वेदांता को ओडिशा सरकार का तगड़ा झटका: झारसुगुड़ा में 13 साल पुरानी 28.8 एकड़ औद्योगिक जमीन की लीज रद्द
उद्योग जगत और खनन क्षेत्र की दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनी वेदांता लिमिटेड को ओडिशा की राज्य सरकार ने एक बहुत बड़ा कानूनी और प्रशासनिक झटका दिया है। राज्य सरकार ने कड़ा कदम उठाते हुए ओडिशा के प्रमुख औद्योगिक जिले झारसुगुड़ा के पंचापड़ा गांव में स्थित 28.8 एकड़ प्राइम औद्योगिक भूमि की लीज को तत्काल प्रभाव से रद्द करने का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया है। यह जमीन पिछले लगभग 13 वर्षों से वेदांता के कब्जे में थी। राज्य के औद्योगिक बुनियादी ढांचा विकास निगम (IDCO) ने स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए कंपनी को आदेश दिया है कि वह इस 28.8 एकड़ भूमि का पूर्ण, विवाद-मुक्त और खाली कब्जा (Vacant Possession) बिना किसी विलंब के संबंधित जिला प्रशासनिक अधिकारियों को सौंप दे।
इसके साथ ही सरकारी आदेश में सख्त हिदायत दी गई है कि कंपनी इस जमीन पर किसी भी प्रकार का नया निर्माण कार्य शुरू नहीं करेगी और न ही इस भूखंड पर किसी तीसरे पक्ष (थर्ड पार्टी) का कोई हित अथवा अधिकार सृजित करने की चेष्टा करेगी। इस अप्रत्याशित प्रशासनिक फैसले के बाद से ही ओडिशा के राजनीतिक और कॉरपोरेट हलकों में जबरदस्त हलचल मच गई है, क्योंकि वेदांता समूह राज्य के सबसे बड़े निजी औद्योगिक निवेशकों में से एक है।
2013 में हुआ था आवंटन: 13 साल बाद मौके पर सिर्फ बाउंड्री वॉल, उद्योग का नामोनिशान नहीं
इस पूरे मामले की जड़ें एक दशक से भी अधिक पुरानी हैं। आधिकारिक दस्तावेजों और बिजनेस रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2013 में ओडिशा सरकार की नोडल एजेंसी 'इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन' (IDCO) ने झारसुगुड़ा के पंचापड़ा मौजा में यह 28.8 एकड़ जमीन वेदांता की तत्कालीन अनुषंगी कंपनी 'वेदांता एल्युमिनियम लिमिटेड' को औद्योगिक विस्तार और प्लांट संबंधी गतिविधियों के लिए आवंटित की थी। बाद में कंपनी के कॉरपोरेट पुनर्गठन और नाम परिवर्तन की औपचारिकताओं के पश्चात इस भूखंड की लीज को सीधे वेदांता लिमिटेड के नाम पर हस्तांतरित कर दिया गया था।
आवंटन के समय कंपनी ने यह प्रतिबद्धता जताई थी कि निर्धारित समयावधि के भीतर यहां व्यापक औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाएगा, जिससे स्थानीय युवाओं के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। पिछले वर्ष जब आईडीसीओ और राजस्व विभाग के विशेष जांच दल ने इस भूखंड का भौतिक सत्यापन (Physical Inspection) किया, तो जमीनी हकीकत चौंकाने वाली निकली। जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि आवंटन के 13 वर्ष बीत जाने के बावजूद जमीन पूरी तरह बंजर और खाली पड़ी हुई थी। वहां केवल चारों तरफ एक चारदीवारी (बाउंड्री वॉल) खड़ी कर दी गई थी, जबकि मौके पर किसी भी प्रकार की उत्पादन इकाई, स्थायी मशीनरी या सहायक औद्योगिक ढांचे का कोई नामोनिशान तक मौजूद नहीं था।
खाली जमीन को गिरवी रखकर बैंक से लिया कर्ज: सरकारी शर्तों की अनदेखी पर गिरी गाज
जांच में केवल जमीन का बंजर पड़ा रहना ही एकमात्र समस्या नहीं थी, बल्कि एक और गंभीर उल्लंघन सामने आया जिसने राज्य सरकार के रुख को बेहद सख्त कर दिया। जांच रिपोर्ट में यह बात रेखांकित की गई कि वेदांता ने लीज पर मिली इस सरकारी संपत्ति को वित्तीय संस्थानों के पास गिरवी रखकर क्रेडिट फैसिलिटी यानी भारी बैंक लोन हासिल किया था। राज्य सरकार की औद्योगिक भूमि आवंटन नीति के तहत रियायती दरों पर आवंटित जमीनों का उद्देश्य राज्य के भीतर विनिर्माण, उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों को गति देना होता है, न कि उसे वित्तीय लाभ हासिल करने का साधन बनाना।
ओडिशा सरकार के स्थापित दिशा-निर्देशों और सर्कुलर के अनुसार, यदि कोई कंपनी आवंटित औद्योगिक भूमि का उपयोग तीन वर्षों तक लगातार नहीं करती है और वह जमीन निष्क्रिय पड़ी रहती है, तो सरकार को भूमि आवंटन की शर्तों के उल्लंघन के आधार पर उसे बिना किसी मुआवजे के वापस अधिग्रहित करने का पूर्ण वैधानिक अधिकार होता है। आईडीसीओ ने इस संबंध में वेदांता को पहले एक विस्तृत कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice) थमाया था, जिसमें पूछा गया था कि 13 वर्षों तक उत्पादन शुरू न करने के चलते इस आवंटन को क्यों न रद्द कर दिया जाए। कंपनी ने नोटिस का औपचारिक लिखित जवाब दाखिल किया, लेकिन सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने समीक्षा के बाद उस स्पष्टीकरण को पूरी तरह असंतोषजनक, निराधार और नियमों के विपरीत पाया, जिसके तुरंत बाद लीज कैंसिलेशन का अंतिम हथौड़ा चला दिया गया।
वेदांता का आधिकारिक पक्ष: 'लोन का हो चुका है पूरा भुगतान, अस्पताल बनाने की थी योजना'
राज्य सरकार द्वारा लीज रद्द किए जाने के कड़े आदेश के बाद वेदांता समूह ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए आधिकारिक बयान जारी किया है। वेदांता एल्युमिनियम मेटल के एक वरिष्ठ प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी ने भूमि आवंटन के नियमों का कोई जानबूझकर उल्लंघन नहीं किया है। प्रवक्ता ने दावा किया कि इस 28.8 एकड़ जमीन को गिरवी रखकर जो भी क्रेडिट फैसिलिटी अथवा लोन हासिल किया गया था, उसका शत-प्रतिशत भुगतान वित्तीय संस्थानों को काफी समय पहले ही विधिवत कर दिया गया है और वर्तमान में इस जमीन पर किसी भी बैंक का कोई वित्तीय बोझ या बंधक नहीं है।
वेदांता के प्रवक्ता ने आगे यह भी दलील दी कि कंपनी इस बेशकीमती जमीन का उपयोग सार्वजनिक कल्याण और स्थानीय बुनियादी ढांचे के विकास के लिए करना चाहती थी। कंपनी की ओर से तर्क दिया गया कि झारसुगुड़ा और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों के निवासियों तथा श्रमिकों के लाभ के लिए इस जमीन पर एक अत्याधुनिक, व्यापक स्वास्थ्य सेवा केंद्र (सुपर-स्पेशियलिटी हेल्थकेयर फैसिलिटी) और भविष्य की विस्तार परियोजनाओं को स्थापित करने का एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया गया था। कंपनी का कहना है कि इस विषय पर आईडीसीओ के शीर्ष अधिकारियों के साथ सकारात्मक चर्चा और पत्राचार का दौर चल रहा था, ऐसे में अचानक लीज निरस्त करने का निर्णय आश्चर्यजनक है।
आईडीसीओ के नियमों का हंटर: अब तक 267 औद्योगिक भूखंड रद्द, सैकड़ों को नोटिस जारी
ओडिशा सरकार की यह कार्रवाई किसी एक कंपनी विशेष के खिलाफ की गई कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह राज्य भर में औद्योगिक जमीनों को जमाखोरी (Land Hoarding) से मुक्त कराने के एक व्यापक सरकारी अभियान का हिस्सा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, ओडिशा सरकार ने वर्ष 2016 से लेकर अब तक उन निष्क्रिय औद्योगिक इकाइयों को आवंटित किए गए कुल 267 बड़े जमीन के भूखंडों के आवंटन को निरस्त कर उनका कब्जा वापस ले लिया है, जिन्होंने लीज लेने के बाद वर्षों तक कोई उत्पादन शुरू नहीं किया था।
सख्त प्रशासनिक निगरानी का दायरा यहीं खत्म नहीं हुआ है। इस वर्ष मार्च के अंत तक राज्य सरकार और आईडीसीओ ने 398 अन्य ऐसी औद्योगिक इकाइयों और कंपनियों को 'कारण बताओ नोटिस' जारी किए हैं, जो अपनी आवंटित जमीनों का निर्धारित शर्तों के तहत उपयोग करने में विफल साबित हुई हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि राज्य में औद्योगिक भूमि एक सीमित और अत्यंत मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन है। सरकार किसी भी बड़े औद्योगिक घराने को वर्षों तक सरकारी जमीन को खाली रखकर केवल अपनी बैलेंस शीट मजबूत करने की इजाजत नहीं दे सकती। जो इकाइयां वास्तव में कारखाने लगाकर स्थानीय लोगों को नौकरियां देंगी, जमीन उन्हीं को दी जाएगी।
झारसुगुड़ा के स्थानीय समीकरण: उद्योगों का पावरहाउस और जमीन को लेकर संवेदनशीलता
भौगोलिक और आर्थिक दृष्टि से झारसुगुड़ा को ओडिशा की औद्योगिक राजधानी और 'पावरहाउस' के रूप में जाना जाता है। यहां वेदांता के विशालकाय एल्युमिनियम स्मेल्टर, कैप्टिव पावर प्लांट्स के साथ-साथ कई बड़ी इस्पात, सीमेंट और थर्मल ऊर्जा की दिग्गज कंपनियां स्थापित हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में झारसुगुड़ा और पड़ोसी जिलों में औद्योगिक भूमि अधिग्रहण को लेकर स्थानीय किसानों, विस्थापित परिवारों और पर्यावरणविदों के बीच असंतोष गहराया है।
पंचापड़ा गांव के स्थानीय निवासियों का भी लंबे समय से यह कहना रहा है कि जब उद्योग लगाने के नाम पर किसानों की उपजाऊ जमीनें अधिग्रहित की जाती हैं, तो उन्हें रोजगार और बुनियादी विकास का सपना दिखाया जाता है। जब कोई कंपनी 13 साल तक जमीन पर सिर्फ बाउंड्री बनाकर छोड़ देती है, तो इससे न तो किसानों को कोई लाभ मिलता है और न ही राज्य के खजाने को कोई राजस्व प्राप्त होता है। ऐसे में सरकार द्वारा 28.8 एकड़ जमीन वापस लेने के निर्णय का स्थानीय स्तर पर व्यापक स्वागत किया जा रहा है। इसे राज्य सरकार की उस नीति के रूप में देखा जा रहा है जिसमें कॉरपोरेट घरानों की जवाबदेही तय करने का संदेश साफ तौर पर दिया गया है।
कॉरपोरेट जगत में हलचल: क्या अदालत का रुख करेगी वेदांता या समझौते का निकलेगा रास्ता?
अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाले वेदांता ग्रुप के लिए यह झटका ऐसे समय में आया है जब कंपनी भारत में बड़े पैमाने पर अपने कर्ज को घटाने और विभिन्न विनिर्माण इकाइयों के विस्तार के लिए भारी पूंजी जुटाने की प्रक्रिया में जुटी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि 28.8 एकड़ जमीन की लीज रद्द होने के बाद वेदांता के पास दो प्रमुख विकल्प शेष रह जाते हैं। पहला विकल्प यह है कि कंपनी आईडीसीओ के इस प्रशासनिक आदेश को उड़ीसा उच्च न्यायालय (Orissa High Court) में चुनौती दे और यह दलील पेश करे कि हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रस्ताव पर विचार किए बिना एकतरफा लीज रद्द की गई है।
दूसरा विकल्प यह है कि वेदांता प्रबंधन राज्य सरकार के उद्योग विभाग और मुख्यमंत्री स्तर पर औपचारिक वार्ता करे और यह ठोस वचनबद्धता दे कि वह निर्धारित समय-सीमा के भीतर इस जमीन पर स्वास्थ्य केंद्र या औद्योगिक इकाई का निर्माण तत्काल पूरा कर देगी। कानूनी जानकारों का मानना है कि चूंकि सरकारी शर्तों में 3 साल तक जमीन खाली रखने पर लीज रद्द करने का स्पष्ट प्रावधान है, इसलिए अदालत में सरकार का पक्ष काफी मजबूत रहेगा। यह पूरा घटनाक्रम देश भर के तमाम राज्यों और बड़े औद्योगिक घरानों के लिए एक कड़ा संदेश है कि अब रियायती औद्योगिक भूमि पर दशकों तक कब्जा जमाए रखने के दिन लद चुके हैं।