Google ने 5 बड़े देशों में शुरू किया वॉलंटरी एग्जिट प्रोग्राम; जानें किन कर्मचारियों पर मंडराया संकट

Google ने 5 बड़े देशों में शुरू किया वॉलंटरी एग्जिट प्रोग्राम; जानें किन कर्मचारियों पर मंडराया संकट

नई दिल्ली: वैश्विक तकनीकी क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर अरबों डॉलर के भारी निवेश और लागत नियंत्रण की दोहरी रणनीति के बीच सर्च इंजन दिग्गज गूगल (Google) की पैरेंट कंपनी अल्फाबेट (Alphabet) ने कर्मचारियों के लिए एक चौंकाने वाला कदम उठाया है। कंपनी ने सीधे तौर पर जबरन छंटनी करने के बजाय 'पैसा लेकर नौकरी छोड़ने' यानी स्वैच्छिक निकास कार्यक्रम (Voluntary Exit Program / Buyout Offers) का विस्तार किया है। रॉयटर्स की हालिया रिपोर्ट और कंपनी के आधिकारिक बयानों के अनुसार, गूगल ने दुनिया के 5 प्रमुख विकसित देशों में अपने कर्मचारियों को आकर्षक सेवरेंस पैकेज देकर खुद से इस्तीफा देने का विकल्प दिया है। इस कदम के सामने आते ही वैश्विक टेक जगत में एक बार फिर नौकरियों की सुरक्षा को लेकर हलचल मच गई है और कई प्रभावित विभागों के कर्मचारियों के सामने अपने करियर को लेकर अनिश्चितता खड़ी हो गई है।

किन 5 देशों में गूगल ने शुरू की यह योजना और क्या है सेवरेंस पैकेज?

गूगल ने इस स्वैच्छिक प्रस्थान कार्यक्रम का दायरा बढ़ाते हुए यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के पांच प्रमुख देशों को अपने दायरे में लिया है। इनमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, जापान और स्विट्जरलैंड शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, कंपनी ने इन देशों में चुनिंदा टीमों के कर्मचारियों को भारी भरकम सेवरेंस पैकेज की पेशकश की है। स्विट्जरलैंड जैसे बड़े इंजीनियरिंग हब से सामने आई जानकारी के मुताबिक, इस पैकेज के तहत नौकरी छोड़ने वाले कर्मचारियों को उनके काम किए गए प्रत्येक वर्ष के बदले एक महीने का पूरा वेतन दिया जा रहा है। हालांकि, इस मुआवजे की अधिकतम सीमा 12 महीने यानी एक वर्ष के वेतन तक सीमित रखी गई है। यानी यदि किसी कर्मचारी ने 8 साल काम किया है, तो उसे 8 महीने का वेतन एकमुश्त देकर सम्मानजनक विदाई दी जा रही है। ज्यूरिख में स्थित गूगल के बड़े इंजीनियरिंग सेंटर में लगभग 5,000 कर्मचारी कार्यरत हैं, जहां से कई कर्मचारियों ने पहले ही इस ऑफर को स्वीकार कर लिया है।

किन कर्मचारियों पर संकट और कौन सी प्रमुख टीमें हैं इस दायरे से बाहर?

गूगल द्वारा शुरू की गई इस स्वैच्छिक छंटनी का असर हर विभाग पर समान रूप से नहीं पड़ रहा है। कंपनी ने उन पारंपरिक टीमों, सपोर्ट फंक्शन, नॉन-कोर इंजीनियरिंग और एडमिनिस्ट्रेटिव वर्टिकल को चिन्हित किया है जहां ऑटोमेशन और एआई के कारण कर्मचारियों की जरूरत कम हो रही है। हालांकि, सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि गूगल की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक इकाइयां—विशेष रूप से गूगल डीपमाइंड (Google DeepMind) और गूगल क्लाउड (Google Cloud)—इस बायआउट ऑफर के दायरे से पूरी तरह बाहर रखी गई हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि गूगल कोर एआई रिसर्च, लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLM) के विकास और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े उच्च-स्तरीय तकनीकी प्रतिभाओं को किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहता। संकट उन मध्य-स्तरीय और पारंपरिक सॉफ्टवेयर रोल्स पर है जिनका काम अब एआई टूल्स की मदद से आसानी से पूरा किया जा रहा है।

एआई पर अरबों डॉलर का खर्च और पारंपरिक लागत में कटौती की दोहरी मार

अल्फाबेट और गूगल के इस कदम के पीछे की सबसे बड़ी वजह सिलिकॉन वैली में चल रही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भीषण जंग है। माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न और मेटा जैसी दिग्गज टेक कंपनियों की तरह गूगल भी डेटा सेंटर्स, एनवीडिया के उन्नत जीपीयू (GPU) चिप्स और अगली पीढ़ी के एआई मॉडल्स के प्रशिक्षण पर हर तिमाही अरबों डॉलर का भारी पूंजीगत व्यय (CapEx) कर रहा है। निवेशकों की ओर से यह कड़ा दबाव है कि कंपनी अपनी बैलेंस शीट को संतुलित रखे और राजस्व वृद्धि के मुकाबले ऑपरेटिंग मार्जिन को गिरने न दे। इस वित्तीय संतुलन को साधने के लिए गूगल ने एक चतुर रणनीति अपनाई है: जहां एक तरफ भविष्य की तकनीक (AI) में भारी निवेश जारी है, वहीं दूसरी तरफ पारंपरिक कर्मचारियों की संख्या को घटाकर परिचालन लागत को कम किया जा रहा है।

सीधे बर्खास्तगी के बजाय 'वॉलंटरी एग्जिट' का रास्ता क्यों चुन रही है कंपनी?

साल 2023 के शुरुआती महीनों में जब गूगल ने एक ही झटके में लगभग 12,000 कर्मचारियों की सामूहिक छंटनी की थी, तब कंपनी को दुनिया भर में भारी विरोध, कानूनी मुकदमों और कर्मचारी यूनियनों के कड़े असंतोष का सामना करना पड़ा था। विशेष रूप से यूरोप के देशों—जैसे फ्रांस, जर्मनी और स्विट्जरलैंड—में श्रम कानून (Labor Laws) बेहद सख्त हैं, जहां किसी कंपनी के लिए कर्मचारियों को अचानक नौकरी से निकालना कानूनी रूप से अत्यंत जटिल और समय लेने वाला होता है। ज्यूरिख में पिछली छंटनी के दौरान कर्मचारियों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया था और वॉकआउट भी किया था। कानूनी झमेलों और अपनी अंतरराष्ट्रीय ब्रांड छवि को नुकसान से बचाने के लिए गूगल प्रबंधन ने इस बार 'स्वैच्छिक बायआउट' का रास्ता चुना है। इसमें कर्मचारियों को विकल्प दिया जाता है कि वे आपसी सहमति से मुआवजा लेकर कंपनी छोड़ दें, जिससे श्रम न्यायालयों के हस्तक्षेप की गुंजाइश खत्म हो जाती है।

माइक्रोसॉफ्ट समेत अन्य टेक दिग्गजों का भी यही हाल: पूरी इंडस्ट्री में रीस्ट्रक्चरिंग

गूगल अकेली ऐसी कंपनी नहीं है जो कर्मचारियों को पैकेज देकर नौकरी छोड़ने के लिए प्रेरित कर रही है। तकनीकी जगत की अन्य दिग्गज कंपनियां भी इसी रास्ते पर चल रही हैं। हाल ही में माइक्रोसॉफ्ट ने भी अपने लगभग 60,000 कर्मचारियों के लिए इसी प्रकार के बायआउट और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति कार्यक्रम की पेशकश की थी। सिलिकॉन वैली का यह रुझान साफ दर्शाता है कि कोरोना महामारी के दौर में की गई अंधाधुंध नियुक्तियों (Overhiring) का दौर अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है। अब तकनीकी कंपनियां 'लीन टीम' (कम कर्मचारियों वाली टीम) के सिद्धांत पर काम कर रही हैं, जहां एक कुशल इंजीनियर एआई कोडिंग टूल्स की मदद से कई लोगों का काम अकेले संभालने में सक्षम माना जा रहा है।

आईटी कर्मचारियों के लिए क्या है भविष्य का संदेश और बचने की रणनीति?

गूगल के इस ताजा कदम ने दुनिया भर के तकनीकी प्रोफेशनल्स को एक स्पष्ट और कड़ा संदेश दे दिया है। अब केवल किसी बड़ी एमएनसी या फॉर्च्यून 500 टेक कंपनी में नौकरी पा लेना आजीवन सुरक्षा की गारंटी नहीं रहा। कंपनियों की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि जो कर्मचारी पारंपरिक कोडिंग, मैनुअल टेस्टिंग या गैर-विशिष्ट भूमिकाओं तक सीमित रहेंगे, उनके लिए आने वाले समय में कंपनियों में टिके रहना बेहद मुश्किल होगा। करियर को सुरक्षित रखने का एकमात्र उपाय निरंतर 'अपस्किलिंग' (नई तकनीकें सीखना) है। जेनरेटिव एआई, मशीन लर्निंग, क्लाउड आर्किटेक्चर और साइबर सिक्योरिटी जैसे उभरते हुए डोमेन में खुद को अपग्रेड करने वाले इंजीनियरों की आज भी भारी मांग है, जबकि पुराने ढर्रे पर चल रहे रोल्स में ऐसी स्वैच्छिक विदाई की पेशकश आगे भी जारी रह सकती है।