यूपी चुनाव में बिहार की पार्टियों की नो एंट्री, चिराग पासवान और निशांत कुमार से ओपी राजभर को किस बात का सता रहा डर?
उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर अभी से ही जबरदस्त घमासान और बगावत की चिंगारी सुलगने लगी है। बिहार की प्रमुख राजनीतिक हस्तियों और पार्टियों की यूपी की राजनीति में अचानक हुई धमक ने गठबंधन के पुराने साथियों की नींद उड़ा दी है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के नेतृत्व में जनता दल यूनाइटेड (JDU) द्वारा उत्तर प्रदेश की सभी 403 सीटों पर संगठन विस्तार और चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद यूपी एनडीए के भीतर भारी कलह सामने आ गई है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर और उनके बेटे अरविंद राजभर ने बिहार के इन दोनों ही दलों के खिलाफ सीधे तौर पर मोर्चा खोल दिया है। सुभासपा ने साफ चेतावनी दे दी है कि बिहार की किसी भी राजनीतिक पार्टी को यूपी में एंट्री नहीं मिलने दी जाएगी। इस कड़े रुख के बाद कयासों का बाजार गर्म हो गया है कि आखिर राजभर को चिराग और निशांत की सक्रियता से किस बात का सबसे बड़ा डर सता रहा है।
बिहार की पार्टियों की यूपी में धमक और एनडीए के भीतर बगावत का ऐलान
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अभी से ही राजनीतिक गोटियां सेट की जाने लगी हैं। चिराग पासवान ने जहां 'यूथ बोले' संवाद कार्यक्रमों और पासी-पासवान समेत गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाकर लगभग 10 से 12 विधानसभा सीटों पर अपनी मजबूत दावेदारी ठोकी है, वहीं जेडीयू ने भी काशी से हुंकार भरते हुए पूर्वांचल के कुर्मी और पिछड़ी जातियों के वोट बैंक पर अपनी नजरें टिका दी हैं। जेडीयू नेता और बिहार के मंत्री निशांत कुमार के साथ संजय झा जैसे दिग्गजों ने वाराणसी में राज्यस्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन कर साफ कर दिया कि पार्टी यूपी में एनडीए के घटक दल के तौर पर चुनाव मैदान में उतरेगी। बिहार की इन दो धुरंधर पार्टियों के अचानक सक्रिय होने से यूपी एनडीए के पुराने सहयोगियों जैसे ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा, अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) और संजय निषाद की निषाद पार्टी में भारी छटपटाहट देखने को मिल रही है। राजभर की पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अरविंद राजभर ने सीधा अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यदि बिहार के दलों को यूपी एनडीए में शामिल किया गया, तो सुभासपा अपने भावी राजनीतिक विकल्पों पर विचार करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होगी।
पुराना हिसाब-किताब चुकता करने का मौका या सीट शेयरिंग में घाटे का खौफ?
ओम प्रकाश राजभर की इस आक्रामकता के पीछे केवल क्षेत्रीय राजनीति का प्रभाव नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक पुराना राजनीतिक दर्द और सीट शेयरिंग के गणित में घाटा होने का सबसे बड़ा खौफ छिपा हुआ है। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान सुभासपा ने एनडीए के साथ मिलकर बिहार में चुनाव लड़ने की भारी इच्छा जताई थी और कई सीटों की मांग की थी, लेकिन तब बीजेपी, जेडीयू और लोजपा के गठबंधन ने राजभर को एक भी सीट न देकर एनडीए से पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखा दिया था। अब जब वही बिहार के दल उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में अपनी हिस्सेदारी मांगने पहुंचे हैं, तो राजभर इसे पुरानी चिढ़ और हिसाब चुकता करने के तौर पर देख रहे हैं। इसके अलावा सुभासपा को सबसे बड़ा डर इस बात का सता रहा है कि यदि बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने चिराग पासवान और जेडीयू को 10-15 सीटें देने पर सहमति जता दी, तो उसका सीधा असर राजभर, निषाद और अपना दल की पारंपरिक सीटों की कटौती पर पड़ेगा। पूर्वांचल और मध्य यूपी के जिन इलाकों में राजभर अपनी एकाधिकार वाली राजनीति का दावा करते हैं, वहां जेडीयू और लोजपा का आधार बढ़ने से उनका वोट बैंक और राजनीतिक रसूख बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
स्वामी प्रसाद मौर्य को न्योता और दो मुस्लिम उम्मीदवारों की घोषणा
सुभासपा ने केवल बिहार के नेताओं को रोकने का फरमान ही जारी नहीं किया, बल्कि भारतीय जनता पार्टी और एनडीए के शीर्ष नेतृत्व पर अपना राजनीतिक दबाव कई गुना बढ़ाने के लिए कुछ बड़े कूटनीतिक दांव भी खेल दिए हैं। अरविंद राजभर ने सार्वजनिक तौर पर फायरब्रांड नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के प्रति बेहद नरम रुख दिखाते हुए उन्हें एनडीए में वापस लौटने का खुला न्योता दे दिया है। राजभर परिवार का कहना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य एक बेहद अनुभवी नेता हैं और वे इस समय सपा-कांग्रेस के बीच में पिस रहे हैं, इसलिए वे उनकी एनडीए में ससम्मान वापसी के लिए दिल्ली में शीर्ष नेताओं से सीधी बातचीत करने के लिए तैयार हैं। इसके साथ ही, सुभासपा ने चुनाव आयोग और सीट शेयरिंग की आधिकारिक चर्चाओं से पहले ही अपनी पार्टी के दो प्रमुख मुस्लिम प्रत्याशियों—आफताब आलम और खुर्शीद आलम के नामों का औपचारिक ऐलान करके बीजेपी के रणनीतिकारों के सामने नई धर्मसंकट की स्थिति खड़ी कर दी है। राजभर के इन ताबड़तोड़ फैसलों ने यह साबित कर दिया है कि वे यूपी में किसी भी कीमत पर अपना राजनीतिक आधार कम नहीं होने देना चाहते।
बीजेपी के सामने सहयोगियों के कुनबे को साधने की गंभीर चुनौती
उत्तर प्रदेश में जहां एक तरफ विपक्षी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के दम पर बीजेपी की घेराबंदी करने में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ अपनों की इस अंतर्कलह ने बीजेपी के राष्ट्रीय और प्रदेश नेतृत्व के पसीने छुड़ा दिए हैं। बीजेपी के रणनीतिकारों को अच्छी तरह अंदाजा है कि चिराग पासवान का पासी-पासवान समाज में बढ़ता जनाधार सपा के दलित वोट बैंक में सेंधमारी करने के लिए एक बेहद कारगर हथियार साबित हो सकता है। हालांकि, नए सहयोगियों को साधने के चक्कर में ओम प्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल और डॉ. संजय निषाद जैसे पुराने और आजमाए हुए साथियों की नाराजगी मोल लेना बीजेपी के लिए भारी पड़ सकता है। 2024 के लोकसभा चुनावों में पहले ही कई झटके झेल चुकी बीजेपी के सामने अब सबसे बड़ा संकट यह है कि वह बिना किसी सहयोगी का दिल दुखाए और सीट बंटवारे का संतुलन बिगड़े बिना, कैसे चिराग पासवान और निशांत कुमार की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को शांत रखती है। अगर यह अंदरूनी रार समय रहते नहीं सुलझाई गई, तो 2027 के रण में एनडीए का यह कुनबा बिखर भी सकता है।