क्रिकेट का जुनून ऐसा कि 8 हजार से ज्यादा बच्चों को सिखाया खेल, राहुल चाहर-दीपक जैसे खिलाड़ी बनाकर रचा इतिहास

क्रिकेट का जुनून ऐसा कि 8 हजार से ज्यादा बच्चों को सिखाया खेल, राहुल चाहर-दीपक जैसे खिलाड़ी बनाकर रचा इतिहास

आगरा और ब्रज क्षेत्र की माटी से जब जुनून और जज्बा मिलता है, तो इतिहास की किताबों में नए पन्ने दर्ज हो जाते हैं। भारतीय क्रिकेट की दुनिया में कई ऐसे द्रोणाचार्य रहे हैं जिन्होंने बिना किसी बड़े सरकारी तामझाम के अपनी मेहनत और लगन से ऐसी प्रतिभाएं तराशीं, जिन्होंने विश्व पटल पर भारत का परचम लहराया। ताजनगरी आगरा की गलियों से निकलकर भारतीय राष्ट्रीय क्रिकेट टीम तक का सफर तय करने वाले स्टार गेंदबाज दीपक चाहर और राहुल चाहर की सफलता के पीछे एक ऐसे ही जुनूनी गुरु की कहानी छिपी है। उन्होंने केवल दो बड़े नाम ही देश को नहीं दिए, बल्कि पिछले दो दशकों में आठ हजार से भी अधिक बच्चों को मुफ्त और नाममात्र के खर्च पर क्रिकेट के दांव-पेच सिखाकर उनके सपनों को पंख दिए हैं। आज उनकी क्रिकेट अकादमी से निकले युवा खिलाड़ी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और रणजी ट्रॉफी के साथ-साथ आईपीएल (IPL) की विभिन्न फ्रेंचाइजी टीमों में अपना जौहर दिखा रहे हैं।

ताजनगरी से भारतीय टीम तक का सफर और द्रोणाचार्य का त्याग

आगरा के स्थानीय मैदानों पर जब कोचिंग की शुरुआत हुई थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि पत्थरों और उबड़-खाबड़ पिचों पर अभ्यास करने वाले बच्चे एक दिन एमए चिदंबरम और वानखेड़े स्टेडियम में अंतरराष्ट्रीय बल्लेबाजों की गिल्लियां उखाड़ेंगे। कोच लोकेंद्र सिंह चाहर ने खुद अपनी नौकरी और निजी सुख-सुविधाओं को दांव पर लगाकर बच्चों को निखारने का संकल्प लिया था। दीपक चाहर की स्विंग गेंदबाजी और राहुल चाहर की घातक लेग स्पिन के पीछे सालों की अटूट तपस्या और कड़ी दिनचर्या रही है। सुबह चार बजे से शुरू होने वाला अभ्यास सत्र रात ढले तक चलता था। शुरुआती दिनों में जब बेहतर सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, तब स्थानीय स्तर पर सीमेंटेड पिचें तैयार की गईं और कंक्रीट के रास्तों पर गेंद की ग्रिप और सीम पोजीशन सुधारी गई। यही वजह है कि आज जब ये खिलाड़ी भारतीय जर्सी पहनकर मैदान पर उतरते हैं, तो उनकी गेंदबाजी में आगरा की माटी की वह कड़ाके की मेहनत साफ नजर आती है।

8 हजार से ज्यादा बच्चों का बदला भविष्य, बिना फीस की पाठशाला

इस ऐतिहासिक क्रिकेट अकादमी की सबसे खास बात यह रही है कि यहां कभी भी किसी गरीब या जरूरतमंद बच्चे को पैसों के अभाव में मैदान से बाहर नहीं किया गया। आठ हजार से अधिक खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने वाले इस केंद्र में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को किट, जूते और पौष्टिक आहार तक की व्यवस्था स्वयं कोच द्वारा कराई जाती रही। आगरा, फिरोजाबाद, मथुरा, अलीगढ़ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों से आने वाले नन्हे प्रतिभावान बच्चों को पहचानकर उन्हें सही दिशा देना इस अकादमी का मुख्य ध्येय रहा। आज इस केंद्र से निकले कई खिलाड़ी रेलवे, बैंक, और पुलिस सेवाओं में खेल कोटे के तहत सम्मानजनक पदों पर कार्यरत हैं, जिससे हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति में अभूतपूर्व सुधार आया है।

आधुनिक तकनीक और देसी पद्धतियों का अनूठा मेल

क्रिकेट अब केवल पारंपरिक कला नहीं रहा, बल्कि इसमें बायोमैकेनिक्स, वीडियो एनालिसिस और फिटनेस टेक्नोलॉजी का बड़ा योगदान है। ताजनगरी की इस क्रिकेट पाठशाला ने समय के साथ खुद को आधुनिक दौर के हिसाब से ढाला है। यहां देसी कसरत जैसे रस्सी कूदना, टायर खींचना और भारी गेंदों से थ्रो-डाउन अभ्यास कराने के साथ-साथ आधुनिक स्पीड गन और डिजिटल कैमरों से खिलाड़ियों की तकनीक को सुधारा जाता है। दीपक चाहर की इन-स्विंग और आउट-स्विंग पर नियंत्रण और राहुल चाहर का गुगली फेंकने का सटीक कोण इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का नतीजा है। स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाले टूर्नामेंट्स के जरिए बच्चों को मैच सिचुएशन और मानसिक दबाव से निपटने की ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे वे बड़े स्तर पर घबराते नहीं हैं।

यूपी और राजस्थान क्रिकेट में क्रांति, भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा

इस ऐतिहासिक सफर ने पूरे उत्तर प्रदेश और राजस्थान के क्रिकेट परिदृश्य को बदलकर रख दिया है। पहले जहां छोटे शहरों के बच्चों को केवल राज्य स्तरीय ट्रायल्स तक पहुंचने में वर्षों लग जाते थे, वहीं अब आगरा और आसपास के जिलों के युवा सीधे आईपीएल नीलामी और राष्ट्रीय टीमों के चयनकर्ताओं की नजरों में आ रहे हैं। इस सफलता ने अन्य स्थानीय अकादमियों और खेल प्रेमियों के लिए भी एक मिसाल कायम की है कि अगर नीयत साफ हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए, तो संसाधनों की कमी कभी भी प्रतिभा के आड़े नहीं आ सकती। आज भी हर सुबह सैकड़ों बच्चे हाथ में बल्ला और गेंद थामे इस मैदान में एक नया इतिहास रचने के इरादे से कदम रखते हैं।