जिहादी नेटवर्क, हथियारों की लूट और बढ़ता कट्टरपंथ: क्या राजनीतिक उथल-पुथल के बीच बांग्लादेश बन रहा है भारत के लिए एक नया और गंभीर सुरक्षा खतरा?

जिहादी नेटवर्क, हथियारों की लूट और बढ़ता कट्टरपंथ: क्या राजनीतिक उथल-पुथल के बीच बांग्लादेश बन रहा है भारत के लिए एक नया और गंभीर सुरक्षा खतरा?

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में इन दिनों जबरदस्त उथल-पुथल मची हुई है और इसका सबसे बड़ा केंद्र हमारा पड़ोसी देश बांग्लादेश बन गया है। हाल के दिनों में बांग्लादेश ने जिस अभूतपूर्व राजनीतिक अस्थिरता, हिंसक प्रदर्शनों और सत्ता परिवर्तन के दौर को देखा है, उसने न केवल उस देश की आंतरिक व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि भारत के लिए भी एक बहुत बड़ा और बहुआयामी सुरक्षा संकट पैदा कर दिया है। जब भी किसी देश में सत्ता का शून्य पैदा होता है या कानून-व्यवस्था चरमराती है, तो उसका सबसे पहला फायदा कट्टरपंथी और राष्ट्र-विरोधी ताकतें उठाती हैं। बांग्लादेश में भी ठीक ऐसा ही हो रहा है। खुफिया एजेंसियों की ताजा रिपोर्ट्स इस बात का साफ इशारा कर रही हैं कि वहां की जेलों से कई खूंखार चरमपंथियों के फरार होने और अतिवादी संगठनों के दोबारा सक्रिय होने से सीमा पार से घुसपैठ का खतरा कई गुना बढ़ गया है। भारत और बांग्लादेश के बीच 4,096 किलोमीटर लंबी एक बेहद जटिल और खुली सीमा है, जो पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम से होकर गुजरती है। इस लंबी और नदी-नालों से घिरी सीमा पर चौकसी बरतना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। अब जब उस पार कट्टरपंथी तत्व सिर उठा रहे हैं, तो नई दिल्ली के रणनीतिकारों और सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ना लाजमी है, क्योंकि यह केवल एक पड़ोसी देश का आंतरिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि सीधे तौर पर भारत की संप्रभुता और शांति के लिए एक चेतावनी बन चुका है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) पर मंडराता सबसे बड़ा सामरिक खतरा

इस पूरे परिदृश्य में भारत के लिए जो सबसे बड़ा और संवेदनशील चिंता का विषय है, वह है 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर', जिसे सामरिक भाषा में 'चिकन नेक' भी कहा जाता है। यह मात्र 20 से 22 किलोमीटर चौड़ा एक बेहद संकरा भू-भाग है, जो भारत की मुख्य भूमि को पूर्वोत्तर के सातों राज्यों (सेवन सिस्टर्स) से जोड़ता है। इस कॉरिडोर के एक तरफ नेपाल और दूसरी तरफ बांग्लादेश की सीमा लगती है, जबकि इसके ठीक ऊपर भूटान और चीन की मौजूदगी है। सुरक्षा विशेषज्ञों और भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बांग्लादेश में जिहादी ताकतों का प्रभाव बढ़ता है और वे सीमावर्ती इलाकों में अपने सुरक्षित ठिकाने बनाने में कामयाब हो जाते हैं, तो उनका सीधा निशाना यह सिलीगुड़ी कॉरिडोर हो सकता है। किसी भी युद्ध या तनाव की स्थिति में यदि शत्रु ताकतें या आतंकी संगठन इस संकरे रास्ते को बाधित करने में सफल हो जाते हैं, तो पूर्वोत्तर भारत का शेष देश से संपर्क पूरी तरह कट सकता है। यही कारण है कि बांग्लादेश में पनप रहा कट्टरपंथ भारत के लिए केवल एक कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक गहरे सामरिक खतरे की घंटी है। भारतीय सेना और सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने इस खतरे को भांपते हुए इस पूरे कॉरिडोर के आसपास अपनी रणनीतिक तैनाती और खुफिया नेटवर्क को पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक और मजबूत कर दिया है।

जेएमबी (JMB) और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम जैसे आतंकी नेटवर्कों का खतरनाक मकड़जाल

बांग्लादेश में चरमपंथ का इतिहास कोई नया नहीं है, लेकिन वर्तमान हालात ने इन स्लीपर सेल्स और जिहादी नेटवर्कों को एक नई ऊर्जा और खुला मैदान दे दिया है। जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB), नियो-जेएमबी और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (अंसार अल-इस्लाम) जैसे खूंखार आतंकी संगठन अब फिर से अपनी जड़ों को मजबूत कर रहे हैं। इन संगठनों का मुख्य उद्देश्य केवल बांग्लादेश में ही अस्थिरता फैलाना नहीं है, बल्कि 'गज़वा-ए-हिंद' जैसी चरमपंथी विचारधाराओं के तहत भारत के सीमावर्ती राज्यों में अपने नेटवर्क का विस्तार करना भी है। पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद और असम के धुबरी जैसे सीमावर्ती जिले पहले भी इन संगठनों की घुसपैठ और नकली नोटों की तस्करी का गवाह बन चुके हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, ये जिहादी नेटवर्क अब सोशल मीडिया और डार्क वेब का सहारा लेकर युवाओं का तेजी से ब्रेनवॉश (Radicalization) कर रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि बांग्लादेश में प्रशासन की पकड़ ढीली होने के कारण ये संगठन सीमा पार से अपने गुर्गों को भारत में धकेलने की लगातार कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे यहां छिपकर बड़े आतंकी हमलों की साजिश रच सकें। इन नेटवर्कों का यह मकड़जाल भारत के सामाजिक सद्भाव और आंतरिक सुरक्षा तंत्र के लिए एक ऐसा अदृश्य जहर बन रहा है, जिसे रोकने के लिए खुफिया एजेंसियों को दिन-रात एक करने पड़ रहे हैं।

हथियारों की खुली लूट और पूर्वोत्तर भारत में अवैध तस्करी का बढ़ता खौफ

बांग्लादेश के मौजूदा हालात ने एक और बेहद गंभीर और डरावने खतरे को जन्म दिया है, और वह है हथियारों की खुली लूट। हिंसक प्रदर्शनों के दौरान बांग्लादेश के कई पुलिस थानों, शस्त्रागारों और सुरक्षा बलों के कैंपों पर भीड़ द्वारा हमले किए गए और वहां से भारी मात्रा में आधुनिक हथियार और गोला-बारूद लूटा गया। सुरक्षा एजेंसियों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि लूटे गए ये खतरनाक हथियार आखिर जाएंगे कहां? इस बात की पूरी आशंका है कि हथियारों का यह जखीरा अंतरराष्ट्रीय तस्करों के जरिए ब्लैक मार्केट में बेचा जाएगा और इसकी एक बड़ी खेप अवैध रास्तों से पूर्वोत्तर भारत में प्रवेश कर सकती है। पूर्वोत्तर भारत में पहले से ही कई उग्रवादी गुट सक्रिय हैं, जो हमेशा आधुनिक हथियारों की तलाश में रहते हैं। यदि बांग्लादेश से लूटे गए ये हथियार असम, मणिपुर या नगालैंड के विद्रोही गुटों के हाथ लग गए, तो वहां चल रहे शांति प्रयासों को भारी झटका लगेगा और हिंसा का एक नया दौर शुरू हो सकता है। इसके अलावा, ये हथियार पश्चिम बंगाल और बिहार के संगठित आपराधिक गिरोहों तक भी पहुँच सकते हैं। सीमा पार से होने वाली हथियारों की इस तस्करी को रोकना सीमा सुरक्षा बल के लिए इस वक्त की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि घने जंगलों और नदियों के बीच से हथियारों की छोटी खेप को पकड़ना भूसे के ढेर में सूई ढूँढने जैसा है।

भारत का कड़ा रुख: सीमा पर हाई अलर्ट और भविष्य की रणनीतिक चुनौतियां

अपने पड़ोसी देश में बिगड़ते इन हालात को देखते हुए भारत सरकार और गृह मंत्रालय ने बिल्कुल जीरो टॉलरेंस की नीति अपना ली है। बांग्लादेश से लगने वाली पूरी सीमा पर हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है। सीमा सुरक्षा बल (BSF) की अतिरिक्त टुकड़ियों को तैनात किया गया है और जवानों की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं। घुसपैठ की किसी भी कोशिश को नाकाम करने के लिए नाइट विजन कैमरे, थर्मल इमेजिंग सेंसर, ड्रोन्स और लेजर फेंसिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का चौबीसों घंटे इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी सूरत में अवैध घुसपैठ या सीमा पार से होने वाली किसी भी संदिग्ध गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही, भारत अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंचों पर भी लगातार यह मुद्दा उठा रहा है कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होना चाहिए। भारत की खुफिया एजेंसियां- रॉ (RAW) और आईबी (IB) लगातार बांग्लादेश के सुरक्षा हालातों की पल-पल की मॉनिटरिंग कर रही हैं। यह स्पष्ट है कि जब तक बांग्लादेश में पूरी तरह से राजनीतिक स्थिरता नहीं आ जाती और वहां का प्रशासन कट्टरपंथी ताकतों और हथियारों की लूट पर लगाम नहीं लगाता, तब तक भारत के लिए यह नया सुरक्षा खतरा बना रहेगा। यह समय भारत के लिए केवल बचाव का नहीं, बल्कि एक बेहद आक्रामक और सक्रिय कूटनीतिक तथा सामरिक रणनीति अपनाने का है, ताकि देश की सीमाओं और नागरिकों की सुरक्षा को पूरी तरह से सुनिश्चित किया जा सके।

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