'जब खतरे में हो वोट तो नहीं रह सकते चुप': 'चलो दिल्ली रामलीला मार्च' के समर्थन में उतरीं ममता बनर्जी
देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), लाखों मतदाताओं के नाम कथित तौर पर काटे जाने और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर केंद्र सरकार और समूचे विपक्ष के बीच आर-पार की जंग छिड़ चुकी है। आगामी 1 नवंबर को दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में विपक्षी 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन द्वारा आयोजित होने वाले विशाल 'चलो दिल्ली रामलीला मार्च' को अब पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी का भी खुला और पुरजोर समर्थन मिल गया है। सोशल मीडिया मंच पर एक बेहद भावुक और आक्रामक अपील जारी करते हुए ममता बनर्जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब देश के नागरिकों का वोट ही खतरे में डाल दिया गया हो, तब खामोश रहना कोई विकल्प नहीं हो सकता। ममता ने देश के तमाम प्रबुद्ध नागरिकों, छात्र संगठनों, युवाओं और लोकतांत्रिक शक्तियों से दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस मार्च में एकजुट होने का आह्वान किया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा शुरू किए गए इस आंदोलन को ममता बनर्जी का सीधा साथ मिलना विपक्षी एकता के लिहाज से एक बहुत बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है, जिसने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग पर चौतरफा राजनीतिक दबाव बना दिया है।
'चुप्पी कोई विकल्प नहीं': जानिए ममता बनर्जी ने अपनी अपील में क्या-क्या कहा?
ममता बनर्जी ने अपने आधिकारिक बयान में मतदान के अधिकार को भारतीय संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की सबसे मजबूत बुनियाद करार दिया। उन्होंने कहा कि बीते कुछ समय से जिस तरह से मतदाता सूचियों में मनमाने बदलाव किए जा रहे हैं, गरीबों, अल्पसंख्यकों और हाशिए पर खड़े लोगों के नाम वोटर लिस्ट से गायब किए जा रहे हैं और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक गारंटी पर सवाल खड़े हो रहे हैं, वह देश के हर जागरूक नागरिक के लिए गहरी चिंता का विषय है। ममता ने लिखा, "जब आपका वोट ही सुरक्षित न रहे, तो चुप बैठना लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा। 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित हो रहा मार्च केवल किसी एक या दो राजनीतिक दलों का शक्ति प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस नागरिक का साझा मंच है जो अपनी आवाज और अपने अधिकार की रक्षा करना चाहता है।" उन्होंने सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक विचारधारा के लोगों से अपील की कि वे इस ऐतिहासिक मार्च में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर यह साबित करें कि देश की जनता अपने संवैधानिक अधिकारों पर हो रहे किसी भी हमले को बर्दाश्त नहीं करेगी।
1 नवंबर को रामलीला मैदान में विपक्ष का महामंथन: 'जन संसद' की तर्ज पर तैयार हुआ ब्लू प्रिंट
इंडिया ब्लॉक द्वारा 1 नवंबर को दोपहर 12:30 बजे आयोजित किए जा रहे 'चलो दिल्ली रामलीला मार्च' की तैयारियां राष्ट्रीय राजधानी में युद्ध स्तर पर चल रही हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इस महारैली की अगुवाई कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, इस पूरे प्रदर्शन को एक अनोखे और प्रतीकात्मक स्वरूप में ढाला गया है। रामलीला मैदान के विशाल मंच को संसद की कार्यवाही (पार्लियामेंट्री सेशन) की तरह व्यवस्थित किया जाएगा, जहां देश के ज्वलंत मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष की भूमिकाओं को दर्शाते हुए जनता के वास्तविक सवालों पर बहस होगी। इस प्रदर्शन में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, आम आदमी पार्टी, आरजेडी, वामपंथी दलों और शिवसेना (यूबीटी) सहित गठबंधन के तमाम प्रमुख घटक दलों के शीर्ष सांसद, पूर्व केंद्रीय मंत्री और देश भर से आए छात्र संगठनों (जैसे आइसा और एनएसयूआई) के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे।
राहुल गांधी का छात्रों और युवाओं को सीधा संदेश: 'लाठियों और पुलिस से मत डरो, दिल्ली चलो'
इस महारैली को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक विशेष वीडियो संदेश जारी करते हुए देश के आम नागरिकों, खासकर छात्र-छात्राओं और नौजवानों को निर्भीक होकर दिल्ली पहुंचने का न्योता दिया है। दिल्ली पुलिस द्वारा अनुमति और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर जताई जा रही चिंताओं के बीच राहुल गांधी ने आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ाते हुए कहा, "पुलिस की चिंता मत कीजिए, लाठियों की चिंता मत कीजिए। भाजपा और सत्ता में बैठे लोगों में इतनी हिम्मत नहीं होगी कि वे जनता के इस शांतिपूर्ण और संवैधानिक मार्च पर कोई जोर-जबर्दस्ती कर सकें। हमारे साथ मार्च में कदम से कदम मिलाकर चलिए, हम सब मिलकर भारतीय राष्ट्र और संविधान की रक्षा के लिए आगे बढ़ेंगे।" राहुल गांधी ने कहा कि यह मार्च उन सभी लोगों का साझा मंच है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानी कार्यशैली से तंग आ चुके हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जब लाखों लोग एक साथ सड़कों पर उतरते हैं, तो बड़ी से बड़ी सत्ता को जनता की आवाज के आगे झुकना ही पड़ता है।
क्यों निशाने पर हैं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और क्या है SIR विवाद?
विपक्ष के इस देशव्यापी आक्रोश के केंद्र में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयोग द्वारा चलाया जा रहा 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) अभियान है। विपक्षी दलों का सीधा आरोप है कि आयोग ने पारदर्शी प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए राज्यों में उन मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर सूची से हटा दिए हैं जिन्हें विपक्ष का पारंपरिक समर्थक माना जाता है। राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के नेताओं का कहना है कि जब इस संबंध में आयोग से लिखित सवाल पूछे गए और सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की गई, तो ज्ञानेश कुमार ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। इसके अलावा, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की नियुक्तियों की वैधता और योग्यता पर सवाल उठाए गए हैं। विपक्ष का कहना है कि जब तक चुनाव आयोग अपने फैसलों में पारदर्शिता नहीं लाता या विवादित नीतियों पर रोक नहीं लगाता, तब तक यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है।
दिवाली बाजार बनाम महारैली: व्यापारियों की चिंता के बीच विपक्ष का कड़ा रुख
इस महाप्रदर्शन को लेकर दिल्ली के व्यापारिक हलकों में भी भारी हलचल मची हुई है। दिल्ली के प्रमुख व्यापारिक संगठन 'चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री' (CTI) ने राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं को दो बार औपचारिक पत्र लिखकर इस मार्च को दिवाली के बाद यानी 10 नवंबर तक टालने की अपील की थी। व्यापारियों का तर्क था कि दिवाली से ठीक पहले का यह सप्ताहांत दिल्ली के बाजारों के लिए करीब 10,000 करोड़ रुपये के कारोबार का समय होता है, और मध्य दिल्ली में इतनी बड़ी भीड़ जुटने से भीषण जाम लगेगा जिससे त्योहारी खरीदारी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, विपक्षी नेताओं ने इस पर स्पष्ट किया कि उनका मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण, अनुशासित और संविधान के दायरे में होगा। राहुल गांधी ने व्यापारियों के प्रति पूरा सम्मान जताते हुए कहा कि आंदोलन आम जनता या व्यापारियों को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि उनके वोट के उस बुनियादी अधिकार को बचाने के लिए है जिसके बिना किसी भी नागरिक की सुरक्षा और सम्मान संभव नहीं है।
ममता बनर्जी द्वारा 'चलो दिल्ली रामलीला मार्च' को खुला समर्थन दिए जाने के बाद इस आंदोलन ने अब एक नया राष्ट्रीय आयाम ले लिया है। पश्चिम बंगाल में पार्टी के भीतर चल रही आंतरिक खींचतान के बीच ममता का यह कदम दर्शाता है कि जब बात लोकतंत्र और चुनाव प्रणाली की निष्पक्षता पर आती है, तो वे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के साथ मजबूती से खड़ी हैं। 1 नवंबर को रामलीला मैदान में जुटने वाला यह हुजूम न केवल चुनाव आयोग की नीतियों के खिलाफ एक कड़ा जनमत दर्ज कराएगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि आने वाले दिनों में देश की चुनावी व्यवस्था की शुचिता को लेकर संसद से सड़क तक की यह लड़ाई किस निर्णायक मोड़ पर पहुंचती है।