'अभिजीत दीपके को अमेरिका और आशुतोष रांका को पाकिस्तान से मिल रही फंडिंग': केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह का बड़ा दावा
नई दिल्ली: देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव प्रक्रिया को लेकर चल रहे विवाद के बीच केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री ने आंदोलनकारियों और एक्टिविस्ट्स की फंडिंग को लेकर बेहद गंभीर और चौंकाने वाला दावा किया है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आरोप लगाया है कि देश में सरकार विरोधी माहौल बनाने और फर्जी नैरेटिव गढ़ने के लिए विदेशी ताकतों द्वारा पैसा मुहैया कराया जा रहा है। केंद्रीय मंत्री ने खुलकर नाम लेते हुए दावा किया कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके को अमेरिका स्थित डोनर्स से और सह-संस्थापक आशुतोष रांका को पाकिस्तान से आर्थिक मदद मिल रही है।
केंद्रीय मंत्री ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के कड़े नियमों का बचाव करते हुए कहा कि जो लोग खुद को जनआंदोलन का चेहरा बताते हैं, उन्हें अपने अभियानों और खर्चों के लिए आने वाले फंड के स्रोतों को जनता के सामने सार्वजनिक करना चाहिए।
1. केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह के आरोपों के प्रमुख बिंदु
संवाददाताओं से बातचीत करते हुए केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने आरोप लगाया कि विदेशी वित्तपोषित गैर-सरकारी संगठन (NGOs), 'डीप स्टेट' से जुड़े तत्व और भारत-विरोधी ताकतें मिलकर देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की साजिश रच रही हैं:
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अमेरिका और पाकिस्तान से फंडिंग का दावा: मंत्री ने कहा, "दीपके को अमेरिका स्थित डोनर्स से, जबकि रांका को पाकिस्तान के नेताओं और अन्य लोगों से वित्तीय मदद मिली है। इस बात के इनपुट हैं कि देश में सरकार विरोधी एजेंडा चलाने और जनता के बीच गलत नैरेटिव फैलाने के लिए इस विदेशी पैसे का इस्तेमाल किया जा रहा है।"
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ऑपरेशन सिंदूर और विदेशी लिंक: उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एसआईआर विरोधी अभियान से जुड़े कुछ लोगों को पहले भी सीमा पार से फंडिंग मिलने के संकेत रहे हैं।
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स्वयंघोषित नेताओं की जांच की मांग: जितेंद्र सिंह ने कहा कि जो लोग सड़कों पर उतरकर देश की चुनाव प्रक्रिया और चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं, उनकी विश्वसनीयता और वित्तीय संसाधनों की गहन जांच होनी चाहिए।
2. FCRA कानून का किया पुरजोर बचाव
केंद्रीय मंत्री ने विदेशी फंडिंग पर लगाम लगाने वाले एफसीआरए (FCRA) नियमों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार ने विदेशी पैसे के दुरुपयोग को रोकने के लिए ही यह पारदर्शी व्यवस्था बनाई है।
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उन्होंने कहा कि कई संस्थाएं और व्यक्ति विदेशों में रहने वाले लोगों के जरिए अवैध तरीकों से पैसा जुटाते हैं।
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जो लोग राजनीतिक जमीन खो चुके हैं या चुनावी मैदान में जीत हासिल नहीं कर पा रहे हैं, वे देश के बाहर बैठे आकाओं के इशारे पर सड़कों पर अराजकता पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं।
3. मतदाता सूची (SIR) पर लगे आरोपों को बताया निराधार
विपक्षी दलों और एक्टिविस्ट्स द्वारा मतदाता सूची से करोड़ों नाम हटाए जाने के आरोपों पर केंद्रीय मंत्री ने विस्तार से सफाई दी:
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उन्होंने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए गए पुनरीक्षण अभियान में नियमों के तहत ही नाम हटाए गए हैं, जिसमें बड़ी संख्या में वे लोग शामिल हैं जिनका देहांत हो चुका है, जो दूसरे राज्यों या पते पर स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके हैं, या जिनकी दोहरी प्रविष्टियां (डबल वोट) थीं।
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उन्होंने कहा कि इसे 'वोट चोरी' का रूप देकर एक सोची-समझी साजिश के तहत पेश किया जा रहा है ताकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को धूमिल किया जा सके।
4. बीजेपी प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने भी साधा था निशाना
केंद्रीय मंत्री के बयान से पहले भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने भी नागपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इसी मुद्दे को उठाया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के आरोपी एक्टिविस्ट्स के तार सीमा पार और विदेशी नेटवर्क से जुड़े हैं, जिसकी विस्तृत जांच जांच एजेंसियों द्वारा की जानी चाहिए।
5. आरोपों पर एक्टिविस्ट्स का पलटवार और तंज
विदेशी फंडिंग के इन गंभीर आरोपों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं:
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सीजेपी के सह-संयोजक सौरव दास ने तंज कसते हुए लिखा, "थैंक्स जितेंद्र भाई, मुझे भूलने के लिए!" उन्होंने कहा कि सरकार अपनी नाकामियों और जनता के सवालों से ध्यान भटकाने के लिए अक्सर विदेशी साजिश और पाकिस्तान का एंगल ले आती है।
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वहीं, अभिजीत दीपके ने पहले भी अपनी फंडिंग को लेकर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि उनकी पढ़ाई और काम छात्रवृत्ति व शिक्षा ऋण के जरिए हुए हैं और किसी भी अवैध विदेशी फंडिंग के आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं।
केंद्रीय मंत्री के इन बयानों के बाद राजधानी दिल्ली से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि अब यह मामला केवल मतदाता सूची के तकनीकी विवाद तक सीमित न रहकर सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों के दायरे में आ गया है।