14 अगस्त को जश्न-ए-आजादी के बीच दहला पाकिस्तान, तीन अलग-अलग आतंकी हमलों में 4 पुलिसकर्मियों की दर्दनाक मौत, कई घायल; सुरक्षा चौकियों पर अंधाधुंध गोलीबारी से स्वतंत्रता दिवस समारोहों में पसरा मातम
14 अगस्त को जब पूरा पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस (जश्न-ए-आजादी) मनाने और राजधानी इस्लामाबाद से लेकर प्रांतीय राजधानियों तक कड़े सुरक्षा पहरे के बीच राष्ट्रीय ध्वजारोहण समारोहों की तैयारियों में जुटा था, उसी समय देश के अशांत सीमावर्ती प्रांतों में आतंकवादियों ने एक बार फिर खूनी खेल खेलकर सुरक्षा व्यवस्था के तमाम दावों की धज्जियां उड़ा दीं। पाकिस्तान के अशांत खैबर पख्तूनख्वा (KPK) प्रांत और आसपास के इलाकों में आतंकियों ने योजनाबद्ध तरीके से सुरक्षा बलों और पुलिस चौकियों को निशाना बनाते हुए तीन अलग-अलग जगहों पर भीषण हमले किए। इन कायराना हमलों में ड्यूटी पर तैनात चार पुलिसकर्मियों की मौके पर ही गोली लगने से मौत हो गई, जबकि कई अन्य सुरक्षाकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। राष्ट्रीय पर्व के दिन हुए इस सिलसिलेवार खूनी उपद्रव ने न केवल आम नागरिकों के बीच दहशत का माहौल पैदा कर दिया, बल्कि पाकिस्तान की चरमराती आंतरिक सुरक्षा और खुफिया तंत्र की घोर विफलता को एक बार फिर दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है।
तीन अलग-अलग जगहों पर घात लगाकर हमला: सुरक्षा चौकियों पर अंधाधुंध फायरिंग
पुलिस और स्थानीय मीडिया से प्राप्त प्राथमिक जानकारियों के अनुसार, आतंकवादियों ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तैनात विशेष सुरक्षा पिकेट्स और गश्ती वाहनों को अपना सीधा निशाना बनाया। पहला और सबसे घातक हमला खैबर पख्तूनख्वा के संवेदनशील जिले में स्थित एक पुलिस चेकपोस्ट पर हुआ, जहां भारी हथियारों और स्वचालित राइफलों से लैस अज्ञात आतंकवादियों ने अचानक चारों तरफ से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
चौकी पर मौजूद पुलिसकर्मियों को संभलने का मौका तक नहीं मिला और दो जवान गोलियों की चपेट में आकर वीरगति को प्राप्त हो गए। इसके कुछ ही घंटों के भीतर दूसरे इलाके में नियमित पेट्रोलिंग पर निकली पुलिस मोबाइल वैन पर घात लगाकर आधुनिक असॉल्ट हथियारों से ताबड़तोड़ गोलियां बरसाई गईं, जिसमें एक हेड कांस्टेबल की जान चली गई और वैन का चालक गंभीर रूप से जख्मी हो गया।
तीसरी घटना एक अन्य सब-डिवीजनल क्षेत्र में घटी, जहां मोटरसाइकिल सवार नकाबपोश हमलावरों ने ट्रैफिक और सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे पुलिसकर्मियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं और एक अन्य जवान को मौत के घाट उतारकर फरार हो गए। हमलावर वारदातों को अंजाम देने के तुरंत बाद घने जंगलों और पहाड़ी रास्तों का फायदा उठाकर भाग निकलने में सफल रहे।
खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में सुरक्षा का संकट: टीटीपी और अलगाववादियों का खौफ
पाकिस्तान में 14 अगस्त के दिन हुए इन हमलों की किसी भी संगठन ने तुरंत आधिकारिक जिम्मेदारी भले न ली हो, लेकिन सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि इस पूरे पैटर्न के पीछे प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) या स्थानीय अलगाववादी चरमपंथी गुटों का हाथ है। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांत पिछले दो वर्षों से लगातार सबसे भीषण आतंकवादी हिंसा की चपेट में हैं।
नवंबर 2022 में टीटीपी द्वारा पाकिस्तान सरकार के साथ संघर्षविराम (सीजफायर) खत्म करने के बाद से पुलिस, फ्रंटियर कोर (FC) और सैन्य ठिकानों पर हमलों की बाढ़ आ गई है। आतंकवादी संगठन विशेष रूप से राष्ट्रीय दिवसों और त्योहारों के मौके पर बड़े हमले कर सरकार और सेना को यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि राज्य की कानून-व्यवस्था पूरी तरह उनके निशाने पर है। खैबर पख्तूनख्वा पुलिस इन दिनों आतंकियों के लिए सबसे आसान और सीधा शिकार (सॉफ्ट टारगेट) बन चुकी है क्योंकि उनके पास सेना की तुलना में आधुनिक बुलेटप्रूफ जैकेट्स, नाइट विजन डिवाइसेस और बख्तरबंद वाहनों की भारी कमी है।
स्वतंत्रता दिवस के जश्न पर खौफ का साया: अस्पतालों में इमरजेंसी, सर्च ऑपरेशन तेज
स्वतंत्रता दिवस के दिन एक के बाद एक हुए इन तीन हमलों के बाद संबंधित जिलों के सभी प्रमुख अस्पतालों में तुरंत मेडिकल इमरजेंसी घोषित कर दी गई। गंभीर रूप से घायल पुलिसकर्मियों को प्राथमिक उपचार के बाद सैन्य और बड़े सरकारी अस्पतालों में एयरलिफ्ट कराया गया है, जहां कई जवानों की हालत बेहद नाजुक बताई जा रही है।
घटना के तुरंत बाद पाकिस्तानी सेना, आतंकवाद रोधी विभाग (CTD) और अर्धसैनिक बलों की अतिरिक्त टुकड़ियों ने पूरे इलाके को सील कर दिया है। आतंकियों की धरपकड़ के लिए जंगलों, पहाड़ी ठिकानों और संदिग्ध बस्तियों में बड़े पैमाने पर 'कार्डन एंड सर्च ऑपरेशन' शुरू किया गया है।
हमलों के चलते प्रांत भर में आयोजित होने वाले कई स्वतंत्रता दिवस समारोहों, स्कूली कार्यक्रमों और रैलियों की सुरक्षा को तत्काल प्रभाव से बढ़ा दिया गया और कई गैर-जरूरी सार्वजनिक सभाओं को सुरक्षा कारणों से संक्षिप्त कर दिया गया। आम जनता के बीच दहशत इतनी बढ़ गई कि बाजारों और स्वतंत्रता दिवस स्टॉलों पर सन्नाटा पसर गया।
आंतरिक सुरक्षा पर गहराता संकट और सरकार-सेना की विफलता
पाकिस्तान की सत्ता पर काबिज शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के लिए स्वतंत्रता दिवस पर हुआ यह हमला एक बहुत बड़ा रणनीतिक झटका है। सरकार ने हाल ही में आतंकवाद के पूर्ण सफाए के लिए 'ऑपरेशन अज्म-ए-इस्तेहकाम' (Azm-e-Istehkam) नाम से एक नए राष्ट्रीय सुरक्षा अभियान का ऐलान किया था, लेकिन यह अभियान शुरू से ही राजनीतिक विवादों और जनविरोध में घिरा रहा।
विपक्षी दलों और खैबर पख्तूनख्वा की प्रांतीय सरकार का आरोप है कि संघीय सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान आतंकवाद के वास्तविक कारणों को हल करने के बजाय केवल राजनीतिक विरोधियों को दबाने और सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य छावनियां बनाने में व्यस्त हैं। जब देश के भीतर पुलिस बल ही अपने थानों और चौकियों में सुरक्षित नहीं है, तो वह आम नागरिकों की रक्षा कैसे कर पाएगा। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियां (ISI और IB) देश की सीमाओं और आंतरिक इलाकों में आतंकियों के मूवमेंट को ट्रैक करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही हैं।
अफगानिस्तान सीमा का तनाव और आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाह का मुद्दा
पाकिस्तान सरकार और सैन्य नेतृत्व अक्सर अपने यहां होने वाले हर आतंकी हमले का ठीकरा पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान की तालिबान हुकूमत पर फोड़ते रहे हैं। इस्लामाबाद का दावा है कि टीटीपी के शीर्ष कमांडर और लड़ाके अफगान सरजमीं का इस्तेमाल कर सीमा पार से पाकिस्तान में हमलों की साजिश रचते हैं।
हालांकि, काबुल स्थित अफगान तालिबान प्रशासन ने पाकिस्तान के इन आरोपों को हमेशा खारिज किया है और कहा है कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक सुरक्षा और पुलिसिंग की कमजोरियों को छिपाने के लिए दूसरों पर दोष मढ़ना बंद करे। डूरंड लाइन (सीमा) पर बाड़ लगाने और भारी सैन्य तैनाती के बावजूद आतंकियों की बेरोकटोक घुसपैठ यह दर्शाती है कि सीमा प्रबंधन और रणनीतिक नीतियों में गहरी खामियां मौजूद हैं।
जश्न के बीच शोक में डूबे शहीद परिवारों के घर
जश्न-ए-आजादी के पावन दिन जहां पूरे देश में तिरंगे और हरे-सफेद झंडों के साथ आतिशबाजी होनी थी, वहीं इन चार पुलिसकर्मियों के घरों में मातम और चीख-पुकार मच गई। अपने कर्तव्य की वेदी पर जान कुर्बान करने वाले इन जवानों के पार्थिव शरीरों को जब उनके पैतृक गांवों में लाया गया, तो हर आंख नम थी।
शहीदों के जनाजे में शामिल स्थानीय नागरिकों और पुलिस अधिकारियों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम सलामी दी, लेकिन साथ ही लोगों में सरकार की नाकामी को लेकर भारी गुस्सा भी देखा गया। परिजनों का कहना है कि हर बार हमलों के बाद केवल जांच के खोखले वादे किए जाते हैं, लेकिन जवानों की शहादत का यह सिलसिला वर्षों से थमने का नाम नहीं ले रहा है।
बदहाल अर्थव्यवस्था और खूनी आतंकवाद के दोहरे भंवर में फंसा मुल्क
पाकिस्तान इस वक्त अपने इतिहास के सबसे नाजुक दौर से गुजर रहा है। एक तरफ जहां देश रिकॉर्ड तोड़ महंगाई, विदेशी कर्ज, आईएमएफ (IMF) की कड़ी शर्तों और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ पश्चिम और उत्तर-पश्चिम से उठता आतंकवाद का तूफान देश के अस्तित्व के लिए सीधा खतरा बन गया है।
विदेशी निवेशकों और पर्यटकों के लिए पहले से ही असुरक्षित माने जाने वाले पाकिस्तान में जब स्वतंत्रता दिवस जैसे सर्वोच्च सुरक्षा वाले दिन भी पुलिसकर्मियों का सरेआम कत्लेआम हो जाता है, तो यह वैश्विक मंच पर देश की साख को पूरी तरह तबाह कर देता है। जब तक पाकिस्तानी हुकूमत अपनी आंतरिक सुरक्षा प्राथमिकताओं को दुरुस्त नहीं करती और आतंक के खिलाफ एक पारदर्शी व ईमानदार नीति नहीं अपनाती, तब तक ऐसे खूनी हमलों की विभीषिका से पाकिस्तान का पीछा छूटना नामुमकिन नजर आता है।