भारतीयों ने डुबोई ट्रंप की लुटिया, मुनीर को हलाल, वीजा पर बवाल, ऐसे नहीं हुआ रिपब्लिकंस ऐसा हाल
अमेरिकी राजनीति के गलियारों में इस समय भूचाल आया हुआ है और इसकी आंच सीधे तौर पर डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी तक पहुंचती दिखाई दे रही है। अमेरिका में हाल ही में संपन्न हुए राजनीतिक घटनाक्रमों और चुनाव परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि अप्रवासी समुदाय, विशेष तौर पर भारतीय-अमेरिकी अब वहां की राजनीति में किसी एक दल की बपौती नहीं रहे हैं। एक समय था जब अप्रवासी मतदाता अपनी प्राथमिकताओं को लेकर बंटे हुए थे या फिर पारंपरिक रूप से डेमोक्रेट्स की ओर झुके रहते थे, लेकिन इस बार के समीकरण पूरी तरह से उलट नजर आए। जानकारों का मानना है कि ट्रंप की नीतियों, वीजा नियमों को लेकर कड़े रुख और प्रशासनिक प्राथमिकताओं ने भारतीय मूल के मतदाताओं को गहराई से प्रभावित किया, जिसका सीधा असर चुनाव के नतीजों पर देखने को मिला। रिपब्लिकन पार्टी के रणनीतिकार यह मानकर चल रहे थे कि आर्थिक नीतियों और करों में छूट के नाम पर उन्हें अप्रवासी वोटों का एक बड़ा हिस्सा आसानी से मिल जाएगा, लेकिन धरातल पर तस्वीर बिल्कुल उलट साबित हुई और पार्टी की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फेर दिया गया।
वीजा विवाद और अप्रवासन नीतियों पर तीखी प्रतिक्रिया
अमेरिकी आव्रजन प्रणाली में पिछले कुछ वर्षों से लगातार उठापटक जारी है और इसका सबसे ज्यादा असर भारतीय पेशेवरों, तकनीकी विशेषज्ञों और छात्रों पर पड़ा है। एच-1बी वीजा, ग्रीन कार्ड बैकलॉग और पारिवारिक इमीग्रेशन से जुड़े नियमों को लेकर ट्रंप प्रशासन और रिपब्लिकन नेताओं के जो कड़े तेवर रहे हैं, उसने भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बीच गहरी असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। सालों से अमेरिका में रहकर वहां की अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी की तरह योगदान देने वाले पेशेवर जब अपने ग्रीन कार्ड के लिए दशकों लंबा इंतजार करने को मजबूर होते हैं, तो उनका राजनीतिक मोहभंग होना स्वाभाविक है। इस बार के चुनावों और राजनीतिक बहसों में वीजा और वर्क परमिट के नियमों को उदार बनाने की मांग सबसे ऊपर रही, लेकिन रिपब्लिकन खेमे की तरफ से इस मोर्चे पर कोई ठोस और सकारात्मक आश्वासन नहीं दिया गया। इसके विपरीत, कड़े प्रतिबंधों और बॉर्डर सिक्योरिटी के नाम पर जो बयानबाजी सामने आई, उसने भारतीय समुदाय के एक बहुत बड़े वर्ग को रिपब्लिकन उम्मीदवारों से दूर कर दिया। यही वह मुख्य बिंदु था जहां से ट्रंप की लुटिया डूबने की शुरुआत हुई और मतदाताओं ने बैलेट बॉक्स के जरिए अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर दी।
वैश्विक कूटनीति और जनरल मुनीर के एंगल पर कड़े सवाल
इस पूरे भू-राजनीतिक ड्रामे के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के अमेरिका दौरों और वहां के रक्षा तंत्र के साथ हुई गोपनीय वार्ताओं ने भी भारतीय प्रवासियों को उद्वेलित करने का काम किया है। वाशिंगटन के गलियारों में पाकिस्तानी सेना के शीर्ष नेतृत्व के साथ बढ़ रही मुलाकातों और कूटनीतिक मेल-मिलाप पर जब भारतीय-अमेरिकियों की नजर पड़ी, तो इसे लेकर चिंताएं काफी बढ़ गईं। अमेरिका द्वारा एक तरफ भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा समझौतों की बात की जाती है, तो दूसरी तरफ पारंपरिक रूप से आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देश के सैन्य नेतृत्व को कथित तवज्जो मिलना भारतीय समुदाय को बिल्कुल रास नहीं आया। सोशल मीडिया से लेकर कम्युनिटी फोरम्स तक इस बात पर तीखी बहस छिड़ गई कि क्या वाशिंगटन एक बार फिर पुरानी गलतियों को दोहरा रहा है और दक्षिण एशिया में संतुलन बिगाड़ने का प्रयास कर रहा है। अप्रवासी भारतीयों ने इसे बहुत गहराई से महसूस किया और इस बात को लेकर स्थानीय सांसदों और सीनेटरों के सामने भी अपनी आवाज बुलंद की। कूटनीतिक मंचों पर इस तरह के विरोधाभासी कदमों ने न केवल भारत के प्रति अमेरिकी नीति पर सवाल खड़े किए, बल्कि वहां के चुनावों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले भारतीय वोट बैंक को भी एकजुट होकर रिपब्लिकन नीतियों के खिलाफ खड़ा कर दिया।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था और स्थानीय मुद्दों का बदलता समीकरण
केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति या वीजा तक ही यह मामला सीमित नहीं रहा, बल्कि घरेलू अमेरिकी अर्थशास्त्र और महंगाई के मोर्चे पर भी रिपब्लिकन पार्टी अपनी पकड़ मजबूत करने में नाकामयाब साबित हुई। भारतीय-अमेरिकी समुदाय मुख्य रूप से उच्च शिक्षित, उद्यमी, डॉक्टर, इंजीनियर और छोटे-बड़े व्यवसायी वर्ग से आता है, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव को बहुत बारीकी से समझता है। मुद्रास्फीति, टैक्स ढांचे और कॉर्पोरेट नीतियों को लेकर जो दावे ट्रंप कैंपेन द्वारा किए जा रहे थे, वे मध्यम वर्ग के अप्र प्रवासियों की जमीनी हकीकत से मेल खाते नजर नहीं आए। इसके अलावा, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में जिस प्रकार के वित्तीय कटौतियों के संकेत दिए गए, उसने भारतीय परिवारों के आर्थिक भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ा दीं। जब एक समुदाय अपने परिवार के भविष्य और स्थिरता को खतरे में देखता है, तो वह पारंपरिक वफादारियों को छोड़कर व्यावहारिक विकल्पों की तलाश करता है। इस बार के राजनीतिक माहौल में यही प्रैक्टिकल सोच हावी रही और मतदाताओं ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों के बजाय उन विकल्पों को चुना जो उनके हितों की रक्षा करने का भरोसा दिलाते थे।
भविष्य की राजनीति पर गहराता प्रभाव और सबक
यह पूरा घटनाक्रम अमेरिकी राजनीतिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है, क्योंकि इसने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब किसी भी दल को अप्रवासी वोटों को हल्के में लेने की भूल नहीं करनी चाहिए। भारतीय-अमेरिकी समुदाय अब केवल आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसा राजनीतिक रूप से जागरूक और मुखर समूह बन चुका है जो अपनी पसंद और नापसंद से चुनावों का पासा पलटने की कुब्बत रखता है। रिपब्लिकन पार्टी के लिए यह एक आत्मविश्लेषण का समय है कि आखिर क्यों उनके कड़े तौर-तरीके और नीतियां उस समुदाय को अपने पाले में नहीं खींच पाईं जो रूढ़िवादी आर्थिक मूल्यों के सबसे करीब माना जाता था। आने वाले समय में चाहे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव हों या फिर सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के चुनाव, हर जगह भारतीय मूल के मतदाताओं की भूमिका और अधिक निर्णायक होने वाली है। राजनेताओं को अब अपनी रणनीतियों में बदलाव करना होगा और अप्रवासन, वीजा सुधार तथा द्विपक्षीय संबंधों के मामले में अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो आने वाले चुनावों में भी रिपब्लिकन्स को इसी प्रकार के जन-आक्रोश और राजनीतिक झटकों का सामना करना पड़ेगा, जिससे उनकी जीत की संभावनाएं लगातार धूमिल होती रहेंगी।