'लड़कों को अपनी सेक्सुअलिटी पर खुलकर बात करने दें', बच्चों की परवरिश पर दीया मिर्जा ने दिया दो टूक और साहसिक बयान
बॉलीवुड अभिनेत्री, सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण प्रेमी दीया मिर्जा अपनी संजीदगी, शालीनता और सामाजिक मुद्दों पर बेबाक राय रखने के लिए हमेशा से पहचानी जाती हैं। एक मां के तौर पर वह अक्सर बच्चों के बेहतर मानसिक विकास, स्वस्थ पारिवारिक माहौल और समाज में बराबरी की भावना को बढ़ावा देने के लिए अपनी आवाज उठाती रहती हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान दीया मिर्जा ने आधुनिक पैरेंटिंग और खासकर लड़कों की परवरिश से जुड़े बेहद संवेदनशील विषय पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने बिना किसी झिझक के माता-पिता से आग्रह किया कि वे अपने बेटों को अपनी सेक्सुअलिटी, भावनाओं और पहचान पर खुलकर बात करने का सुरक्षित माहौल दें ताकि वे एक संवेदनशील और मानसिक रूप से मजबूत इंसान बन सकें।
बंद दरवाजों और पुरानी मान्यताओं को तोड़कर संवाद स्थापित करने की जरूरत
दीया मिर्जा ने इस बात पर खास जोर दिया कि हमारे पारंपरिक समाज में लड़कों की परवरिश अक्सर एक तय खांचे में की जाती है, जहां उन्हें दर्द छुपाना, अपनी कमजोरियों पर पर्दा डालना और भावनाओं को दबाना सिखाया जाता है। अभिनेत्री का मानना है कि इस तरह का रूढ़िवादी रवैया लड़कों के मानसिक और भावनात्मक विकास को बुरी तरह नुकसान पहुंचाता है। जब बच्चे बड़े हो रहे होते हैं, तो उनके शरीर, मन और सेक्सुअलिटी को लेकर कई तरह के स्वाभाविक सवाल उठते हैं। अगर घर में इन विषयों पर बात करना पाप या शर्मनाक माना जाएगा, तो बच्चे सही मार्गदर्शन पाने के बजाय गलत स्रोतों से भ्रमित जानकारी जुटाने लगते हैं। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बेटों के साथ ऐसा खुलापन रखें जहां कोई झिझक या डर न हो।
'लड़कों को भी संवेदनशील होना सिखाना आज के दौर की सबसे बड़ी जरूरत'
अभिनेत्री ने पैरेंटिंग पर बात करते हुए स्पष्ट किया कि एक बेहतर और सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए लड़कों को केवल आर्थिक या शारीरिक रूप से मजबूत बनाना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें भावनात्मक रूप से परिपक्व बनाना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जब लड़के अपनी सेक्सुअलिटी, शारीरिक बदलावों और आकर्षण की भावनाओं को सामान्य और सहज तरीके से स्वीकार करना सीखेंगे, तभी वे महिलाओं और अन्य लोगों की सीमाओं तथा सहमति (Consent) का सम्मान करना सीख पाएंगे। समाज में विषाक्त पुरुषत्व (Toxic Masculinity) को खत्म करने का पहला कदम घर से ही शुरू होता है, जहां बेटों को रोने, अपनी भावनाएं व्यक्त करने और बिना किसी झिझक के अपनी बात रखने की पूरी आजादी मिले।
सेक्सुअलिटी पर चुप्पी साधने से बच्चों पर पड़ता है गहरा मानसिक असर
दीया मिर्जा का मानना है कि किशोरावस्था एक ऐसा नाजुक दौर होता है जब हार्मोन्स के बदलाव और आंतरिक पहचान को लेकर बच्चे कई तरह की उलझनों से गुजरते हैं। अगर उस समय माता-पिता उनके दोस्त बनकर बात नहीं करेंगे, तो बच्चे अकेलेपन, तनाव और पहचान के संकट का शिकार हो सकते हैं। उन्होंने पैरेंट्स को यह दो टूक सलाह दी कि वे अपने बच्चों को जज करने के बजाय उनकी बात ध्यान से सुनें। चाहे बात जेंडर आइडेंटिटी की हो, पर्सनल स्पेस की हो या सेक्शुअल हेल्थ की, घर के भीतर का संवाद इतना सहज होना चाहिए कि बच्चे किसी भी मुद्दे पर अपने माता-पिता के पास जाने से कतराएं नहीं।
सोशल मीडिया और पैरेंटिंग कम्युनिटी में दीया के बयान की जबरदस्त सराहना
दीया मिर्जा के इस प्रगतिशील बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इसकी जमकर तारीफ हो रही है। खासकर नई पीढ़ी के माता-पिता, चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट और काउंसलर्स ने उनके इस दृष्टिकोण को आज के दौर की सबसे बड़ी जरूरत करार दिया है। लोगों का कहना है कि जब सेलिब्रिटीज इस तरह के वर्जित (Taboo) माने जाने वाले विषयों पर खुलकर चर्चा करते हैं, तो आम घरों में भी इन अहम मुद्दों पर बातचीत का रास्ता आसान होता है। दीया का यह संदेश न केवल लड़कों के स्वस्थ विकास के लिए बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए एक अधिक समावेशी और सुरक्षित समाज गढ़ने की दिशा में एक सशक्त कदम है।