इलाहाबाद हाईकोर्ट का महिला कर्मचारियों के हक में ऐतिहासिक फैसला, 2 साल के भीतर दूसरी बार मातृत्व अवकाश लेने पर कोई रोक नहीं; मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट को बताया सर्वोपरि
उत्तर प्रदेश में सरकारी सेवा में कार्यरत लाखों महिला कर्मचारियों के संवैधानिक और मातृत्व अधिकारों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट और दो टूक शब्दों में व्यवस्था दी है कि किसी भी महिला कर्मचारी को पहली संतान के जन्म पर मिले मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) के दो वर्ष पूरे न होने के आधार पर दूसरी गर्भावस्था के दौरान मातृत्व अवकाश देने से इनकार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने माना कि केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के प्रावधान राज्य सरकार की प्रशासनिक नियमावली (फाइनेंशियल हैंडबुक) की तुलना में सर्वोपरि हैं। इस ऐतिहासिक फैसले से उन तमाम महिला कर्मचारियों को बड़ी कानूनी राहत मिली है, जिन्हें दो गर्भधारण के बीच दो साल का अनिवार्य अंतर न होने का हवाला देकर छुट्टियों से वंचित कर दिया जाता था।
कल्याण सिंह कैंसर संस्थान का मामला और हाईकोर्ट का दखल
यह पूरा मामला लखनऊ स्थित कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट में कार्यरत महिला कर्मचारी सीमा की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने अपने दूसरे प्रसव के लिए विभाग के समक्ष 17 जून से 13 दिसंबर तक कुल 180 दिनों के मातृत्व अवकाश की अर्जी लगाई थी। हालांकि, संस्थान प्रबंधन और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों ने उनके आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उन्होंने पहले बच्चे के जन्म पर मिले मातृत्व अवकाश के बाद दो साल की अनिवार्य सेवा अवधि पूरी नहीं की है।
विभाग ने इस फैसले के पीछे उत्तर प्रदेश की फाइनेंशियल हैंडबुक (वित्तीय हस्तपुस्तिका) के खंड-2, भाग 2 से 4 के नियम 153(1) का हवाला दिया था, जिसमें यह शर्त दर्ज थी कि पिछली बार स्वीकृत अवकाश की समाप्ति से दो वर्ष का समय बीतने के बाद ही दूसरा मातृत्व अवकाश अनुमन्य होगा। इस अस्वीकृति आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का दरवाजा खटखटाया। मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने विभाग के इनकार संबंधी आदेश को सिरे से खारिज करते हुए महिला कर्मचारी के पक्ष में आदेश पारित किया।
वित्तीय हस्तपुस्तिका बनाम मातृत्व लाभ अधिनियम 1961: कानून की स्थिति स्पष्ट
अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि संसद द्वारा पारित मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Maternity Benefit Act, 1961) एक वैधानिक कानून (Statutory Law) है, जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए भी अंगीकार किया है। इस केंद्रीय कानून में कहीं भी ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है कि दो मातृत्व अवकाश के बीच दो साल का अंतर होना अनिवार्य है।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए व्यवस्था दी कि किसी प्रशासनिक नियमावली या फाइनेंशियल हैंडबुक के कार्यकारी नियम संसद द्वारा बनाए गए किसी वैधानिक अधिनियम के प्रावधानों को निष्प्रभावी या सीमित नहीं कर सकते। जब संसद ने मातृत्व सुरक्षा को एक मौलिक अधिकार और सामाजिक सुरक्षा के रूप में मान्यता दी है, तो राज्य सरकार या उसका कोई भी विभाग अपने आंतरिक सेवा नियमों की आड़ में किसी महिला को इस बुनियादी अधिकार से वंचित नहीं कर सकता।
अनुपम यादव और अंशु रानी मामलों की पुरानी नजीरों का उल्लेख
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में न्यायशास्त्र के उन पुराने फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें पहले भी अदालतों ने मातृत्व अधिकारों की रक्षा की है। अदालत ने अनुपम यादव, अंशु रानी और सताक्षी मिश्रा के चर्चित मामलों का हवाला दिया, जिनमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट किया था कि मातृत्व लाभ किसी नियोक्ता की दया या खैरात पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह महिला की गरिमा और नवजात शिशु के जीवन के अधिकार से जुड़ा विषय है।
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने कहा कि जब मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 पूरे राज्य में प्रभावी रूप से लागू है, तो अधिकारियों का फाइनेंशियल हैंडबुक के पुराने और संकीर्ण नियमों पर निर्भर रहना पूरी तरह अनुचित, मनमाना और कानून की भावना के विपरीत है। इसके साथ ही अदालत ने 20 जुलाई के उस प्रशासनिक आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत याचिकाकर्ता का अवकाश रोका गया था।
180 दिनों का पूरा अवकाश और सभी सेवा लाभ देने का निर्देश
हाईकोर्ट ने कैंसर संस्थान और संबंधित सरकारी अधिकारियों को सख्त निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 17 जून से 13 दिसंबर तक का पूरा 180 दिन का मातृत्व अवकाश तत्काल प्रभाव से स्वीकृत किया जाए। इसके अलावा अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अवकाश अवधि के दौरान महिला कर्मचारी को मिलने वाले वेतन, भत्तों और वरिष्ठता (सीनियरिटी) सहित सभी परिणामी सेवा लाभ (Consequential Service Benefits) निर्बाध रूप से प्रदान किए जाएं।
उत्तर प्रदेश में महिला सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रसूति अवकाश की अधिकतम सीमा 180 दिन निर्धारित है। अदालत के इस निर्देश ने स्पष्ट कर दिया है कि अवकाश अवधि को किसी अन्य सामान्य छुट्टी खाते (जैसे अर्जित अवकाश या चिकित्सा अवकाश) से नहीं काटा जा सकता और यह पूरी तरह सवेतन (With Pay) मातृत्व लाभ के रूप में ही दर्ज होगा।
कामकाजी महिलाओं के लिए क्यों मील का पत्थर है यह फैसला?
आधुनिक कार्यस्थलों और सरकारी विभागों में अक्सर प्रशासनिक बाधाओं और रूढ़िवादी नियमों के चलते कामकाजी महिलाओं को मातृत्व और करियर के बीच कठिन संघर्ष करना पड़ता है। प्राकृतिक रूप से दो बच्चों के जन्म के बीच का समय किसी सरकारी नियम तालिका से तय नहीं हो सकता। ऐसे में यदि कोई महिला परिस्थितिवश दो साल के भीतर दूसरी बार मां बनती है, तो उसे छुट्टी न देना सीधे तौर पर उसके और उसके नवजात शिशु के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा था।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल उत्तर प्रदेश सरकार के कर्मचारियों, बल्कि बेसिक शिक्षा परिषद के अंतर्गत कार्यरत प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शिक्षिकाओं, स्वास्थ्य कर्मियों, पुलिस विभाग और स्वायत्तशासी संस्थानों में कार्यरत सभी महिला कर्मचारियों के लिए एक सुरक्षा कवच साबित होगा। अब कोई भी प्रशासनिक अधिकारी दो साल की समय-सीमा का बहाना बनाकर मातृत्व अवकाश की फाइल को लटका या निरस्त नहीं कर सकेगा।
संविधान के अनुच्छेद 21 और मातृत्व गरिमा की पुनर्स्थापना
भारत का संविधान अपने अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन जीने का मौलिक अधिकार देता है। इसी तरह अनुच्छेद 42 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह काम की न्यायसंगत और मानवीय परिस्थितियां सुनिश्चित करने के साथ-साथ प्रसूति सहायता (Maternity Relief) के लिए उचित प्रबंध करे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला संवैधानिक मूल्यों और कामकाजी महिलाओं के बुनियादी मानवाधिकारों की पुष्टि करता है। मातृत्व के दौर में महिला को उचित आराम, चिकित्सकीय देखभाल और शिशु के पोषण के लिए समय मिलना उसकी शारीरिक और मानसिक सेहत के लिए अनिवार्य है। अदालत का यह आदेश यह सुनिश्चित करता है कि कार्यस्थल की लालफीताशाही कभी भी मातृत्व के प्राकृतिक और पावन अधिकार की राह में रोड़ा न बन सके।