मुशायरों के बेताज बादशाह खुमार बाराबंकवी ने क्यों छोड़ा था बॉलीवुड
उत्तर प्रदेश की अदबी और तहजीबी सरजमीं बाराबंकी जिले के ऐतिहासिक कस्बे रुदौली ने उर्दू साहित्य को कई नायाब हीरे दिए हैं, जिनमें सबसे चमकदार नाम मोहम्मद हैदर खान यानी खुमार बाराबंकवी का है। 15 सितंबर 1919 को जन्मे खुमार बाराबंकवी के खून में ही शेरो-शायरी की रवानगी बसी हुई थी। उनके वालिद, चचा और भाई सभी शायरी के गहरे कद्रदान और उम्दा रचनाकार थे। ऐसे अदबी घराने में आंखें खोलने वाले बालक के भीतर कम उम्र में ही लफ्जों से खेलने और इंसानी एहसासों को बहर में ढालने की अद्भुत महारत विकसित होने लगी थी।
खुमार की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई के दौरान एक ऐसा दौर आया जिसने उनके पूरे जीवन की दिशा ही बदल दी। लखनऊ में तालीम हासिल करने के दौरान एक भावुक और रोमांटिक मोड़ ने उन्हें कॉलेज की किताबों से दूर कर दिया। दिल की गहराइयों में लगी इसी चोट ने उनके भीतर के शायर को जगाया और वह पूरी तरह से गजलों की दुनिया में रम गए। अपने निजी दर्द, विरह और मोहब्बत की नाकामी को उन्होंने अपनी शास्त्रीय गजलों का मुख्य मौजूं बना लिया। मुशायरों के मंच पर जब वे अपनी मखमली और पुरकशिश आवाज में तरन्नुम के साथ कलाम पेश करते थे, तो महफिल में मौजूद हर शख्स उनके सम्मोहन में बंध जाता था।
मुंबई का ऐतिहासिक मुशायरा और केएल सहगल के साथ कल्ट गीतों का कालजयी सफर
साल 1945 में खुमार बाराबंकवी एक बड़े मुशायरे में शिरकत करने के लिए पहली बार देश की आर्थिक और सिने राजधानी मुंबई पहुंचे। मंच पर जब खुमार ने अपना कलाम पढ़ा, तो वहां मौजूद जाने-माने फिल्मकार और निर्देशक ए.आर. कारदार उनके अंदाज-ए-बयां के कायल हो गए। कारदार साहब उस वक्त अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म 'शाहजहां' की तैयारियों में जुटे थे। उन्होंने मुशायरा खत्म होते ही खुमार बाराबंकवी को अपनी फिल्म के लिए नगमे लिखने का न्योता दे दिया। एक मुशायरे से शुरू हुआ यह सफर सीधे हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर के मुख्य पन्नों पर दर्ज होने जा रहा था।
फिल्म 'शाहजहां' (1946) के लिए खुमार बाराबंकवी ने संगीतकार नौशाद के सुरों पर वह गीत लिखा जिसने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया। महान गायक कुंदन लाल सहगल (केएल सहगल) की सदाबहार आवाज में सजा गीत 'चाह बर्बाद करेगी हमें मालूम न था' रिलीज होते ही पूरे देश में गूंज उठा। इसके साथ ही उन्होंने 'ऐ दिल-ए-बेकरार झूम' जैसा कालजयी नगमा भी लिखा। केएल सहगल के इन दोनों गीतों ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड बनाए और खुमार बाराबंकवी रातों-रात हिंदी सिनेमा के चहेते और सफल गीतकारों की पहली कतार में शामिल हो गए।
'साज और आवाज' से लेकर 'लव एंड गॉड' तक: फिल्मी कैनवास पर शास्त्रीय शायरी का जादू
'शाहजहां' की ऐतिहासिक कामयाबी के बाद खुमार बाराबंकवी ने बॉलीवुड की कई क्लासिक फिल्मों के लिए अपनी कलम का जादू बिखेरा। उन्होंने 'साज और आवाज', 'रुखसाना', 'हलचल', 'मेहंदी' और के. आसिफ की भव्य कृति 'लव एंड गॉड' जैसी फिल्मों में यादगार गीत दिए। खुमार साहब की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने कभी भी फिल्मी धुनों के आगे शायरी के स्तर और भाषा की शुद्धता से समझौता नहीं किया। उनकी लिखी हर लाइन में गजल की शास्त्रीय परंपरा और जीवन का गहरा फलसफा साफ झलकता था।
फिल्म 'लव एंड गॉड' का निर्माण कई वर्षों तक चला और साल 1986 में इसका प्रदर्शन हुआ। यह फिल्म खुमार बाराबंकवी के फिल्मी सफर की आखिरी औपचारिक कड़ी साबित हुई। इस फिल्म के बाद उन्होंने हिंदी सिनेमा के लिए व्यावसायिक गीत लिखना पूरी तरह बंद कर दिया। हालांकि, उन्होंने जब भी लिखा, वह सीधे सुनने वालों के दिलों में उतर गया। उनके लिखे शे'र आज भी संगीत प्रेमियों और साहित्य के पारखियों के लबों पर उसी ताजगी के साथ जिंदा हैं।
मुशायरों की आजादी बनाम सिनेमाई पाबंदियां: क्यों खुमार साहब ने किया बॉलीवुड से किनारा?
सिनेमा जगत में असीम शोहरत, सम्मान और दौलत मिलने के बावजूद खुमार बाराबंकवी का दिल हमेशा आजाद शायरी और मुशायरों के मंच के लिए धड़कता रहा। फिल्मी दुनिया में निर्देशकों, निर्माताओं और धुनों की तकनीकी बंदिशों में बंधकर लिखना उनके स्वतंत्र मिजाज को कभी पूरी तरह रास नहीं आया। वे अक्सर महसूस करते थे कि मुशायरे में सीधे अपने सुनने वालों की दाद पाना और अपने मनमुताबिक शेर कहना उस बनावटी चकाचौंध से कहीं अधिक सुकूनदेह है।
यही वजह रही कि शोहरत के शिखर पर होने के बावजूद उन्होंने बॉलीवुड से धीरे-धीरे दूरी बना ली और खुद को पूरी तरह गजल की दुनिया और अंतरराष्ट्रीय मुशायरों के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मंचों पर भारत की तहजीब का परचम लहराया। खुमार बाराबंकवी का यह फैसला साबित करता है कि वे सिर्फ एक गीतकार नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर जीने वाले उर्दू शायरी के सच्चे फकीर और शहंशाह थे।