हार से और बौखलाए ट्रंप? अब भारतीय कंपनियों पर अमेरिका ने ठोका सैंक्शन, ईरान से दोस्ती निभाने पर एक्शन

हार से और बौखलाए ट्रंप? अब भारतीय कंपनियों पर अमेरिका ने ठोका सैंक्शन, ईरान से दोस्ती निभाने पर एक्शन

वाशिंगटन और नई दिल्ली के कूटनीतिक रिश्तों में उस समय अचानक बड़ा मोड़ आ गया, जब अमेरिकी प्रशासन ने भारत की कई प्रमुख कंपनियों और उनसे जुड़े व्यक्तियों पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध (Sanctions) लगाने का एकतरफा ऐलान कर दिया। हालिया राजनीतिक उथल-पुथल और घरेलू मोर्चे पर दबाव का सामना कर रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम को वैश्विक मामलों के जानकार उनकी हताशा और कड़ा रुख दिखाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। वाशिंगटन का आरोप है कि ये भारतीय कंपनियां ईरान के साथ गुपचुप तरीके से व्यापारिक और वित्तीय लेनदेन में शामिल थीं और उन्होंने अमेरिकी प्रतिबंधों की अनदेखी करते हुए तेहरान के पेट्रोलियम तथा पेट्रोकेमिकल नेटवर्क को मदद पहुंचाई। अमेरिका के वित्त और विदेश मंत्रालय द्वारा जारी इस आधिकारिक आदेश के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल मच गई है, क्योंकि भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ समय से व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने पर काफी चर्चाएं चल रही थीं।

अमेरिकी विदेश विभाग का कड़ा आरोप और प्रतिबंधों का दायरा

अमेरिकी विदेश मंत्रालय और ट्रेजरी विभाग की रिपोर्ट में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि प्रतिबंधित की गई भारतीय संस्थाओं ने ईरान के ऊर्जा क्षेत्र के साथ करोड़ों डॉलर के सौदे किए। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ये कंपनियां 'शैडो फ्लीट' (Shadow Fleet) यानी उन संदिग्ध तेल टैंकरों और फर्जी नेटवर्क का हिस्सा बनीं, जिनका इस्तेमाल ईरान अपने तेल और रासायनिक उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अवैध रूप से बेचने के लिए करता है। इन कड़े प्रतिबंधों के तहत अब इन सभी भारतीय कंपनियों और उनसे जुड़े निदेशकों की अमेरिका में मौजूद संपत्तियों को पूरी तरह फ्रीज कर दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी नागरिकों या संस्थाओं को इन कंपनियों के साथ किसी भी तरह के सीधे या अप्रत्यक्ष व्यापारिक लेनदेन से साफ तौर पर रोक दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कार्रवाई का सीधा असर इन कंपनियों के वैश्विक कारोबार पर पड़ेगा, क्योंकि वैश्विक बैंकिंग प्रणाली अमेरिकी वित्तीय नेटवर्क पर काफी हद तक निर्भर रहती है।

चाबहार पोर्ट से लेकर ऊर्जा व्यापार पर कूटनीतिक तनातनी

भारत और ईरान के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं। भारत न केवल ईरान के चाबहार बंदरगाह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, बल्कि मध्य एशिया और रूस तक व्यापारिक पहुंच बनाने के लिए ईरान को एक रणनीतिक गलियारे के रूप में देखता है। हालांकि, वाशिंगटन लंबे समय से भारत पर ईरान से अपने व्यापारिक और ऊर्जा संबंधों को पूरी तरह खत्म करने का दबाव बनाता आया है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ताओं का कहना है कि ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों को लागू कराने के लिए अमेरिका किसी भी देश की कंपनियों को बख्शने के मूड में नहीं है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो भी संस्थाएं तेहरान की शासन व्यवस्था को आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान करेंगी, उन्हें अमेरिकी प्रतिबंधों का खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा। इस कदम से साफ झलकता है कि ट्रंप प्रशासन ईरान की आर्थिक कमर तोड़ने की अपनी 'अधिकतम दबाव' (Maximum Pressure) नीति को लेकर बेहद आक्रामक रुख अपनाए हुए है।

चुनावी हार का गुस्सा या विदेश नीति का दबाव?

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग अमेरिकी प्रशासन के इस अचानक उठाए गए कदम को वहां की अंदरूनी राजनीति से जोड़कर भी देख रहा है। अमेरिका में हाल ही में संपन्न हुए राजनीतिक घटनाक्रमों और विपक्षी दबाव के बीच ट्रंप प्रशासन अपनी साख को बचाने के लिए आक्रामक कदम उठा रहा है। घरेलू राजनीति में बैकफुट पर आने के बाद अपनी मजबूत और सख्त छवि बनाए रखने के उद्देश्य से इस तरह की अंतरराष्ट्रीय कार्रवाइयां की जा रही हैं। आलोचकों का मानना है कि व्यापारिक प्रतिबंधों का इस्तेमाल अमेरिका अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए एक हथियार की तरह कर रहा है। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जब-जब वाशिंगटन ने तेहरान पर शिकंजा कसने की कोशिश की है, उसका अप्रत्यक्ष खमियाजा भारतीय व्यापार जगत को उठाना पड़ा है। इस ताजा घटनाक्रम के बाद अब भारतीय उद्योग जगत के बीच अमेरिका के साथ भविष्य के सौदों को लेकर गहरी अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है।

भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार और भविष्य का रोडमैप

भारतीय कंपनियों पर अमेरिका द्वारा अचानक ठोके गए इस सैंक्शन ने नई दिल्ली के विदेश मंत्रालय और नीति निर्धारकों की चिंता बढ़ा दी है। भारत हमेशा से ही यह रुख बनाए रहा है कि वह केवल संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को ही कानूनी रूप से मानने के लिए बाध्य है, न कि किसी देश के एकतरफा प्रतिबंधों को। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देने की बात लगातार दोहराता आया है। हालांकि, मौजूदा दौर में जब भारतीय कंपनियां वैश्विक सप्लाई चेन का अभिन्न हिस्सा बन रही हैं, अमेरिकी प्रतिबंधों के साए में काम करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। अब देखना यह होगा कि भारत सरकार इस मुद्दे को लेकर वाशिंगटन के समक्ष कितनी सख्ती से अपनी बात रखती है और प्रभावित कंपनियों के हितों की रक्षा के लिए क्या कूटनीतिक कदम उठाए जाते हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय वार्ताओं और रणनीतिक समझौतों का एक मुख्य केंद्र बिंदु बनने जा रहा है।