रुपाली गांगुली की तस्वीरों के गलत इस्तेमाल पर कोर्ट सख्त, आपत्तिजनक कंटेंट हटाने का आदेश, मगर इन्हें मिली छूट

रुपाली गांगुली की तस्वीरों के गलत इस्तेमाल पर कोर्ट सख्त, आपत्तिजनक कंटेंट हटाने का आदेश, मगर इन्हें मिली छूट

टीवी जगत की मशहूर अभिनेत्री और घर-घर में 'अनुपमा' के नाम से अपनी पहचान बनाने वाली रुपाली गांगुली की पर्सनालिटी राइट्स (Personality Rights) और डिजिटल निजता से जुड़े मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम और कड़ा फैसला सुनाया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बनी अश्लील डीपफेक तस्वीरों, मॉर्फ्ड वीडियो और बिना अनुमति व्यवसायिक विज्ञापनों में उनकी तस्वीरों के अवैध इस्तेमाल के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने तुरंत संज्ञान लिया है। अदालत ने गूगल, रेडिट, मेटा, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और दूरसंचार विभाग (DoT) समेत तमाम ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को अभिनेत्री की आपत्तिजनक सामग्री और अनधिकृत लिंक को इंटरनेट से तुरंत हटाने और ब्लॉक करने का सख्त आदेश दिया है। हालांकि, अदालत ने अपने इस आदेश में स्पष्ट किया है कि वास्तविक खबर, निष्पक्ष आलोचना, पैरोडी और मीम्स जैसे रचनात्मक कंटेंट को इस पाबंदी से छूट मिलेगी, ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता के अधिकार के बीच संतुलन बना रहे।

एआई डीपफेक और अश्लील मॉर्फिंग पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

डिजिटल युग में एआई तकनीक के दुरुपयोग से परेशान होकर रुपाली गांगुली ने अपने वकील के माध्यम से बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी याचिका में आरोप लगाया गया था कि कई एडल्ट वेबसाइट्स, फर्जी ऑनलाइन बुटीक, सेलिब्रिटी बुकिंग प्लेटफॉर्म्स और मोबाइल ऐप्स उनकी पहचान, चेहरे और तस्वीरों का इस्तेमाल उनकी अनुमति के बिना कर रहे हैं। एआई जनरेटेड अश्लील तस्वीरों और फर्जी एंडोर्समेंट के जरिए उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही थी। बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस की सिंगल बेंच ने मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए अंतरिम राहत जारी की और स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति की सहमति के बिना उसकी तस्वीर, आवाज और व्यक्तिगत पहचान का व्यावसायिक लाभ या अश्लीलता फैलाने के लिए इस्तेमाल करना कानूनी रूप से पूरी तरह गलत और अधिकारों का हनन है।

आपत्तिजनक सामग्री हटाने का फरमान, लेकिन इन्हें मिली राहत

अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले ने जहां फर्जी कंटेंट बनाने वालों पर नकेल कसी है, वहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी पूरा ध्यान रखा है। बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के तहत गूगल, सर्च इंजन, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और सरकारी विभागों को निर्देश दिया गया है कि वे अभिनेत्री से जुड़ी आपत्तिजनक और भ्रामक लिंक्स को तुरंत टेक-डाउन करें। हालांकि, अदालत ने अपने आदेश में यह साफ किया है कि समाचार रिपोर्टिंग, व्यंग्य (Satire), निष्पक्ष टिप्पणी और मनोरंजन के उद्देश्य से बनाए जाने वाले मीम्स पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा। यानी आम जनता और मीडिया संस्थान अभिव्यक्ति के दायरे में रहकर उनके अभिनय और सार्वजनिक जीवन पर सकारात्मक चर्चा जारी रख सकते हैं। इस छूट ने यह साबित कर दिया है कि न्यायपालिका निजता के अधिकार की रक्षा करते हुए प्रेस और अभिव्यक्ति की आजादी का पूरा सम्मान करती है।

डिजिटल पर्सनालिटी राइट्स और बॉलीवुड में बढ़ता लीगल ट्रेंड

हाल के दिनों में एआई टेक्नोलॉजी और डीपफेक तकनीक के आने के बाद भारतीय फिल्म और टीवी जगत के कई बड़े सितारों को अपनी छवि और आवाज के दुरुपयोग का सामना करना पड़ा है। रुपाली गांगुली से पहले बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन, अनिल कपूर और दक्षिण भारतीय अभिनेत्री सामंथा प्रभु जैसे दिग्गज कलाकार भी अपने पर्सनालिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए उच्च न्यायालयों की शरण में जा चुके हैं। इन सभी मामलों में अदालतों ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी भी सेलिब्रिटी का नाम, चेहरा, शैली और आवाज उनकी बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) है, जिस पर उनका एकाधिकार है। बिना किसी वैध लाइसेंस या लिखित अनुमति के इन एट्रिब्यूट्स का इस्तेमाल करके आर्थिक कमाई करना या अश्लीलता फैलाना पूरी तरह से गैर-कानूनी है।

डिजिटल सुरक्षा और एआई दुरुपयोग के खिलाफ नया मोड़

रुपाली गांगुली का यह मामला न केवल मनोरंजन जगत बल्कि पूरे डिजिटल तंत्र के लिए एक नया नजीर साबित होने जा रहा है। आज जिस तरह से एआई तकनीक का इस्तेमाल आम और खास लोगों के चेहरे और पहचान को बदलने के लिए किया जा रहा है, उसने साइबर सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। इस फैसले के बाद अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और बिचौलियों (Intermediaries) को अपनी जिम्मेदारियों को लेकर और अधिक सतर्क होना पड़ेगा। यदि कोई प्लेटफॉर्म अपने सर्वर से आपत्तिजनक और डीपफेक सामग्री को समय पर हटाने में नाकाम रहता है, तो उसे भी कानूनी नतीजों का सामना करना पड़ सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे सख्त न्यायिक आदेशों से देश में डिजिटल निजता, साइबर कानून और एआई एथिक्स को नई दिशा मिलेगी।