राजस्थानी बंदरवार से लेकर मोतियों वाले तोरण तक, ₹30 रुपए में मिल रहे सामान, दिवाली पर इन डिजाइनों की बढ़ी मांग

राजस्थानी बंदरवार से लेकर मोतियों वाले तोरण तक, ₹30 रुपए में मिल रहे सामान, दिवाली पर इन डिजाइनों की बढ़ी मांग

रोशनी और खुशियों के पावन पर्व दीपावली के नजदीक आते ही देश भर के बाजारों में एक अलग ही रौनक और उत्सव का माहौल देखने को मिलने लगा है। घरों को सजाने और संवारने के लिए इस साल बाजारों में पारंपरिक संस्कृति और आधुनिक कला का बेहद खूबसूरत संगम नजर आ रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान तक के लोकल बाजारों में त्योहारी खरीदारी अपने चरम पर है और इस बार ग्राहकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण बेहद कम कीमत में मिलने वाली डिजाइनर वस्तुएं हैं। त्योहारों के इस सीजन में घर के मुख्य द्वार को सजाने के लिए उपयोग होने वाले पारंपरिक सामान मात्र तीस रुपये की शुरुआती कीमत से बाजारों में उपलब्ध हो चुके हैं। महिलाओं से लेकर युवा वर्ग तक हर कोई अपने आशियाने को सबसे अलग और आकर्षक दिखाने के लिए इन बजट-फ्रेंडली डेकोरेशन आइटम्स की दुकानों पर भारी भीड़ लगा रहा है। दुकानदारों का कहना है कि इस बार स्थानीय कारीगरों द्वारा तैयार किए गए सामानों की मांग में जबर्दस्त उछाल आया है, जिससे छोटे व्यापारियों के चेहरों पर भी खुशियां लौट आई हैं।

राजस्थानी बंदरवार का जलवा और पारंपरिक डिजाइनों की वापसी

इस दिवाली बाजार में सबसे ज्यादा अगर किसी चीज की चर्चा हो रही है, तो वह है पारंपरिक राजस्थानी बंदरवार और वॉल-हंगिंग्स, जो हर किसी का मन मोह रही हैं। राजस्थान के पारंपरिक शिल्पकला से सजे इन बंदरवारों में चमकीले गोटे, रेशमी धागे, शीशे का काम और रंग-बिरंगे मोतियों की खूबसूरत कारीगरी देखने को मिलती है। जानकारों का मानना है कि आज के आधुनिक दौर में भी लोग अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़े रहना पसंद करते हैं, यही वजह है कि घरों के मुख्य दरवाजों पर पारंपरिक बंदरवार लगाने का क्रेज फिर से तेजी से बढ़ रहा है। ये बंदरवार न केवल घर की शोभा बढ़ाते हैं बल्कि इन्हें शुभता और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। स्थानीय बाजारों में इनकी भारी मांग को देखते हुए कारीगरों ने विशेष प्रकार के टिकाऊ और आकर्षक डिजाइन तैयार किए हैं जो देखने में बेहद भव्य लगते हैं लेकिन इनकी कीमत आम आदमी की जेब पर बिल्कुल भारी नहीं पड़ती है।

मोतियों वाले तोरण और पर्ल वर्क की बाजारों में धूम

मुख्य द्वार की सुंदरता में चार चांद लगाने के लिए इस बार मोतियों वाले तोरण (Pearl Torans) ग्राहकों की पहली पसंद बने हुए हैं। सफेद, गोल्डन और रूबी रेड मोतियों से पिरोए गए ये तोरण जब घर के मुख्य दरवाजे पर लटकते हैं तो पूरे घर का लुक ही बदल देते हैं। दुकानदारों का कहना है कि मोतियों के साथ-साथ इसमें आर्टिफिशियल फूलों और मेटल के छोटे घंटियों का इस्तेमाल किया गया है जो हवा चलने पर एक बेहद धीमी और मधुर आवाज पैदा करते हैं। पारंपरिक गत्ते और कपड़े के तोरणों से आगे बढ़कर अब लोग इस प्रकार के प्रीमियम दिखने वाले पर्ल वर्क आइटम्स को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। इन तोरणों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये दिखने में बेहद रिच और रॉयल लुक देते हैं, लेकिन थोक और खुदरा बाजारों में इनकी शुरुआती कीमत बेहद किफायती यानी महज तीस से पचास रुपये के बीच रखी गई है। यही कारण है कि मध्यम वर्ग के परिवार भी बिना किसी बजट की चिंता किए अपने पूरे घर के दरवाजों के लिए इनकी धड़ल्ले से खरीदारी कर रहे हैं।

महज ₹30 में मिल रहा सजावट का सामान, महंगाई के बीच राहत

महंगाई के इस दौर में जहां हर छोटी-बड़ी चीज के दाम आसमान छू रहे हैं, वहीं दिवाली की सजावट के ये सामान आम जनता के लिए किसी बड़े तोहफे से कम साबित नहीं हो रहे हैं। बाजारों में तीस रुपये से शुरू होने वाले इन डेकोरेशन आइटम्स में केवल तोरण और बंदरवार ही नहीं, बल्कि छोटे झूमर, फेयरी लाइट्स, कुंदन वर्क वाले दीये और रंग-बिरंगे डोर-मैट्स भी शामिल हैं। पटरी बाजारों से लेकर थोक मंडियों तक सजी इन दुकानों पर ग्राहकों की लंबी कतारें यह साबित करती हैं कि लोग कम बजट में भी अपने घर को भव्य तरीके से सजाने का हुनर अच्छी तरह जानते हैं। छोटे स्तर पर काम करने वाले स्थानीय दस्तकारों और फेरीवालों का व्यवसाय भी इस त्योहारी सीजन में काफी चमक उठा है, क्योंकि लोग ऑनलाइन शॉपिंग के बजाय स्थानीय बाजारों से ऐसे सामान खरीदना ज्यादा पसंद कर रहे हैं जो हाथ से बने होते हैं और जिनमें पारंपरिक मिट्टी की महक होती है।

वोकल फॉर लोकल का असर और त्योहारों पर स्थानीय बाजारों की रौनक

इस बार की दीपावली खरीदारी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'वोकल फॉर लोकल' (Vocal for Local) और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान का स्पष्ट असर बाजारों में देखने को मिल रहा है। लोग चीनी या विदेशी प्लास्टिक के डेकोरेशन सामानों को छोड़कर देश के विभिन्न राज्यों के कुम्हाड़ों, बुनकरों और पारंपरिक हस्तशिल्प कलाकारों द्वारा बनाए गए उत्पादों को गर्व के साथ खरीद रहे हैं। इससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है बल्कि हमारे देश की प्राचीन कला और संस्कृति भी जीवित बनी हुई है। स्थानीय प्रशासन और व्यापार मंडलों द्वारा भी बाजारों में सुरक्षा, साफ-सफाई और रोशनी के बेहतर इंतजाम किए गए हैं ताकि दूर-दराज से आने वाले ग्राहकों को खरीदारी के दौरान किसी प्रकार की असुविधा न हो। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस बार की दिवाली कम खर्च में अधिक खुशियों और पारंपरिक खूबसूरती के साथ हर घर को रोशन करने के लिए पूरी तरह तैयार है।