आजाद बलूचिस्तान पर पाकिस्तान ने कैसे किया था कब्जा? जानिए 1948 के विलय का सच और आज की अंतहीन लड़ाई की वजह
दक्षिण एशिया का सबसे अशांत और रणनीतिक रूप से संवेदनशील इलाका बलूचिस्तान (Balochistan) एक बार फिर वैश्विक विमर्श के केंद्र में है। क्षेत्रफल के लिहाज से यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा, लेकिन आबादी के मामले में सबसे छोटा प्रांत है। आज यह क्षेत्र पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान की सीमाओं के बीच बंटा हुआ है। ऐतिहासिक रूप से समृद्ध और प्राकृतिक संसाधनों से लबालब इस क्षेत्र में जारी गृहयुद्ध और अलगाववादी आंदोलन के पीछे 1948 की एक ऐसी घटना है, जिसे बलूच राष्ट्रवादी आज भी 'जबरन कब्जा' मानते हैं।
इतिहास का पन्ना: जब कलात के खान ने घोषित की थी आजादी
ब्रिटिश हुकूमत के दौर में बलूचिस्तान के इलाके में कई छोटी-बड़ी रियासतें हुआ करती थीं, जिनमें सबसे शक्तिशाली और केंद्रीय दर्जा 'कलात रियासत' (Princely State of Kalat) को प्राप्त था।
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11 अगस्त 1947: भारत और पाकिस्तान के विभाजन और औपचारिक गठन से ठीक तीन दिन पहले, कलात के शासक (खान) ने बलूचिस्तान को एक पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया था।
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स्वतंत्र अस्तित्व: विभाजन के बाद शुरुआती कुछ महीनों तक कलात ने स्वयं को एक संप्रभु और आजाद मुल्क के तौर पर संचालित किया। इस दौरान पाकिस्तान के साथ उसके भविष्य के संबंधों को लेकर कूटनीतिक बातचीत के कई दौर चले।
27 मार्च 1948: स्वैच्छिक विलय या सैन्य दबाव का खेल?
पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद मोहम्मद अली जिन्ना और पाकिस्तानी हुकूमत ने कलात पर विलय के लिए भारी दबाव बनाना शुरू किया। कलात के खान शुरुआत में एक स्वतंत्र देश का दर्जा बनाए रखने पर अड़े हुए थे।
आखिरकार 27 मार्च 1948 को कलात के खान अहमद यार खान ने पाकिस्तान के साथ विलय पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए।
दो अलग-अलग नैरेटिव: इस ऐतिहासिक घटना को लेकर आज भी दो परस्पर विरोधी मत हैं। पाकिस्तान का आधिकारिक रुख कहता है कि यह एक पूरी तरह 'स्वैच्छिक और कानूनी विलय' था। इसके विपरीत, बलूच राष्ट्रवादी नेताओं, मानवाधिकार संगठनों और स्वतंत्र इतिहासकारों का स्पष्ट दावा है कि कलात के खान को चारों तरफ से घेरकर राजनीतिक ब्लैकमेलिंग और सैन्य ताकत के दम पर इस कागजात पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया गया था।
विलय के तुरंत बाद भड़का पहला विद्रोह और अंतहीन सशस्त्र संघर्ष
पाकिस्तानी हुकूमत के इस कदम को बलूचिस्तान की अवाम ने कभी स्वीकार नहीं किया। विलय के फौरन बाद कलात के खान के सगे भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने इस फैसले को बगावत की संज्ञा दी और पाकिस्तान के खिलाफ पहला सशस्त्र विद्रोह छेड़ दिया।
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तब से लेकर आज तक (1950, 1960, 1970 के दशक और विशेषकर 2000 के बाद) बलूचिस्तान ने पांच बड़े सशस्त्र अलगाववादी आंदोलनों का सामना किया है।
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आज बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे कई भूमिगत संगठन ऐतिहासिक आधार पर पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को लेकर पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा एजेंसियों के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध लड़ रहे हैं।
आज किस बात को लेकर हो रही है लड़ाई?
बलूचिस्तान में चल रहे वर्तमान संघर्ष के पीछे तीन सबसे बड़े कारण हैं:
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संसाधनों की लूट (Resource Exploitation): बलूचिस्तान प्राकृतिक गैस, तांबा (Copper), सोना (Gold) और मूल्यवान खनिजों के विशाल भंडारों से समृद्ध है। बलूच लोगों का आरोप है कि उनके इन बहुमूल्य संसाधनों का इस्तेमाल पंजाब और सिंध प्रांतों को अमीर बनाने के लिए किया जाता है, जबकि स्थानीय बलूच आबादी आज भी बुनियादी बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के लिए तरस रही है।
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चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC): बलूचिस्तान के रणनीतिक ग्वादर पोर्ट (Gwadar Port) पर चीन के बढ़ते नियंत्रण और सीपीईसी परियोजनाओं का स्थानीय लोग कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि इस परियोजना से सिर्फ चीनी कंपनियों और पाकिस्तानी सेना को फायदा हो रहा है, जबकि बलूच मछुआरों और स्थानीय नागरिकों को उनकी ही जमीन से बेदखल किया जा रहा है।
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मानवाधिकार उल्लंघन और मिसिंग पर्सन्स (Enforced Disappearances): बलूच एक्टिविस्ट्स का आरोप है कि पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों, बुद्धिजीवियों और युवाओं को जबरन उठा लेती है (Enforced Disappearances)। हजारों बलूच नागरिक सालों से लापता हैं, जिन्हें लेकर महरंग बलूच जैसे युवा नेता आज सड़कों पर शांतिपूर्ण मार्च निकाल रहे हैं।
सुरक्षा और राजनीति के लिहाज से यह क्षेत्र आज पाकिस्तान की सबसे कमजोर नस बन चुका है, और 1948 के उस विवादित विलय की गूंज 2026 में भी उतनी ही तीखी सुनाई दे रही है।