आर अश्विन ने बताई अंदरूनी वजह, क्यों बाहर बैठेंगे टीम इंडिया के सीनियर स्विंगर?
भारत और न्यूजीलैंड के बीच खेली जा रही पांच मैचों की रोमांचक टी-20 अंतरराष्ट्रीय सीरीज अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। शुरुआती तीन मुकाबलों के बाद जहां एक तरफ टीम प्रबंधन सीरीज सील करने की रणनीति पर काम कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्लेइंग इलेवन में तेज गेंदबाजी संयोजन को लेकर गंभीर मंथन शुरू हो गया है। टीम के सबसे अनुभवी तेज गेंदबाज और स्विंग मास्टर भुवनेश्वर कुमार की फॉर्म इस समय भारतीय क्रिकेट गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी हुई है। इसी बीच भारतीय टीम के दिग्गज ऑफ स्पिनर और क्रिकेट विश्लेषक रविचंद्रन अश्विन ने एक बड़ा बयान देकर साफ संकेत दिया है कि चौथे टी-20 मुकाबले में भुवनेश्वर कुमार का पत्ता कटना लगभग तय माना जा रहा है। अश्विन का यह सामरिक विश्लेषण किसी व्यक्तिगत राय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक टी-20 क्रिकेट की निर्मम वास्तविकताओं और न्यूजीलैंड की खेल परिस्थितियों पर आधारित है। चार साल के लंबे इंतजार के बाद जब भुवी ने नीली जर्सी में वापसी की थी, तो फैंस और चयनकर्ताओं को उम्मीद थी कि उनका अनुभव भारतीय गेंदबाजी को स्थिरता देगा। लेकिन मैदान पर परिस्थितियां इसके बिल्कुल उलट नजर आईं। कीवी बल्लेबाजों ने भुवी की गेंदों पर पावरप्ले से लेकर डेथ ओवर्स तक बिना किसी झिझक के आक्रामक शॉट खेले हैं। जब कोई अनुभवी फ्रंटलाइन गेंदबाज लगातार तीन मुकाबलों में अपनी लय तलाशने में नाकाम रहता है, तो सीरीज जीतने की होड़ में टीम थिंक-टैंक के पास कड़े फैसले लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
तीन मैचों में 139 रन और सिर्फ 1 विकेट: आंकड़ों ने बढ़ाई अनुभवी स्विंगर की मुश्किलें
क्रिकेट के सबसे छोटे प्रारूप में आंकड़े किसी भी खिलाड़ी की मौजूदा उपयोगिता की सबसे सटीक गवाही देते हैं। अगर इस सीरीज में भुवनेश्वर कुमार के प्रदर्शन पर नजर डाली जाए तो वे अब तक टीम इंडिया के सबसे महंगे गेंदबाज साबित हुए हैं। शुरुआती तीन मैचों में उन्होंने कुल 12 ओवर फेंके हैं, जिसमें उन्होंने 11.58 की बेहद महंगी इकोनॉमी रेट से 139 रन लुटा दिए हैं और उनके खाते में केवल एक ही सफलता दर्ज हो सकी है। टी-20 क्रिकेट में जब आपका मुख्य स्ट्राइक गेंदबाज 11 से अधिक की दर से रन लुटाने लगे, तो कप्तान के लिए बीच के ओवरों में फील्ड सेट करना और रनों की रफ्तार रोकना नामुमकिन हो जाता है। पावरप्ले के पहले छह ओवरों में नई गेंद से स्विंग न मिलना और बल्लेबाजों को बीट करने में असमर्थ रहना भुवी के लिए सबसे बड़ी परेशानी साबित हुआ है। न्यूजीलैंड के सलामी बल्लेबाजों ने उनके खिलाफ क्रीज से बाहर निकलकर और बैकफुट पर जाकर आसानी से मनचाहे रन बटोरे हैं। इतना ही नहीं, डेथ ओवरों में जिस यॉर्कर और स्लोअर-वन के लिए भुवी दुनिया भर में जाने जाते थे, वहां भी उनकी लेंथ काफी भटकी हुई नजर आई है। बल्लेबाजों ने स्लॉग ओवर्स में उनकी धीमी गेंदों को पहले ही भांपकर बाउंड्री के बाहर भेजा है, जिसने भारतीय कप्तान और गेंदबाजी कोच मोर्ने मोर्केल के सामने टीम कॉम्बिनेशन बदलने की मजबूरी खड़ी कर दी है।
'न्यूजीलैंड की पिचों पर स्विंग नहीं, रफ्तार चाहिए': अश्विन का सामरिक विश्लेषण
रविचंद्रन अश्विन ने अपने यूट्यूब चैनल पर चौथे मुकाबले की रणनीति का विस्तार से पोस्टमार्टम करते हुए बताया कि आखिर क्यों न्यूजीलैंड की धरती पर भुवनेश्वर कुमार का जादू नहीं चल पा रहा है। अश्विन के अनुसार, न्यूजीलैंड के ड्रॉप-इन विकेट्स और वहां की हवा के रुख में गेंदबाजी करना एशियाई परिस्थितियों से पूरी तरह अलग होता है। आधुनिक समय में जब टी-20 मैचों के दौरान कूकाबुरा गेंद केवल एक या दो ओवरों के बाद ही स्विंग होना बंद हो जाती है, तो वहां 125 से 130 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाले स्विंग गेंदबाजों की उपयोगिता तेजी से घटने लगती है। अश्विन ने स्पष्ट किया कि कीवी पिचों पर सफलता हासिल करने के लिए बल्लेबाज की छाती को निशाना बनाने वाली 140+ किमी/घंटा की गति, हार्ड लेंथ और तीखे बाउंसर की दरकार होती है। जब गेंद में हवा की गति नहीं होती, तो फ्लैट पिचों पर बल्लेबाज गेंदबाज की गति का इस्तेमाल करके छोटी बाउंड्रीज का पूरा फायदा उठा लेते हैं। अश्विन का मानना है कि भुवी की बुनियादी ताकत गेंद को लेट-मूवमेंट कराना है, लेकिन अगर पिच और गेंद से वह मदद नहीं मिल रही है, तो केवल लाइन-लेंथ के सहारे कीवी बल्लेबाजों को बांधकर रखना असंभव है। इसी वजह से अश्विन का दो टूक कहना है कि चौथे मुकाबले में भारत को गति आधारित अटैक के साथ ही मैदान पर उतरना चाहिए।
युवा तेज गेंदबाजों की कतार: बेंच पर बैठे इन खिलाड़ियों को मौका देने का वक्त
टीम इंडिया की बेंच स्ट्रेंथ इस समय दुनिया में सबसे मजबूत मानी जाती है और डगआउट में कई ऐसे युवा तेज गेंदबाज अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं जो विपक्षी खेमे में खलबली मचाने का माद्दा रखते हैं। अश्विन ने भी इस पहलू को रेखांकित करते हुए कहा कि जब आपके पास रिजर्व में 145+ किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद फेंकने वाले गेंदबाज मौजूद हैं, तो एक असफल गेंदबाज को लगातार खिलाना बेंच पर बैठे खिलाड़ियों के साथ भी अन्याय होगा। अर्शदीप सिंह पहले से ही टीम के मुख्य डेथ ओवर स्पेशलिस्ट के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, ऐसे में दूसरे छोर पर उन्हें एक ऐसे साथी की जरूरत है जो अपनी रफ्तार से विरोधी बल्लेबाजों को बैकफुट पर धकेल सके। चौथे टी-20 में भुवी की जगह तेज गेंदबाज मयंक यादव, मुकेश कुमार या आवेश खान में से किसी एक को अंतिम एकादश में शामिल किए जाने की पूरी संभावना नजर आ रही है। यदि टीम प्रबंधन शुद्ध रफ्तार और आक्रामकता की तलाश में है, तो 150 किमी/घंटा की गति से गेंदबाजी करने वाले मयंक यादव सबसे मजबूत दावेदार बनकर उभरते हैं। वहीं अगर अनुभव और अनुशासित हार्ड लेंथ की जरूरत महसूस होती है, तो आवेश खान टीम का स्वाभाविक विकल्प हो सकते हैं। अश्विन का मानना है कि आगामी टी-20 विश्वकप और बड़े टूर्नामेंट्स के रोडमैप को देखते हुए टीम प्रबंधन के लिए युवाओं को आजमाना और उन्हें मैच टाइम देना अधिक व्यावहारिक कदम होगा।
क्या भुवनेश्वर कुमार के टी-20 करियर पर मंडरा रहा है अंतिम फैसला?
चौथे मुकाबले से बाहर बैठना केवल एक मैच से ड्रॉप होने भर का मामला नहीं है, बल्कि यह भुवनेश्वर कुमार के टी-20 अंतरराष्ट्रीय करियर के संभावित अंत का भी संकेत हो सकता है। 34 वर्ष से अधिक उम्र के पड़ाव पर पहुंच चुके किसी भी सीनियर खिलाड़ी के लिए अंतरराष्ट्रीय टीम में वापसी के बाद लगातार खराब प्रदर्शन करना बेहद घातक साबित होता है। भारतीय क्रिकेट में प्रतिस्पर्धा का स्तर इतना कड़ा है कि एक बार टीम से बाहर होने के बाद दोबारा दरवाजा खटखटाना लगभग असंभव हो जाता है। तीसरे टी-20 मैच के बाद खुद भुवनेश्वर कुमार ने यह स्वीकार किया था कि वे घरेलू 50-ओवर टूर्नामेंट विजय हजारे ट्रॉफी में खेलकर अपनी लय और फिटनेस पर नए सिरे से काम करने की योजना बना रहे हैं। इससे यह साफ जाहिर होता है कि भुवी को भी अपनी मौजूदा सीमाओं और टी-20 प्रारूप में बदलती प्राथमिकताओं का भली-भांति एहसास हो चुका है। चौथे टी-20 के लिए वेलिंगटन के मैदान पर जब टॉस होगा, तो पूरी संभावना है कि भारतीय टीम शीट में भुवनेश्वर कुमार का नाम नदारद रहे। अगर ऐसा होता है, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय टीम प्रबंधन अब अतीत के अनुभवों के बजाय भविष्य की तेज-तर्रार रफ्तार को तरजीह देने का मन बना चुका है।