पाकिस्तान में बड़े आंतरिक संकट की आहट, रावलपिंडी में 6 महीने के लिए अचानक क्यों बुलाई गई सेना? आर्टिकल 245 लागू होने से मचा हड़कंप

पाकिस्तान में बड़े आंतरिक संकट की आहट, रावलपिंडी में 6 महीने के लिए अचानक क्यों बुलाई गई सेना? आर्टिकल 245 लागू होने से मचा हड़कंप

पाकिस्तान के सत्ता के गलियारों, सैन्य प्रतिष्ठान और राजधानी से सटे गैरिसन शहर रावलपिंडी में एक बार फिर बड़े सियासी और सुरक्षा संकट के बादल घने हो गए हैं। पाकिस्तान की संघीय सरकार ने गृह मंत्रालय के माध्यम से एक बेहद चौंकाने वाला और असाधारण अधिसूचना जारी करते हुए रावलपिंडी जिले में अगले छह महीनों के लिए पाकिस्तानी सेना की तीन कंपनियों को तैनात करने की औपचारिक मंजूरी दे दी है। संविधान के अनुच्छेद 245 के तहत सेना को नागरिक प्रशासन की मदद के लिए बुलाया गया है। इस अप्रत्याशित फैसले ने पूरे पाकिस्तान में हलचल मचा दी है, क्योंकि रावलपिंडी कोई आम शहर नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय (GHQ) और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की कैदगाह (अदियाला जेल) इसी शहर में स्थित है। रक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम के पीछे सिर्फ सुरक्षा का सामान्य प्रोटोकॉल नहीं, बल्कि देश में गहराते किसी बहुत बड़े आंतरिक विद्रोह या प्रशासनिक नाकामी की आशंका छिपी हुई है।

संविधान के अनुच्छेद 245 के तहत 6 महीने के लिए सेना तैनात: गृह मंत्रालय की अधिसूचना में क्या?

पाकिस्तान के आंतरिक और नारकोटिक्स नियंत्रण मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, पंजाब प्रांतीय सरकार के गृह विभाग के अनुरोध पर यह कदम उठाया गया है। पंजाब सरकार ने रावलपिंडी जिले में 'संवेदनशील सुरक्षा जिम्मेदारियों' और 'अप्रत्याशित आपातकालीन परिस्थितियों' से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए सेना की तैनाती की मांग की थी।

संघीय सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 245 के तहत प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सेना की टुकड़ियों को तुरंत प्रभाव से छह महीने के लिए सिविल प्रशासन की सहायता में तैनात कर दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सरकारी आदेश में किसी विशेष खतरे या घटना का सीधा उल्लेख नहीं किया गया है, बल्कि केवल 'अवांछनीय परिस्थितियों' से बचने की बात कही गई है। आम तौर पर सेना को मोहर्रम या बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के समय कुछ दिनों के लिए बुलाया जाता है, लेकिन सीधे छह महीनों के लिए सेना को शहर की कमान सौंपना यह स्पष्ट करता है कि सुरक्षा एजेंसियां किसी दीर्घकालिक और गंभीर संकट का सामना कर रही हैं।

रावलपिंडी में सुरक्षा बलों पर फायरिंग: उस घटना ने कैसे बढ़ाई बेचैनी?

रावलपिंडी में सेना उतारने के इस फैसले को पिछले दिनों शहर में हुई एक घातक सुरक्षा घटना से सीधे तौर पर जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ ही दिन पहले रावलपिंडी के एक संवेदनशील इलाके में सुरक्षा बलों के काफिले पर एक हथियारबंद शख्स ने अचानक अंधाधुंध गोलीबारी कर दी थी। जवाबी कार्रवाई में हमलावर को मार गिराया गया था, लेकिन इस गोलीबारी में एक सुरक्षाकर्मी की जान चली गई थी।

सरकारी मीडिया और सुरक्षा एजेंसियों ने दावा किया कि मारा गया हमलावर खैबर जिले का रहने वाला था और वह पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) का सक्रिय कार्यकर्ता था, जिसके पास से पार्टी का झंडा और हथियार बरामद हुए। हालांकि, पीटीआई नेतृत्व ने इस आरोप को सिरे से खारिज करते हुए इसे सरकार की साजिश करार दिया। लेकिन इस घटना ने सैन्य मुख्यालय के ठीक नाक के नीचे सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को पूरी तरह उजागर कर दिया, जिसके बाद सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और गृह मंत्रालय ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह अपने हाथ में लेने का फैसला किया।

जीएचक्यू (GHQ) और अदियाला जेल: रावलपिंडी की संवेदनशीलता क्यों है सबसे ज्यादा?

रावलपिंडी पाकिस्तान का सबसे संवेदनशील सैन्य और प्रशासनिक केंद्र है। यहीं पर सेना का मुख्य मुख्यालय जनरल हेडक्वार्टर्स (GHQ), ज्वाइंट स्टाफ हेडक्वार्टर्स, रणनीतिक योजना प्रभाग (SPD) और कई अन्य महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठान मौजूद हैं। 9 मई 2023 को इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद भड़की हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों ने सीधे जीएचक्यू के मुख्य द्वार पर हमला कर दिया था, जिसे पाकिस्तानी सेना अपने इतिहास का सबसे बड़ा काला धब्बा मानती है।

इसके अलावा, रावलपिंडी की अदियाला जेल में इमरान खान पिछले तीन साल से कैद हैं। इमरान खान की अदियाला जेल में मौजूदगी के चलते रोजाना हजारों की संख्या में उनके समर्थक, पार्टी के बड़े नेता, अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कानूनी टीमें इसी शहर का रुख करती हैं। हाल ही में इमरान खान की तबीयत बिगड़ने और उन्हें आधी रात को अस्पताल ले जाए जाने के बाद से अदियाला जेल के बाहर तनाव चरम पर है। सैन्य प्रतिष्ठान को यह डर सता रहा है कि यदि जेल के आसपास कोई हिंसक प्रदर्शन या सुरक्षा चूक होती है, तो उसका सीधा असर सैन्य प्रतिष्ठानों पर पड़ सकता है।

इमरान खान की पार्टी के बड़े आंदोलन की आहट और शहबाज सरकार का खौफ

सेना की इस छह महीने की लंबी तैनाती के पीछे पीटीआई के आगामी राष्ट्रव्यापी मार्च और विरोध प्रदर्शनों को भी मुख्य वजह माना जा रहा है। इमरान खान की पार्टी ने हाल ही में घोषणा की है कि वे सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की कथित अवमानना, मानवाधिकार हनन और इमरान खान को उचित मेडिकल सुविधाएं न दिए जाने के खिलाफ इस्लामाबाद और रावलपिंडी की तरफ एक विशाल मार्च निकालने जा रहे हैं।

खैबर पख्तूनख्वा से हजारों की संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं के इस्लामाबाद कूच करने की योजना है। चूंकि रावलपिंडी और इस्लामाबाद आपस में जुड़े हुए 'ट्विन सिटीज' हैं, इसलिए प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए स्थानीय पुलिस और फ्रंटियर कोर (FC) पूरी तरह नाकाम साबित हो रही थीं। शहबाज शरीफ की प्रांतीय और संघीय सरकार को आशंका है कि अगर भीड़ रावलपिंडी में दाखिल हो गई तो कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो सकती है। इसी संभावित जन-आंदोलन को कुचलने और शहर को छावनी में तब्दील करने के लिए सेना के बूटों की थाप को आगे किया गया है।

कानून-व्यवस्था का संकट या तख्तापलट जैसी स्थिति का पूर्वाभ्यास?

पाकिस्तानी राजनीति के जानकारों का मानना है कि अनुच्छेद 245 का लागू होना किसी भी लोकतांत्रिक देश में सिविल प्रशासन की विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। पाकिस्तान में सेना ने अपने 78 साल के इतिहास में तीन दशकों से ज्यादा समय तक सीधे तौर पर शासन किया है। जब-जब सिविल सरकारें कमजोर होती हैं और सेना को कानून-व्यवस्था संभालने के लिए सड़कों पर उतारा जाता है, तब-तब सत्ता के केंद्र में सेना का नियंत्रण पूरी तरह स्थापित हो जाता है।

विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि शहबाज शरीफ सरकार अपनी गिरती लोकप्रियता और अवाम के गुस्से का सामना करने में असमर्थ है, इसलिए वह सेना की आड़ में छिपकर शासन चलाना चाहती है। 6 महीने की यह लंबी अवधि यह भी दर्शाती है कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान में कई कड़े और अलोकप्रिय फैसले लिए जा सकते हैं, जिनमें राजनीतिक गिरफ्तारियां, इंटरनेट पर सख्त पाबंदियां और विरोध प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध शामिल हो सकता है।

आर्थिक बदहाली और राजनीतिक गतिरोध के बीच चौतरफा घिरे आसिम मुनीर

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है जब पाकिस्तान इतिहास के सबसे भयावह आर्थिक संकट, महंगाई और बाहरी कर्ज के दबाव से जूझ रहा है। बलूचिस्तान में विद्रोही लगातार सुरक्षा बलों और चीनी नागरिकों को निशाना बना रहे हैं, जबकि खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के हमले दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं।

देश के पश्चिमी सीमांत क्षेत्रों में जारी भारी अशांति के बीच अब देश के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले दिल यानी रावलपिंडी में सेना की नियमित तैनाती यह साबित करती है कि सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सामने चुनौतियां अब सीमाओं से निकलकर सीधे उनके अपने दरवाजों तक पहुंच चुकी हैं।

पाकिस्तान के भविष्य पर गहराते सवाल: क्या और बिगड़ेंगे हालात?

रावलपिंडी में भारी हथियारों और बख्तरबंद गाड़ियों के साथ सेना के उतरने के बाद शहर में अघोषित आपातकाल जैसा सन्नाटा और तनाव देखा जा रहा है। प्रमुख चौराहों, अदियाला जेल के संपर्क मार्गों और संवेदनशील इमारतों के बाहर सेना ने अपने चेकपोस्ट स्थापित कर लिए हैं।

आने वाले दिन पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं। यदि पीटीआई के समर्थक सड़कों पर उतरते हैं और सेना के साथ उनका सीधा टकराव होता है, तो यह स्थिति देश को एक और बड़े गृहयुद्ध और अराजकता के दलदल में धकेल सकती है। फिलहाल, 6 महीने के लिए सेना को मिले असीमित अधिकारों ने यह साफ कर दिया है कि पाकिस्तान में कानून-व्यवस्था की डोर अब पूरी तरह से बंदूकों के हाथ में सौंप दी गई है।

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