांग्रेस में छिड़ा सियासी संग्राम: अखिलेश की ना के बाद यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने की मुलाकात

स्वामी प्रसाद मौर्य पर सपा-कांग्रेस में छिड़ा सियासी संग्राम: अखिलेश की ना के बाद यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने की मुलाकात

उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीतिक बिसात बिछने से पहले ही विपक्षी दलों के 'इंडिया' गठबंधन के भीतर अंदरूनी खींचतान खुलकर सड़कों पर आ गई है। इस ताजा सियासी घमासान के केंद्र में हैं पूर्व कैबिनेट मंत्री और समाजवादी पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य, जिन्हें लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस नेतृत्व के बीच सीधा टकराव देखने को मिल रहा है। हाल ही में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मीडिया के सामने बेहद सख्त और दो टूक लहजे में ऐलान किया था कि स्वामी प्रसाद मौर्य उनके गठबंधन का हिस्सा बिल्कुल नहीं हैं। अखिलेश ने अपने चिर-परिचित अंदाज में यह तक कह दिया था कि कुछ लोग केवल अनावश्यक विवाद खड़ा करते हैं, इसलिए 'साइलेंस इज गोल्ड' का पालन करते हुए ऐसे लोगों को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाना चाहिए और वे सपा के कोटे की सीटों की गिनती में कहीं भी शामिल नहीं हो सकते। लेकिन अखिलेश के इस कड़े सार्वजनिक रुख और खुले विरोध के महज कुछ ही दिनों बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने लखनऊ में स्वामी प्रसाद मौर्य के निजी आवास पर जाकर उनसे औपचारिक और लंबी मुलाकात कर डाली। दोनों वरिष्ठ नेताओं की यह गर्मजोशी भरी तस्वीर जैसे ही सोशल मीडिया पर सार्वजनिक हुई, वैसे ही सपा और कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं से लेकर दोनों दलों के शीर्ष नीति निर्धारकों के बीच बेचैनी की लहर दौड़ गई और गठबंधन के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे।

'क्या दोस्तों से मिलना छोड़ दूं?': राजेंद्र पाल गौतम ने सपा पर साधा तीखा निशाना

स्वामी प्रसाद मौर्य से मुलाकात के बाद जब मीडिया ने कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम को घेरा और सपा मुखिया की नाराजगी को लेकर सवाल दागे, तो उन्होंने किसी भी तरह का रक्षात्मक रुख अपनाने के बजाय बेहद तल्ख और आक्रामक तेवर अख्तियार कर लिए। राजेंद्र पाल गौतम ने तीखे शब्दों में सवाल पूछा कि क्या वे अब अपने निजी मित्रों और सामाजिक न्याय के साथियों से मिलना-जुलना भी बंद कर दें? उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि राजनीति और चुनावी सीट-बंटवारा अपनी जगह है, लेकिन सामाजिक सरोकार और व्यक्तिगत संबंध अपनी जगह हैं। गौतम ने स्पष्ट किया कि स्वामी प्रसाद मौर्य उनके पुराने साथी हैं और दोनों नेता पूरे देश में दलितों, पिछड़ों और वंचितों के संवैधानिक अधिकारों व सामाजिक न्याय की लड़ाई दशकों से मिलकर लड़ते आ रहे हैं। उन्होंने सपा नेतृत्व पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे किससे मिलते हैं और किससे नहीं, यह पूरी तरह उनका व्यक्तिगत और राजनीतिक लोकतांत्रिक अधिकार है। गौतम ने साफ कहा कि अखिलेश यादव या समाजवादी पार्टी के नेता किस-किस राजनीतिक हस्ती से बंद कमरों में मुलाकात करते हैं, उस पर कांग्रेस पार्टी कभी रोक या पहरा नहीं लगाती, लिहाजा कांग्रेस नेताओं की बैठकों और मुलाकातों पर किसी भी सहयोगी दल की पाबंदी उन्हें कतई मंजूर नहीं है।

'न पिद्दी न पिद्दी का शोरबा': स्वामी प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव पर किया था सीधा वार

गौतम और मौर्य की इस मुलाकात की पृष्ठभूमि को समझने के लिए कुछ दिन पहले स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा अखिलेश यादव पर किए गए तीखे व्यक्तिगत हमले को जानना जरूरी है। अखिलेश द्वारा गठबंधन से बाहर किए जाने के बयान पर स्वामी प्रसाद मौर्य बुरी तरह भड़क गए थे और उन्होंने बेहद अमर्यादित और आक्रामक जुमले का इस्तेमाल करते हुए कहा था कि अखिलेश यादव 'न पिद्दी हैं और न पिद्दी का शोरबा'। मौर्य ने ताल ठोकते हुए कहा था कि इंडिया गठबंधन केवल समाजवादी पार्टी की बपौती नहीं है, बल्कि इस राष्ट्रीय गठबंधन के असली सूत्रधार और संयोजक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी हैं। मौर्य ने सनसनीखेज दावा किया था कि उन्होंने कभी भी अखिलेश यादव से कोई टिकट या सीट नहीं मांगी है, बल्कि उनकी सीधी बातचीत कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व—राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम से लगातार चल रही है। मौर्य ने सपा प्रमुख पर दलित और पिछड़ा विरोधी होने का आरोप लगाते हुए यहां तक कह दिया था कि जब अखिलेश यादव अपने सबसे निष्ठावान मुस्लिम चेहरे आजम खान के नहीं हुए, तो वे किसी अन्य पिछड़े वर्ग के नेता के क्या होंगे। ऐसे तीखे वाकयुद्ध के फौरन बाद कांग्रेस के यूपी प्रभारी का स्वामी मौर्य के घर जाना सपा कार्यकर्ताओं को खुलेआम चिढ़ाने और चुनौती देने जैसा नजर आया।

2027 चुनाव और सीट बंटवारे से पहले शक्ति संतुलन साधने में जुटी यूपी कांग्रेस

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ कांग्रेस की यह नजदीकी केवल एक शिष्टाचार मुलाकात नहीं है, बल्कि इसके पीछे राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान की एक बेहद सोची-समझी रणनीतिक योजना काम कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा के साथ मिलकर 6 सीटें जीतने के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का आत्मविश्वास काफी बढ़ चुका है। पार्टी अब आगामी विधानसभा चुनाव में खुद को महज सपा की पिछलग्गू पार्टी बनकर 20-30 सीटों पर सिमटने देना नहीं चाहती। खुद राजेंद्र पाल गौतम पहले ही यह बयान दे चुके हैं कि यूपी में कांग्रेस कम से कम 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की नैतिक और सांगठनिक हकदार है। स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे जमीनी, आक्रामक और गैर-यादव ओबीसी (मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी) समाज में व्यापक पकड़ रखने वाले नेता को अपने पाले में खड़ा करके कांग्रेस सपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना चाहती है। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि यदि स्वामी प्रसाद मौर्य, चंद्रशेखर आजाद और अन्य छोटे सामाजिक दलों का एक मंच कांग्रेस के साथ तैयार हो जाता है, तो सीट-शेयरिंग की मेज पर अखिलेश यादव को कांग्रेस की शर्तों को मानने के लिए विवश होना पड़ेगा।

पीडीए (PDA) बनाम सामाजिक न्याय: क्या दरक जाएगा सपा-कांग्रेस का गठबंधन?

अखिलेश यादव जहां एक तरफ 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे के दम पर उत्तर प्रदेश में सत्ता वापसी का सपना देख रहे हैं, वहीं कांग्रेस भी अपने पारंपरिक दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक को दोबारा अपने पाले में खींचने के लिए हर संभव प्रयोग कर रही है। दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री और प्रमुख बौद्ध व दलित एक्टिविस्ट राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का प्रभारी बनाए जाने के पीछे भी कांग्रेस का मकसद बसपा के कमजोर होने के बाद खाली हुए दलित स्पेस पर पूरी तरह कब्जा जमाना है। लेकिन अखिलेश यादव के लिए स्वामी प्रसाद मौर्य का साथ एक बड़ा राजनीतिक खतरा माना जाता है। रामचरितमानस और हिंदू सनातन परंपराओं पर स्वामी प्रसाद मौर्य की तीखी टिप्पणियों के चलते 2022 और 2024 में सपा को उच्च वर्ग और सवर्ण हिंदू मतदाताओं की भारी नाराजगी का सामना करना पड़ा था। यही वजह है कि अखिलेश अब हिंदू विरोधी ठप्पे से बचने के लिए मौर्य से सुरक्षित दूरी बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन कांग्रेस द्वारा उसी स्वामी मौर्य को गले लगाने से अखिलेश यादव के चुनावी समीकरण गड़बड़ा सकते हैं। यदि यह गतिरोध जल्द नहीं सुलझा, तो आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश में विपक्षी गठबंधन की दरारें और गहरी हो सकती हैं, जिसका सीधा चुनावी लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिलना तय माना जा रहा है।