Drishyam 3 Review: क्या विजय सलगांवकर फिर चकमा दे पाए पुलिस को?

Drishyam 3 Review: क्या विजय सलगांवकर फिर चकमा दे पाए पुलिस को?

भारतीय सिनेमा की सबसे सफल और लोकप्रिय सस्पेंस-क्राइम फ्रेंचाइजी 'दृश्यम' अपने तीसरे और निर्णायक अध्याय के साथ बड़े पर्दे पर लौट आई है। 2 और 3 अक्टूबर की चर्चित तारीखें, पोंडा का वो शांत इलाका और अपने परिवार की ढाल बनकर हर चक्रव्यूह को भेदने वाला सीधा-साधा केबल ऑपरेटर विजय सलगांवकर—यह किरदार भारतीय दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए रच-बस चुका है। 'दृश्यम' (2015) और 'दृश्यम 2' (2022) की ऐतिहासिक कामयाबी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या 'दृश्यम 3' उस कल्ट सस्पेंस और इंटेलीजेंट स्क्रीनप्ले के स्तर को छू पाएगी? क्या विजय सलगांवकर एक बार फिर कानून की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब रहे या इस बार पुलिस का शिकंजा भारी पड़ा? आइए पढ़ते हैं इस अंतिम मुकाबले का पूरा और निष्पक्ष रिव्यू।

कहानी का नया मोड़: पुराने राज़, नई जांच और आर-पार की लड़ाई

फिल्म की कहानी वहीं से आगे बढ़ती है जहां 'दृश्यम 2' का सस्पेंस खत्म हुआ था। सलगांवकर परिवार अब भी उस खौफनाक अतीत के साए में जी रहा है, लेकिन सतह पर जिंदगी सामान्य दिखने की कोशिश कर रही है। हालांकि, सैम के गायब होने का केस कभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ। इस बार पुलिस महकमे में एक नया, बेहद शातिर और अडिग शीर्ष अधिकारी मामले की कमान संभालता है, जो किसी भी तकनीकी सबूत या बयानों पर भरोसा करने के बजाय मनोवैज्ञानिक दबाव और सलगांवकर परिवार की आंतरिक कमजोरियों पर वार करने की रणनीति बनाता है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, विजय को समझ आ जाता है कि यह लड़ाई अब सिर्फ सबूत मिटाने की नहीं बल्कि अपने पूरे अस्तित्व को बचाने की है। क्लाइमेक्स की ओर बढ़ते-बढ़ते कहानी में ऐसे कई अप्रत्याशित मोड़ आते हैं जो दर्शकों को अपनी कुर्सी से हिलने नहीं देते।

क्या 'दृश्यम 3' अपने पिछले दोनों भागों से ज्यादा दमदार है?

अगर तुलना 'दृश्यम 2' से की जाए, तो 'दृश्यम 3' का पेस थोड़ा अलग मिजाज का है। जहां दूसरे भाग में कोर्टरूम ड्रामा और पुलिसिया जाल बिछाने की प्रक्रिया बहुत तेज थी, वहीं इस भाग में डायरेक्टर ने किरदारों के आंतरिक डर, अपराधबोध और मानसिक संघर्ष को ज्यादा गहराई से उभारा है। फिल्म का पहला हाफ कहानी की नई बुनियाद रखने और किरदारों के तनाव को स्थापित करने में थोड़ा वक्त लेता है, लेकिन इंटरवल के ठीक पहले जो झटका मिलता है, वह दूसरे हाफ के लिए रोमांच को सातवें आसमान पर पहुंचा देता है। फिल्म का आखिरी 40 मिनट इतना कसा हुआ, बुद्धिमानी से लिखा गया और अप्रत्याशित है कि यह 'दृश्यम 2' के इम्पैक्ट को न सिर्फ बराबरी की टक्कर देता है, बल्कि कई मायनों में भावनात्मक स्तर पर उससे भी आगे निकल जाता है। इसे किसी भी रूप में 'बकवास' या कमजोर नहीं कहा जा सकता; यह फ्रेंचाइजी का एक बेहद सम्मानजनक और दिमाग हिला देने वाला अंत है।

अजय देवगन और पूरी स्टार कास्ट की बेजोड़ अदाकारी

अजय देवगन एक बार फिर साबित करते हैं कि विजय सलगांवकर का किरदार उनके अलावा कोई और नहीं निभा सकता। उनकी आंखों में दिखने वाला गहरा सन्नाटा, परिवार के प्रति अटूट सुरक्षा भाव और बिना कुछ बोले चेहरे के भावों से खेल जाने की कला अद्भुत है। वे हर सीन में पूरी तरह सहज और प्रभावशाली नजर आते हैं। श्रिया सरन ने एक ऐसी मां और पत्नी का दर्द और बेचैनी बखूबी बयां की है जो सालों से एक ही डर के साए में घुट रही है। तब्बू का स्क्रीन प्रेजेंस हमेशा की तरह रोंगटे खड़े करने वाला है; बेटे को खोने वाली मां का दर्द और बदले की आग उनके हर डायलॉग में साफ महसूस होती है। नए जांच अधिकारी के रूप में शामिल हुए कलाकार ने अजय देवगन के सामने एक मजबूत विरोधी की भूमिका में जान फूंक दी है।

निर्देशन, स्क्रीनप्ले और तकनीकी पहलुओं की मजबूती

फिल्म का निर्देशन बेहद सधा हुआ है और किसी भी गैर-जरूरी ड्रामे या मेलोड्रामा से बचता है। बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की जान है, जो शांत दृश्यों में भी तनाव की एक अंतर्धारा बनाए रखता है। सिनेमैटोग्राफी गोवा के उस खूबसूरत लेकिन रहस्यमयी माहौल को जीवंत करती है जहां हर मोड़ पर एक राज़ दफन है। एडिटिंग बेहद शार्प है, हालांकि शुरुआत के कुछ दृश्यों को थोड़ा और चुस्त किया जा सकता था, लेकिन जैसे ही जांच की रफ्तार बढ़ती है, स्क्रीनप्ले पूरी तरह अपनी पकड़ मजबूत कर लेता है।

वर्डिक्ट: क्या आपको सिनेमाघरों में देखनी चाहिए यह फिल्म?

यदि आप सस्पेंस, मिस्ट्री और दिमाग की कसरत कराने वाले सिनेमा के शौकीन हैं, तो 'दृश्यम 3' आपके लिए एक मस्ट-वॉच अनुभव है। यह सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं, बल्कि एक आम इंसान और पूरे सिस्टम के बीच की शतरंज की बिसात है जहां हर चाल पहले से सोची गई है। यह फिल्म उम्मीदों पर पूरी तरह खरी उतरती है और फ्रेंचाइजी को एक ऐसा क्लाइमेक्स देती है जो दर्शकों के दिमाग में लंबे समय तक गूंजता रहेगा।