90 अमेरिकी नेताओं का बड़ा ऐलान: RSS और जुड़े संगठनों से नहीं लेंगे राजनीतिक चंदा, मोहन भागवत के यूएस दौरे के बाद गरमाई सियासत

90 अमेरिकी नेताओं का बड़ा ऐलान: RSS और जुड़े संगठनों से नहीं लेंगे राजनीतिक चंदा, मोहन भागवत के यूएस दौरे के बाद गरमाई सियासत

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के पटल पर एक बार फिर भारतीय सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस (RSS) को लेकर अमेरिका में तीखी बहस छिड़ गई है। अमेरिका के विभिन्न राज्यों में फैले लगभग 90 निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, सांसदों, सीनेट उम्मीदवारों और स्थानीय स्तर के नेताओं ने एक संयुक्त प्रतिज्ञा लेते हुए यह औपचारिक घोषणा की है कि वे भविष्य में आरएसएस या उससे जुड़े किसी भी सहयोगी संगठन और व्यक्तियों से मिलने वाले राजनीतिक चंदे को स्वीकार नहीं करेंगे। इस चौंकाने वाले और कड़े राजनीतिक कदम के बाद वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब संघ प्रमुख मोहन भागवत के उत्तरी अमेरिका दौरे और न्यूयॉर्क में आयोजित एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम के बाद वहां का राजनीतिक वातावरण गरमाया हुआ है।

मोहन भागवत का अमेरिका दौरा और मैडिसन स्क्वायर गार्डन का आयोजन

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का हालिया अमेरिका और कनाडा दौरा रहा है। संघ की शताब्दी वर्ष की वैश्विक पहुंच और विस्तार योजनाओं के तहत, मोहन भागवत ने 29 अगस्त को न्यूयॉर्क शहर के प्रतिष्ठित मैनहट्टन इलाके स्थित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित 'यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत की थी। इस कार्यक्रम का आयोजन 'अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग' (AHEAD) फोरम द्वारा किया गया था, जिसका उद्देश्य प्रवासी भारतीयों के बीच संवाद और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा देना था। हालांकि, इस कार्यक्रम और संघ प्रमुख की उपस्थिति का अमेरिका के कुछ नागरिक अधिकार समूहों और वाम झुकाव वाले संगठनों द्वारा कड़ा विरोध किया गया था। इस कार्यक्रम के तुरंत बाद, अमेरिकी राजनीतिक हलकों में आरएसएस के प्रभाव को सीमित करने के उद्देश्य से एक बड़ा अभियान शुरू कर दिया गया।

किन प्रमुख नेताओं और संगठनों ने लिया चंदा न लेने का संकल्प?

आरएसएस से जुड़े वित्तीय योगदान को पूरी तरह से ठुकराने का यह अभियान मुख्य रूप से 'हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स एक्शन' और 'साउथ आशियान अमेरिकन कोएलिशन टू रिन्यू डेमोक्रेसी Acts' यानी 'SACRED Acts' जैसे वकालत करने वाले समूहों के नेतृत्व में शुरू किया गया था। इन समूहों द्वारा जारी एक छह पन्नों की प्रेस विज्ञप्ति और संयुक्त घोषणापत्र के अनुसार, अमेरिका के आठ प्रमुख राज्यों से ताल्लुक रखने वाले डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों दलों के राजनेताओं ने इस प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर किए हैं। इस बड़े समूह में अमेरिकी कांग्रेस के जाने-माने सदस्य भी शामिल हैं। कैलिफोर्निया से प्रभावशाली अमेरिकी प्रतिनिधि रो खन्ना और वाशिंगटन से सांसद प्रमिला जयपाल जैसे भारतीय मूल के शीर्ष डेमोक्रेटिक नेता इस अभियान में सबसे आगे नजर आए हैं। इसके अलावा मिशिगन से सीनेट उम्मीदवार अब्दुल एल-सैयद और इलिनोइस की प्रतिनिधि रॉबिन केली समेत कई स्थानीय मेयर और राज्य विधायिका के सदस्य भी इस संकल्प से जुड़े हैं। इन नेताओं ने स्पष्ट किया है कि वे न केवल भविष्य में ऐसा कोई फंड स्वीकार नहीं करेंगे, बल्कि यदि अतीत में ऐसा कोई चंदा मिला भी है, तो उसे या तो वापस लौटा दिया जाएगा या फिर लोकतंत्र समर्थक संगठनों को दान कर दिया जाएगा।

भारतीय मूल के अमेरिकी नेताओं की दोहरी भूमिका और तीखे बयान

इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में भारतीय मूल के अमेरिकी सांसदों की भूमिका सबसे अधिक चर्चा का विषय बनी हुई है। सांसद प्रमिला जयपाल ने इस अभियान का समर्थन करते हुए सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि वह आरएसएस से जुड़ी किसी भी प्रकार की वित्तीय मदद को अपने चुनाव प्रचार में इस्तेमाल नहीं करेंगी और अपने साथी सहयोगियों से भी ऐसा ही करने का आह्वान करती हैं। वहीं, कैलिफोर्निया के सांसद रो खन्ना ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आरएसएस वह संगठन है जिसकी विचारधारा से जुड़े तत्वों का इतिहास चिंताजनक रहा है, इसलिए अमेरिकी चुनावों में इस प्रकार की विचारधारा या उससे जुड़े वित्तीय नेटवर्क को अनुचित प्रभाव नहीं डालने दिया जाना चाहिए। रो खन्ना ने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने एक ऐसे चंदे को वापस कर दिया है जो कथित रूप से आरएसएस से संबंध रखने वाले एक उद्योगपति से जुड़ा हुआ था। इन बयानों ने अमेरिका में रह रहे भारतीय प्रवासियों और राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक दूरियों को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।

हिंदू-अमेरिकी संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया और आरोपों का दौर

दूसरी ओर, 90 अमेरिकी नेताओं के इस कदम और मानवाधिकार समूहों की इस पहल को लेकर हिंदू-अमेरिकी समुदाय और विभिन्न प्रमुख संगठनों ने बेहद कड़ी आपत्ति जताई है। 'हिंदू अमेरिकन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी' (HAPAC) और 'हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन' जैसी संस्थाओं ने इस पूरी मुहिम को एकतरफा, भेदभावपूर्ण और पूर्वाग्रह से ग्रसित करार दिया है। एचएपीएसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि इस प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर करने वाले कई नेताओं, विशेषकर भारतीय मूल के सांसदों को कट्टरपंथी और वामपंथी संगठनों द्वारा गुमराह किया गया है और उन पर अनावश्यक राजनीतिक दबाव बनाया गया है। हिंदू संगठनों का तर्क है कि इस प्रकार के अभियानों के जरिए विशेष रूप से केवल हिंदू-अमेरिकी दानदाताओं और नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है, जो अमेरिकी बहुसंस्कृतिवाद और समानता के मूल्यों के बिल्कुल खिलाफ है। उनका कहना है कि इस तरह के एजेंडे अमेरिका में रहने वाले शांतिप्रिय हिंदू समुदाय के खिलाफ एक प्रकार की वैचारिक शत्रुता और 'हिंदूफोबिया' को बढ़ावा दे रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) की संलिप्तता और भू-राजनीतिक प्रभाव

इस पूरे विवाद के दौरान अमेरिका के सरकारी आयोग 'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम' (USCIRF) की भूमिका भी खासी विवादास्पद रही है। संघ प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिकी दौरे से ठीक पहले इस आयोग ने अमेरिकी सरकार से यह सिफारिश की थी कि संघ से जुड़े नेताओं को किसी भी प्रकार की आधिकारिक कूटनीति या राजनयिक सम्मान न दिया जाए और धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों को लेकर संघ के सदस्यों पर लक्षित प्रतिबंध (Targeted Sanctions) लगाने पर विचार किया जाए। हालांकि अमेरिकी सरकार ने इस तरह के आयोगों की सिफारिशों को सीधे तौर पर स्वीकार नहीं किया है, फिर भी इन संस्थाओं के बयानों ने वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में माहौल को गरमाने का काम जरूर किया है। भारत सरकार ने पहले भी इन अंतरराष्ट्रीय आयोगों की रिपोर्टों को खारिज करते हुए इन्हें पूर्वाग्रह से ग्रसित और जमीनी वास्तविकताओं से कोसों दूर बताया है।

अमेरिकी डायस्पोरा और भविष्य की राजनीति पर इसका असर

यह घटना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका में रहने वाला भारतीय प्रवासी समुदाय अब राजनीतिक रूप से एकजुट होने के साथ-साथ गंभीर वैचारिक और आंतरिक विभाजन का सामना भी कर रहा है। एक तरफ जहां पारंपरिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के नाम पर विभिन्न संगठन अपनी जड़ें मजबूत करने में लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका की मुख्यधारा की राजनीति में भारत की घरेलू राजनीतिक विचारधाराओं का प्रवेश एक संवेदनशील मुद्दा बनता जा रहा है। आगामी अमेरिकी चुनावों और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से इस प्रकार के संकल्प और प्रतिज्ञाएं उम्मीदवारों की फंडिंग और समर्थन आधार को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकती हैं। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह विवाद केवल चंदे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अमेरिका में रह रहे दक्षिण एशियाई डायस्पोरा के राजनीतिक भविष्य और उनकी प्राथमिकताओं को भी गहराई से तय करेगा।

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