बसपा में उत्तराधिकारी की छटपटाहट, लेकिन ‘माया’ को अपनी ‘छाया’ पर ही ज्यादा भरोसा; जानें क्या है रणनीति

बसपा में उत्तराधिकारी की छटपटाहट, लेकिन ‘माया’ को अपनी ‘छाया’ पर ही ज्यादा भरोसा; जानें क्या है रणनीति

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चार बार सत्ता के शीर्ष पर रहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती की कार्यशैली हमेशा से अप्रत्याशित और सख्त फैसलों के लिए जानी जाती है। पार्टी के भीतर जब-जब नंबर दो या उत्तराधिकारी को लेकर चर्चाएं तेज होती हैं, मायावती का कोई न कोई ऐसा फैसला सामने आ जाता है जो राजनीतिक पंडितों के सारे समीकरण ध्वस्त कर देता है। पिछले कुछ चुनावों में पार्टी के घटते वोट बैंक और कैडर की सुस्ती के बीच बसपा के भीतर एक युवा और आक्रामक नेतृत्व की छटपटाहट साफ दिखाई दे रही है।

कार्यकर्ताओं और युवा समर्थकों को लगता है कि डिजिटल युग की राजनीति में पार्टी को एक ऐसा चेहरा चाहिए जो सड़कों पर संघर्ष करता दिखे और सोशल मीडिया पर विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब दे सके। हालांकि, पार्टी के शीर्ष स्तर पर घटते-बढ़ते घटनाक्रम यह स्पष्ट संदेश देते हैं कि 'माया' को किसी और के बजाय अपनी ही 'छाया' और अपने बनाए एकाधिकार वाले अनुशासन पर ही सबसे ज्यादा भरोसा है।

आकाश आनंद का प्रयोग: ताजपोशी से लेकर निष्कासन और फिर वापसी की रस्साकशी

मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को जब राष्ट्रीय समन्वयक बनाकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, तब राजनीतिक गलियारों में इसे बसपा के नए युग की शुरुआत माना गया। आकाश ने रैलियों में मुखरता दिखाई, युवाओं को जोड़ने की कोशिश की और सीधे तौर पर सत्ता पक्ष पर तीखे प्रहार करने शुरू किए।

लेकिन जैसे ही आकाश के बयानों ने जरूरत से ज्यादा सुर्खियां बटोरीं और प्रशासन ने उन पर मुकदमे दर्ज किए, मायावती ने बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें अपरिपक्व बताते हुए सभी अहम पदों और उत्तराधिकार की रेस से बाहर कर दिया था। हालांकि बाद में सियासी मजबूरी और कैडर के दबाव के बीच उनकी वापसी तो हुई, लेकिन पार्टी में उनका कद अब पहले जैसा निर्विवाद नहीं रहा। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि बसपा में 'सुप्रीमो' के समानांतर किसी भी दूसरे चेहरे की धमक स्वीकार्य नहीं है, भले ही वह परिवार का ही खून क्यों न हो।

संगठन में किसी को नहीं पनपने दिया 'नंबर 2': इतिहास दोहराती मायावती की कार्यप्रणाली

बसपा का तीन दशकों से ज्यादा का इतिहास गवाह है कि जिसने भी पार्टी में मायावती के कद के आसपास आने की कोशिश की, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। चाहे वह कभी पार्टी की रीढ़ माने जाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य रहे हों, नसीमुद्दीन सिद्दीकी हों, लालजी वर्मा, राम अचल राजभर या फिर इंद्रजीत सरोज—कांशीराम के दौर से उभरे इन सभी कद्दावर नेताओं को धीरे-धीरे किनारे लगा दिया गया।

मौजूदा दौर में भी पार्टी में प्रदेश अध्यक्ष या प्रभारियों के नाम केवल कागजों और रैलियों के संचालन तक सीमित रहते हैं। सभी बड़े राजनीतिक फैसले—चाहे वह गठबंधन से दूरी बनाना हो, टिकटों का वितरण हो या फिर प्रेस नोट जारी करना—आज भी पूरी तरह मायावती के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं। पार्टी की बैठकों में कार्यकर्ताओं और नेताओं के मोबाइल फोन तक ले जाने की मनाही वाला कड़ा अनुशासन यह साफ करता है कि संगठन में सूचना और शक्ति का केंद्र सिर्फ और सिर्फ एक ही है।

जमीन पर घटता जनाधार और 2027 के विधानसभा चुनाव की दोहरी चुनौती

बसपा के सामने मौजूदा वक्त सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा का दौर है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में लगातार गिरते ग्राफ ने दलित राजनीति के पारंपरिक आधार पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चंद्रशेखर आजाद जैसे युवा दलित नेताओं की अपनी जमीन तैयार करने की कोशिशें और समाजवादी पार्टी के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने बसपा के कोर वोट बैंक में जबरदस्त सेंध लगाई है।

कैडर चाहता है कि मायावती खुद जमीन पर उतरें, लगातार जिलों का दौरा करें और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करें। लेकिन मायावती की रणनीति अब भी पुराने 'कैडर कैंप' और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक ही सीमित नजर आती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराधिकार की अस्पष्टता और आंतरिक लोकतंत्र के अभाव के चलते पार्टी का युवा समर्थक निराश होकर दूसरे विकल्पों की ओर रुख कर रहा है।

क्या बदलेगा बसपा का मिजाज या पुरानी लीक पर ही लड़ी जाएगी सियासी जंग?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने लगी है। ऐसे में यह सवाल सबसे बड़ा है कि क्या मायावती अपने कार्य करने के तौर-तरीकों में कोई लचीलापन लाएंगी या फिर अपने पुराने ढर्रे पर ही संगठन को चलाएंगी?

पार्टी के भीतर से आ रही आवाजें साफ इशारा करती हैं कि बिना एक मजबूत, स्वतंत्र और सक्रिय नेतृत्व की अगली कतार खड़े किए, विरोधियों के आक्रामक चुनावी तंत्र से निपटना असंभव होगा। लेकिन फिलहाल के संकेत यही हैं कि मायावती किसी भी प्रयोग से ज्यादा अपनी स्थापित शैली और अपने ही निर्णयों की 'छाया' में पार्टी का भविष्य तलाश रही हैं, जिससे उत्तराधिकार की छटपटाहट अभी पार्टी के भीतर सुलगती ही रहेगी।

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