इजरायल में सत्ता की चाबी अब अरब पार्टियों के हाथ में? 120 सीटों वाली नेसेट में फंसा 61 का जादुई आंकड़ा

इजरायल में सत्ता की चाबी अब अरब पार्टियों के हाथ में? 120 सीटों वाली नेसेट में फंसा 61 का जादुई आंकड़ा

पश्चिम एशिया में लगातार जारी सैन्य तनाव और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव के बीच इजरायल का घरेलू राजनीतिक परिदृश्य एक बार फिर अभूतपूर्व गतिरोध के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है। इजरायल की 120 सदस्यीय संसद यानी 'नेसेट' (Knesset) में सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटों का जादुई आंकड़ा हासिल करना किसी भी गठबंधन के लिए बेहद पेचीदा पहेली बन चुका है। देश के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले लिकुड पार्टी के दिग्गज नेता बेंजामिन नेतन्याहू के सामने अपनी सत्ता की कुर्सी को बचाए रखने की सबसे विकट चुनौती खड़ी हो गई है। हालिया राजनीतिक रुझानों, जनमत सर्वेक्षणों और आंतरिक समीकरणों से जो तस्वीर उभर रही है, उसने तेल अवीव से लेकर पश्चिमी येरुशलम तक की सत्ता के गलियारों में खलबली मचा दी है। इस बार सत्ता के खेल में सबसे निर्णायक मोड़ कोई यहूदी दक्षिणपंथी या मध्यमार्गी दल नहीं, बल्कि इजरायल की 21 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली अरब पार्टियां लाने जा रही हैं। यदि नेतन्याहू विरोधी खेमे और प्रो-नेतन्याहू गुट के बीच सीटों का अंतर नाममात्र का रह जाता है, तो देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, इसका अंतिम फैसला अरब नेतृत्व के रुख पर ही निर्भर करेगा।

किंगमेकर की भूमिका में अरब पार्टियां: मंसूर अब्बास और अहमद तीबी का बढ़ता सियासी कद

इजरायली संसद में अरब दलों का इतिहास लंबे समय तक केवल विपक्ष की बेंचों पर बैठकर प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराने का रहा था। लेकिन साल 2021 में मंसूर अब्बास की अगुवाई वाली 'राआम' (यूनाइटेड अरब लिस्ट) पार्टी ने नफ्ताली बेनेट और यायर लापिड की सरकार को समर्थन देकर दशकों पुरानी इस वर्जना को हमेशा के लिए तोड़ दिया था। वह इजरायल के इतिहास में पहला मौका था जब किसी स्वतंत्र अरब दल ने औपचारिक रूप से सरकार का हिस्सा बनकर सत्ता की चाबी अपने हाथ में थामी थी। अब एक बार फिर मंसूर अब्बास और हदाश-ताल (Hadash-Ta'al) गठबंधन के नेता अहमद तीबी और अयमान ओदेह देश की राजनीति के केंद्र में आ चुके हैं। जहां हदाश-ताल पारंपरिक रूप से अधिक मुखर और फलस्तीनी अधिकारों को लेकर सख्त रुख अपनाता है, वहीं मंसूर अब्बास की राआम पार्टी का जोर विशुद्ध रूप से व्यावहारिक (Pragmatic) नागरिक राजनीति पर है। अब्बास का स्पष्ट एजेंडा इजरायल के भीतर बसे अरब नागरिकों (1948 के फलस्तीनी मूल के नागरिक) के लिए बुनियादी सुविधाएं, अरब शहरों में अपराध नियंत्रण के लिए बजट, शिक्षा और आवास योजनाओं में बराबरी हासिल करना है। संसद में 10 से 12 सीटों का संभावित ब्लॉक रखने वाले ये दल आज उस स्थिति में हैं जहां वे तय कर सकते हैं कि नेसेट में विश्वास मत किसके पक्ष में गिरेगा।

61 सीटों का पेचीदा चुनावी गणित: प्रो-नेतन्याहू बनाम एंटी-नेतन्याहू खेमे की रस्साकशी

इजरायल की चुनावी प्रणाली आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) पर आधारित है, जहां पूरे देश को एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है और 3.25 प्रतिशत की न्यूनतम चुनावी दहलीज (Threshold) पार करने वाली पार्टियों को वोट शेयर के अनुपात में सीटें मिलती हैं। वर्तमान राजनीतिक धरातल पर दो मुख्य खेमे आमने-सामने हैं: पहला खेमा नेतन्याहू का 'राइट-विंग ब्लॉक' है, जिसमें उनकी लिकुड पार्टी के अलावा धुर-दक्षिणपंथी और धार्मिक दल शामिल हैं—जैसे इटामार बेन-ग्विर की ओत्जमा येहुदित (Otzma Yehudit), बेजलेल स्मोट्रिच की रिलीजियस जियोनिज्म, और अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स दल जैसे शास (Shas) तथा यूनाइटेड तोराह जुडाइज्म (UTJ)। जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, यह ब्लॉक वर्तमान में 50 से 53 सीटों के आसपास सिमटता नजर आ रहा है, जो 61 के बहुमत से काफी दूर है। दूसरा खेमा नेतन्याहू विरोधी गठबंधन का है, जिसमें यायर लापिड की 'येश अतिद' (Yesh Atid), बेनी गैंट्ज़ की 'नेशनल यूनिटी' (National Unity), यायर गोलन की अगुवाई वाला नया वाम-मध्यमार्गी गठबंधन 'द डेमोक्रेट्स' (The Democrats) और एविग्डोर लीबरमैन की 'यिसराइल बेइतेनु' (Yisrael Beiteinu) शामिल हैं। यह गैर-अरब विपक्षी खेमा मिलकर 56 से 58 सीटों तक तो पहुंचता दिख रहा है, लेकिन 61 के पार जाने के लिए इनके पास भी अपने दम पर संख्या बल नहीं है। यहीं से अरब पार्टियों की 10 से 12 सीटों की भूमिका शुरू होती है। बिना अरब दलों के प्रत्यक्ष समर्थन या बाहर से दिए गए समर्थन (Outside Support) के नेतन्याहू को हटाकर कोई नई सरकार गठित कर पाना गणितीय रूप से असंभव दिखाई देता है।

दक्षिणपंथी विपक्ष की दुविधा: क्या नेतन्याहू को हटाने के लिए अरब नेताओं से हाथ मिलाएंगे गैंट्ज़ और लीबरमैन?

कागजों पर गणित भले ही विपक्ष के पक्ष में दिखता हो, लेकिन धरातल पर यह गठबंधन बनाना कांटों भरे ताज जैसा है। विपक्षी खेमे में शामिल एविग्डोर लीबरमैन और बेनी गैंट्ज़ जैसे दक्षिणपंथी और पूर्व-सैन्य पृष्ठभूमि के नेताओं के लिए अरब दलों के साथ मंच साझा करना वैचारिक रूप से एक बहुत बड़ा जोखिम है। इजरायल का मुख्यधारा का यहूदी दक्षिणपंथी वोटर किसी भी ऐसी सरकार को आसानी से स्वीकार नहीं करता जो राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में अरब सांसदों पर निर्भर हो। खासकर गाजा और लेबनान संघर्ष के बाद इजरायली समाज का राजनीतिक मिजाज काफी हद तक दक्षिणपंथ की ओर झुका है। विपक्षी नेताओं को इस बात का डर सता रहा है कि यदि वे खुले तौर पर मंसूर अब्बास या अहमद तीबी से हाथ मिलाते हैं, तो नेतन्याहू इसे 'देश की सुरक्षा से समझौता' बताकर राष्ट्रवाद का कार्ड खेलेंगे और मध्यमार्गी यहूदी मतदाताओं को अपनी ओर खींच लेंगे। दूसरी तरफ, यदि वे अरब पार्टियों को पूरी तरह नजरअंदाज करते हैं, तो उनके पास नेतन्याहू को सत्ता से बेदखल करने का कोई दूसरा संसदीय रास्ता ही नहीं बचता।

गाजा युद्ध, सुरक्षा नीतियां और अरब मतदाताओं का मूड: तेल अवीव से हाइफा तक क्या बदल गया?

इजरायल के भीतर रहने वाले लगभग 20 लाख अरब नागरिक, जो हाइफा, नाज़रेथ, उम्म अल-फहम और नेगेव के रेगिस्तानी इलाकों में फैले हुए हैं, इस समय गहरे आंतरिक संकट से गुजर रहे हैं। एक तरफ वे गाजा और वेस्ट बैंक में अपने फलस्तीनी भाइयों की मानवीय त्रासदी को लेकर गहरे क्षोभ में हैं, तो दूसरी तरफ इजरायल के भीतर अपने ही कस्बों में संगठित अपराध (Organized Crime), बेरोजगारी और बुनियादी नागरिक अधिकारों के अभाव से जूझ रहे हैं। अरब समाज के भीतर यह बहस तेज है कि क्या उन्हें इजरायली राजनीति का बहिष्कार करना चाहिए या फिर मंसूर अब्बास के रास्ते पर चलकर सत्ता में भागीदार बनकर अपने अधिकारों के लिए सौदेबाजी करनी चाहिए। हालिया रिपोर्टों से पता चलता है कि अरब मतदाताओं में वोटिंग प्रतिशत में होने वाली हल्की सी बढ़ोतरी भी नेसेट के पूरे संतुलन को उलट-पुलट कर सकती है। यदि अरब मतदाता बड़ी संख्या में घरों से बाहर निकलते हैं और दोनों प्रमुख अरब गठबंधन संसद की दहलीज पार कर जाते हैं, तो नेतन्याहू के ब्लॉक के लिए बहुमत हासिल करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।

क्या नेतन्याहू का सियासी तिलिस्म टूटेगा या फिर से होगा कोई अप्रत्याशित 'मास्टरस्ट्रोक'?

बेंजामिन नेतन्याहू को इजरायली राजनीति का 'जादूगर' कहा जाता है, जो हारी हुई बाजी को भी पलट देने के लिए जाने जाते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए नेतन्याहू दोतरफा रणनीति पर काम कर रहे हैं। पहला, वे विपक्ष के भीतर मौजूद दक्षिणपंथी तत्वों (जैसे लीबरमैन या साआर) को यह डर दिखाकर तोड़ने की कोशिश कर सकते हैं कि अरब पार्टियों के समर्थन से बनने वाली सरकार इजरायल के अस्तित्व के लिए खतरा होगी। दूसरा, 2021 से पहले नेतन्याहू खुद भी गुप्त रूप से मंसूर अब्बास के साथ बातचीत के रास्ते खोल चुके थे, ऐसे में सत्ता बचाने के लिए वे किसी भी राजनीतिक समझौते से पीछे नहीं हटेंगे। यदि कोई भी गुट 61 का आंकड़ा जुटाने में पूरी तरह विफल रहता है, तो इजरायल एक बार फिर लगातार छठवें या सातवें चुनाव के अंतहीन चक्र में फंस सकता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में इतना तय है कि अरब पार्टियों को दरकिनार करके अब येरुशलम की गद्दी का फैसला नहीं हो सकता। अरब नेता अब मात्र मूकदर्शक नहीं हैं, बल्कि वे उस तराजू के सबसे भारी पलड़े बन चुके हैं जो यह तय करेगा कि इजरायल का अगला राजनीतिक अध्याय किस दिशा में लिखा जाएगा।