इजरायल चुनाव के एग्जिट पोल्स में फंसा पेंच: क्या गिरेगी नेतन्याहू सरकार? बहुमत से दूर दोनों खेमे
पश्चिम एशिया के सबसे अहम देश इजरायल में हुए आम चुनाव के एग्जिट पोल्स और शुरुआती रुझानों ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के भविष्य को लेकर भारी असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। 7 अक्टूबर 2023 के हमलों और गाजा व लेबनान में वर्षों तक चले सैन्य अभियानों के बाद आयोजित हुए इस पहले आम चुनाव को नेतन्याहू के 19 साल लंबे राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा जनमत संग्रह माना जा रहा है। टीवी चैनलों के एग्जिट पोल्स और शुरुआती मतगणना के आंकड़े दर्शाते हैं कि नेतन्याहू का लिकुड पार्टी समर्थित दक्षिणपंथी ब्लॉक और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट (Gadi Eisenkot) के नेतृत्व वाला विपक्षी 'चेंज' ब्लॉक दोनों ही 120 सदस्यीय संसद (नेसेट) में 61 सीटों के जादुई बहुमत से दूर नजर आ रहे हैं।
इस कड़े मुकाबले ने इजरायल को एक बार फिर उसी राजनीतिक अनिश्चितता और गतिरोध (Deadlock) के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिससे यह देश 2019 से 2022 के बीच जूझता रहा था। यद्यपि नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़े एकल दल के रूप में उभरती दिख रही है, लेकिन उनके मौजूदा सत्तारूढ़ गठबंधन को सीधे तौर पर बहुमत मिलता नहीं दिख रहा। जब तक 61 सीटों का आंकड़ा पार नहीं होता, तब तक यह तय नहीं माना जा सकता कि नेतन्याहू कुर्सी पर बने रहेंगे या फिर विपक्ष के हाथों उनकी विदाई होगी।
एग्जिट पोल्स और वोटों की गिनती का गणित: 120 सीटों पर क्या हैं समीकरण?
इजरायल के प्रमुख मीडिया नेटवर्क (चैनल 11, चैनल 12 और चैनल 13) के एग्जिट पोल्स और शुरुआती आधिकारिक आंकड़ों ने तस्वीर को बेहद पेचीदा बना दिया है:
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नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गुट: शुरुआती अनुमानों और रुझानों में नेतन्याहू के खेमे को 50 से 54 सीटें मिलती दिख रही हैं। लिकुड पार्टी का वोट शेयर 21 से 22 प्रतिशत के आसपास बना हुआ है, लेकिन उनकी सहयोगी अति-रूढ़िवादी (Haredi) और कट्टर दक्षिणपंथी पार्टियों की सीटों में कटौती दर्ज हुई है।
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विपक्षी 'चेंज' गुट: पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ गादी आइजनकोट की 'याशर' पार्टी और यायर लापिड के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को लगभग 50 से 52 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। पूर्व सैन्य कमांडर होने के नाते आइजनकोट ने सुरक्षा के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए खुद को एक मजबूत विकल्प के तौर पर पेश किया है।
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अरब पार्टियां (किंगमेकर की भूमिका): इस चुनाव का सबसे बड़ा सरप्राइज अरब-इजरायली मतदाताओं का रिकॉर्ड मतदान रहा है। 'जॉइंट लिस्ट' (Joint List) और अन्य अरब दलों को 16 से 19 सीटें मिलने का अनुमान है। दोनों प्रमुख यहूदी खेमों के बहुमत से दूर रहने की स्थिति में अरब पार्टियां सबसे बड़े 'किंगमेकर' के रूप में उभरी हैं।
'अरब फैक्टर' ने उलझाई सरकार गठन की गुत्थी
संख्या बल के लिहाज से भले ही अरब पार्टियों के पास सरकार बनाने की चाबी दिखाई दे रही हो, लेकिन जमीनी राजनीति में यह गठबंधन बनाना किसी कांटेदार ताज से कम नहीं है। बेंजामिन नेतन्याहू ने चुनाव नतीजों के बाद अपने संबोधन में साफ कर दिया है कि वे किसी भी सूरत में अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार नहीं बनाएंगे। उनके पूरे दक्षिणपंथी गठबंधन का वैचारिक आधार ही अरब-विरोधी और कट्टर राष्ट्रवादी नीतियों पर टिका है।
दूसरी ओर, विपक्षी नेता गादी आइजनकोट भी खुलकर अरब दलों को मंत्रिमंडल में शामिल करने से कतरा रहे हैं। आइजनकोट ने पहले ही संकेत दिया था कि वे ऐसी सरकार को प्राथमिकता देंगे जो मुख्यधारा के ज़ायोनी (Zionist) सिद्धांतों पर आधारित हो। हालांकि, यदि विपक्ष को नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करना है, तो उन्हें संसद में विश्वास मत के दौरान कम से कम अरब दलों के 'बाहरी समर्थन' या 'वॉकआउट' की दरकार होगी। ऐसे जटिल अंकगणित के चलते दोनों ही खेमों के लिए स्थिर सरकार बनाना टेढ़ी खीर साबित होने वाला है।
क्या नेतन्याहू फिर चल सकते हैं कोई जादुई राजनीतिक दांव?
इजरायली राजनीति में बेंजामिन नेतन्याहू को 'द मैजिशियन' (The Magician) कहा जाता है, क्योंकि वे पहले भी कई बार असंभव दिख रही परिस्थितियों से गठबंधन की सरकारें खींचकर निकाल चुके हैं। यदि अंतिम चुनाव परिणाम में वे बहुमत से महज 3-4 सीटें पीछे रहते हैं, तो पूरी संभावना है कि वे विपक्षी खेमे के छोटे दलों—जैसे नफ्ताली बेनेट या एविग्डोर लिबरमैन की पार्टियों—में सेंध लगाने का प्रयास करेंगे।
नेतन्याहू ने चुनावी मंचों से बार-बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपनी करीबी साझेदारी और ईरान के परमाणु खतरे को हमेशा के लिए खत्म करने के एजेंडे को हवा दी है। वे दक्षिणपंथी सांसदों को यह संदेश देने की कोशिश करेंगे कि देश इस समय युद्ध और क्षेत्रीय संकट के दौर से गुजर रहा है, ऐसे में एक कमजोर या बंटी हुई विपक्षी सरकार देश की सुरक्षा के लिए घातक होगी। इस नैरेटिव के दम पर वे विपक्षी गठबंधन के कुछ सांसदों को अपने पाले में खींचने की कोशिश कर सकते हैं।
भारत-इजरायल संबंधों और वैश्विक कूटनीति पर क्या पड़ेगा असर?
बेंजामिन नेतन्याहू को भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेहद करीबी मित्र माना जाता है। उनके कार्यकाल के दौरान रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और उच्च तकनीक के क्षेत्र में नई दिल्ली और तेल अवीव के रिश्ते ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर पहुंचे। ऐसे में अगर नेतन्याहू की सत्ता जाती है, तो क्या भारत के साथ संबंधों में कोई बदलाव आएगा?
कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल में भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी पर पूर्ण 'राष्ट्रीय सहमति' (Bipartisan Consensus) मौजूद है। विपक्षी खेमे के नेता—चाहे वह गादी आइजनकोट हों या यायर लापिड—पहले भी भारत के साथ प्रगाढ़ संबंधों की वकालत करते रहे हैं। लापिड के संक्षिप्त कार्यकाल में भी द्विपक्षीय व्यापार और सुरक्षा सहयोग उसी रफ्तार से आगे बढ़ा था। इसलिए सत्ता परिवर्तन की स्थिति में भी भारत-इजरायल रिश्तों की बुनियादी दिशा में किसी नकारात्मक बदलाव की आशंका नहीं है।
आगे की राह: गठबंधन की लंबी खींचतान या फिर से नए चुनाव?
इजरायल के कानून के मुताबिक, चुनाव के अंतिम परिणाम घोषित होने के बाद देश के राष्ट्रपति सबसे बड़े दल या नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे और उन्हें 28 दिनों का समय (जिसे 14 दिन और बढ़ाया जा सकता है) दिया जाएगा। यदि नेतन्याहू या आइजनकोट में से कोई भी 61 सांसदों का समर्थन पत्र राष्ट्रपति को नहीं सौंप पाता, तो देश एक बार फिर नए चुनावों की ओर धकेल दिया जा सकता है।
आने वाले 48 से 72 घंटे इजरायल के भविष्य की दिशा तय करने में निर्णायक होंगे। जब तक मतपेटियों से निकली एक-एक पर्ची और सैनिकों के डाक मतपत्रों की गिनती पूरी नहीं हो जाती, तब तक 'किंग बीबी' की कुर्सी सुरक्षित है या जाएगी, इसका अंतिम फैसला अधर में ही लटका रहेगा।