यूपी की वो दो सीटें जिनपर हुआ था सांसें रोक देने वाला मुकाबला, 217 और 261 वोटों से पलट गई थी पूरी बाजी
उत्तर प्रदेश की राजनीति अपनी विविधता, रणनीतिक दांव-पेचों और चुनावी रोमांच के लिए पूरे देश में जानी जाती है। भारत के सबसे बड़े सूबे में विधानसभा चुनाव का बिगुल जब भी बजता है, तो वोटों की गिनती का हर एक राउंड प्रत्याशियों से लेकर समर्थकों तक की धड़कनें बढ़ा देता है। राज्य के चुनावी इतिहास में कई ऐसी सीटों के किस्से दर्ज हैं, जहां हार और जीत के बीच का अंतर इतना मामूली रहा कि परिणाम घोषित होने तक पूरे प्रदेश की नजरें सिर्फ उन्हीं मतगणना केंद्रों पर टिकी रहीं। उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावों के पन्नों को पलटें तो दो ऐसी विधानसभा सीटें प्रमुखता से उभरकर सामने आती हैं, जहां हार-जीत का अंतर महज 217 और 261 वोटों का रहा था। अंतिम राउंड की गिनती तक हर एक वोट के साथ बाजी पलटती रही और जब अंतिम परिणाम सामने आए, तो जीतने वाले प्रत्याशी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, वहीं महज चंद वोटों से पिछड़ने वाले प्रत्याशी के खेमे में मायूसी छा गई। इस रोमांचक और सांसें थाम देने वाले मुकाबले ने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र में एक-एक वोट की कीमत कितनी अनमोल होती है।
धामपुर और नकुड़ सीट: जब अंतिम राउंड तक अटकी रहीं सबकी सांसें
बिजनौर जिले की धामपुर विधानसभा सीट और सहारनपुर जिले की नकुड़ विधानसभा सीट पर हुए कड़े मुकाबले की चर्चा आज भी राज्य के सियासी गलियारों में बेहद दिलचस्पी के साथ की जाती है। मतगणना के दिन शुरुआती चक्रों से ही इन दोनों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) के उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली थी। धामपुर सीट पर जहां हर चक्र की गिनती के बाद बढ़त का अंतर दहाई के आंकड़ों में सिमट रहा था, वहीं नकुड़ सीट पर भी दोनों मुख्य प्रतिद्वंद्वियों के बीच कांटे की होड़ बनी हुई थी। मतगणना केंद्र के बाहर जमा हजारों समर्थकों की सांसें हर राउंड के लाउडस्पीकर एनाउंसमेंट के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं। कई बार तो स्थिति ऐसी बनी कि केवल 5 या 10 वोटों से बढ़त बदलती दिखाई दी। चुनाव आयोग के अधिकारियों और दोनों पक्षों के पोलिंग एजेंटों के लिए भी एक-एक डाक मतपत्र (पोस्टल बैलेट) की गिनती बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण साबित हो रही थी।
महज 217 और 261 वोटों के अंतर से बदला राजनीतिक इतिहास
धामपुर विधानसभा क्षेत्र में अंतिम चरण की मतगणना और पोस्टल बैलेट के सत्यापन के बाद जब आधिकारिक आंकड़े जारी किए गए, तो जीत का अंतर महज 217 वोट निकला। बीजेपी के अशोक कुमार राणा ने बेहद कड़े मुकाबले में सपा के मूलचंद चौहान को केवल 217 मतों के सूक्ष्म अंतर से शिकस्त दी थी। वहीं दूसरी ओर, सहारनपुर की नकुड़ सीट पर भी ऐसा ही हैरत अंगेज मोड़ आया, जहां बीजेपी प्रत्याशी मुकेश चौधरी ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को मात्र 261 वोटों से हराकर सीट अपने नाम कर ली। इन दोनों ही निर्वाचन क्षेत्रों में नोटा (NOTA) को पड़े वोट और रद्द किए गए अमान्य वोटों की संख्या हार-जीत के इस अंतर से कहीं अधिक थी। नतीजों के ऐलान के बाद जहां हारने वाले प्रत्याशियों ने दोबारा मतगणना (रि-काउंटिंग) और प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आपत्तियां दर्ज कराईं, वहीं चुनाव आयोग ने दिशानिर्देशों के तहत पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी और री-वेरिफिकेशन के बाद ही अंतिम विजेता प्रमाणपत्र जारी किया।
एक-एक वोट का महत्व और नोटा का निर्णायक प्रभाव
उत्तर प्रदेश के इन दो सबसे करीबी मुकाबलों ने आम मतदाताओं और राजनीतिक विश्लेषकों दोनों को एक बड़ा सबक दिया। अक्सर देखा जाता है कि चुनाव के दिन कई लोग यह सोचकर मतदान करने नहीं जाते कि उनके अकेले एक वोट से क्या फर्क पड़ जाएगा, लेकिन धामपुर के 217 और नकुड़ के 261 वोटों के फैसले ने इस सोच को पूरी तरह से खारिज कर दिया। इन सीटों पर रिजेक्ट हुए पोस्टल बैलेट और ईवीएम में दर्ज नोटा के बटन ने सीधे तौर पर पूरे क्षेत्र की भावी राजनीति की दिशा तय कर दी। अगर कुछ दर्जनों मतदाता भी अपने घरों से निकलकर मतदान केंद्र तक पहुंच जाते या अमान्य घोषित हुए वोटों में जरा सी सावधानी बरती गई होती, तो इन दोनों विधानसभाओं का चुनावी नतीजा और उत्तर प्रदेश की विधानसभा में प्रतिनिधित्व का चेहरा पूरी तरह अलग हो सकता था।
भावी चुनावों के लिए सीख और उम्मीदवारों की नई रणनीति
धामपुर और नकुड़ के इस ऐतिहासिक और रोंगटे खड़े कर देने वाले मुकाबले के बाद से उत्तर प्रदेश में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी चुनावी रणनीतियों में अमूलचूल बदलाव किया है। अब कोई भी राजनीतिक दल किसी भी बूथ या क्षेत्र को कमजोर या कम आंकने की गलती नहीं करता। पन्ना प्रमुखों से लेकर बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को यह सख्त हिदायत दी जाती है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में शत-प्रतिशत मतदान कराने पर ध्यान केंद्रित करें। विशेष रूप से सर्विस वोटर्स और बुजुर्गों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली पोस्टल बैलेट सुविधा पर अब राजनीतिक पार्टियां बेहद पैनी नजर रखती हैं, क्योंकि उन्हें समझ आ चुका है कि पोस्टल बैलेट के चंद वोट भी किसी बड़े प्रत्याशी के राजनीतिक भविष्य को संवार या बिगाड़ सकते हैं। 217 और 261 वोटों से पलटी बाजी का यह किस्सा भारतीय लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत और जीवंत मिसालों में हमेशा याद रखा जाएगा।