रणबीर कपूर के कंधों पर 'रामायण' का सबसे बड़ा भार, 5 सीन्स में समझिए राम के रोल में कितने फिट बैठे एक्टर
भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी किसी सबसे बड़े और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का जिक्र होगा, तो निर्देशक नितेश तिवारी की आगामी मेगा-बजट फिल्म 'रामायण' का नाम सबसे ऊपर आएगा। सदियों से भारतीय संस्कृति, आस्था और नैतिक मूल्यों की आधारशिला रही महाकाव्य 'रामायण' को बड़े पर्दे पर जीवंत करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। इस भव्य प्रोजेक्ट में भगवान श्रीराम की ऐतिहासिक और अत्यंत संवेदनशील भूमिका निभाने की जिम्मेदारी अभिनेता रणबीर कपूर के कंधों पर है। जब से फिल्म से जुड़ी पहली झलक और सेट की तस्वीरें लीक हुई हैं, तब से देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सिनेप्रेमियों के बीच एक ही सवाल गूंज रहा है कि क्या रणबीर कपूर मर्यादा पुरुषोत्तम राम के किरदार के साथ पूरा न्याय कर पाएंगे? इस महागाथा की विशालता को देखते हुए फिल्म के पांच चुनिंदा और बेहद अहम दृश्यों (Scenes) के जरिए यह समझना बहुत दिलचस्प हो जाता है कि रणबीर कपूर इस प्रतिष्ठित भूमिका के लिए कितने सटीक और अचूक विकल्प साबित हुए हैं।
पहला सीन: बाल्यकाल की सौम्यता और विश्वामित्र के साथ वन गमन का प्रसंग
राम की छवि का सबसे पहला और मुख्य पहलू उनकी वह सौम्य, शांत और विनम्र मुस्कान है जो उनके भीतर की असीम ऊर्जा को छिपाए रखती है। 'रामायण' के शुरुआती दृश्यों में जब महर्षि विश्वामित्र अयोध्या के राजा दशरथ से अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राजकुमार राम को मांगते हैं, तो एक किशोर राम की आंखों में जो निडरता और पिता के वचनों के प्रति समर्पण भाव दिखाई देता है, वह इस किरदार की नींव है। रणबीर कपूर की आंखों की गहराई और उनकी नेचुरल अभिनय शैली इस भाव को पर्दे पर जीवंत करने के लिए पूरी तरह मुफीद बैठती है। बिना किसी संवाद के केवल अपनी देहभाषा और चेहरे के भावों से उस शालीनता को प्रदर्शित करना जहां किसी भी बड़े अभिनेता के लिए एक चुनौती हो सकता है, वहीं रणबीर ने अपनी सूक्ष्म अभिनय कला (Subtle Acting) के जरिए यह साबित कर दिया है कि वे केवल एक स्टार नहीं बल्कि एक परिपक्व चरित्र अभिनेता हैं।
दूसरा सीन: धनुर्विद्या की पराकाष्ठा और शिवधनुष भंग का ऐतिहासिक क्षण
किसी भी महानायक की पहचान उसके पराक्रम और उसकी ताकत से होती है, लेकिन राम के चरित्र की विशेषता यह है कि उनकी ताकत में अहंकार का नामोनिशान नहीं होता। सीता स्वयंवर के दौरान जब पूरा राजा-महाराजाओं का समाज और रावण जैसे पराक्रमी राजा भी भगवान शिव के पिनाक धनुष को हिला तक नहीं पाते, तब गुरु के आदेश पर शांत चित्त से आगे बढ़ने वाले राम का वह क्षण भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट है। इस दृश्य में रणबीर कपूर के शरीर की बनावट, उनका स्थिर ठहराव और धनुष उठाते समय उनके चेहरे पर झलकता एकाग्रता का भाव दर्शकों के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है। इस सीन में न केवल एक्शन की भव्यता है, बल्कि उस मर्यादा का पालन भी है जो एक चक्रवर्ती सम्राट के पुत्र और ईश्वर के अवतार में होनी चाहिए, जिसे रणबीर ने बेहद करीने से निभाया है।
तीसरा सीन: राज्याभिषेक की पूर्व संध्या पर पिता को दिए गए वचन का निर्वहन
भारतीय मानस में राम का चरित्र अगर सबसे ज्यादा आदरणीय है, तो उसका कारण उनका त्याग है। जिस सुबह अयोध्या के सिंहासन पर उनका राज्याभिषेक होना था, ठीक उसी रात कैकेयी के वचनों के कारण चौदह वर्ष का वनवास मिलने पर चेहरे पर बिना किसी शिकन या शिकयत के राजा के वस्त्र त्यागकर वल्कल वस्त्र (छाल के कपड़े) धारण करने का दृश्य हर दर्शक की आंखें नम कर देता है। इस अत्यंत कठिन और भावुक दृश्य में रणबीर कपूर की अभिनय क्षमता अपनी चरम सीमा पर नजर आती है। एक तरफ सिंहासन खोने का कोई दुख नहीं और दूसरी तरफ माता-पिता के वचनों को सर्वोपरि रखने का अटूट संकल्प—इन दोनों विरोधी भावनाओं के बीच का संतुलन रणबीर ने जिस शालीनता से पर्दे पर उतारा है, वह उनके अभिनय के मुकुट में एक नया रत्न जड़ देता है।
चौथा सीन: पंचवटी का वनवास और सीता हरण के वक्त का प्रलयकारी आक्रोश
वनवास के दौरान शांत और मुनि तुल्य जीवन बिताने वाले राम का रूप तब पूरी तरह बदल जाता है जब रावण उनकी प्रिय पत्नी माता सीता का छलपूर्वक अपहरण कर लेता है। पंचवटी की कुटिया सूखी देखकर और सीता को न पाकर राम के भीतर जो वात्सल्य और प्रेम का ज्वार उमड़ता है, वह तुरंत एक विकराल और न्यायप्रिय योद्धा के क्रोध में बदल जाता है। इस दृश्य में रणबीर कपूर का वह आक्रामक रूप देखने को मिलता है जो आज से पहले उनके किसी भी रोमांटिक या शहरी चरित्र में नहीं देखा गया था। एक तरफ प्रिय के वियोग का असहनीय दर्द और दूसरी तरफ अधर्म का नाश करने के लिए ब्रह्मांड को हिला देने वाला संकल्प—इन दोनों के मिले-जुले रूपों को रणबीर ने अपनी आवाज की भारी गूंज और आंखों की लाली से जीवंत कर दिखाया है।
पांचवा सीन: लंका विजय और धर्म की पुनर्स्थापना के बाद का शांत और तपोमय रूप
युद्ध के मैदान में रावण का वध करने और लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद का दृश्य इस महाकाव्य का सबसे शांत और दार्शनिक चरण है। सब कुछ जीतने के बाद भी राम के चेहरे पर कोई विजय का घमंड नहीं होता, बल्कि उनके भीतर वही पुरानी करुणा, अपने भाइयों और सेना के प्रति प्रेम और प्रजा के प्रति कर्तव्य बोध साफ झलकता है। इस अंतिम चरण में रणबीर कपूर ने जिस परिपक्वता और ठहराव का प्रदर्शन किया है, वह यह साबित करता है कि उन्होंने इस किरदार को केवल एक नौकरी की तरह नहीं बल्कि एक साधना की तरह निभाया है। इन पांचों प्रमुख दृश्यों के माध्यम से यह स्पष्ट हो जाता है कि 'रामायण' के इस वृहद प्रोजेक्ट में राम के रूप में रणबीर कपूर का चयन निर्देशक का एक मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ है, जो बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रचने के साथ-साथ दर्शकों के दिलों पर भी अमिट छाप छोड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है।