तमिलनाडु को कावेरी का पानी दिलाने कर्नाटक जाएंगे सीएम जोसेफ विजय? मेकेदातू डैम विवाद पर चौतरफा घिरे थलपति विजय, डीएमके ने किया विरोध प्रदर्शन का ऐलान
दक्षिण भारतीय सिनेमा के महानायक से लेकर तमिलनाडु की सत्ता के सिंहासन तक का सफर तय करने वाले मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (थलपति विजय) इन दिनों अपने एक कूटनीतिक फैसले को लेकर चौतरफा राजनीतिक घेराबंदी का शिकार होते नजर आ रहे हैं। भारत के दो अहम दक्षिणी राज्यों—तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच दशकों पुराने और बेहद संवेदनशील कावेरी जल विवाद ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है, और इसकी मुख्य वजह मुख्यमंत्री विजय का वह हालिया कदम है जिसमें वह इस विवाद को सुलझाने के लिए सीधे कूटनीतिक रास्तों का रुख कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोर पकड़ रही है कि दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से विवादित चली आ रही 'मेकेदातू बांध परियोजना' (Mekedatu Dam Project) के मसले पर आम सहमति बनाने के लिए सीएम विजय जल्द ही बेंगलुरु का दौरा कर सकते हैं और वहां के नेतृत्व से सीधी बातचीत कर सकते हैं। हालांकि, इस संभावित द्विपक्षीय मुलाकात की खबर सामने आते ही राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके (DMK) और अन्य राजनीतिक दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिससे थलपति विजय की सरकार के लिए यह पहला बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक इम्तिहान बनता जा रहा है।
कावेरी जल विवाद और मेकेदातू बांध पर क्यों मचा है सियासी घमासान?
भारत के दक्षिणी राज्यों में कावेरी नदी के पानी का बंटवारा हमेशा से एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा रहा है, जिस पर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच सियासत उबाल पर रहती है। तमिलनाडु के किसान अपनी कृषि आवश्यकताओं और पेयजल के लिए कावेरी के पानी पर निर्भर हैं, और सुप्रीम कोर्ट तथा जल विवाद न्यायाधिकरण (Tribunal) के स्पष्ट आदेशों के बावजूद तमिलनाडु का आरोप रहा है कि कर्नाटक उसके हिस्से का पूरा पानी नहीं छोड़ता है। इस बीच, कर्नाटक सरकार द्वारा कावेरी बेसिन में 'मेकेदातू बांध' के निर्माण की योजना को आगे बढ़ाने के प्रयासों ने तमिलनाडु की राजनीति में भूचाल ला दिया है। तमिलनाडु के सभी राजनीतिक दलों का यह मानना रहा है कि मेकेदातू परियोजना के बन जाने से कावेरी नदी के डेल्टा क्षेत्रों में पानी का प्राकृतिक प्रवाह गंभीर रूप से बाधित हो जाएगा, जिससे राज्य के लाखों किसानों की आजीविका तबाह हो सकती है। ऐसे संवेदनशील और ज्वलनशील मुद्दे पर जब मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने कर्नाटक के साथ आमने-सामने बैठकर द्विपक्षीय बातचीत करने का मन बनाया, तो इसे लेकर तमिलनाडु के राजनीतिक गलियारों में विरोध के स्वर तुरंत तेज हो गए।
एमके स्टालिन और विपक्ष का तीखा हमला, 3 अगस्त को डीएमके के बड़े प्रदर्शन का ऐलान
मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के इस संभावित कर्नाटक दौरे और द्विपक्षीय वार्ताओं की रणनीति पर सबसे कड़ा प्रहार तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने किया है। स्टालिन ने सीएम विजय की इस पहल पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि जब कर्नाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ाते हुए तमिलनाडु के हिस्से का पानी देने से इनकार कर रही है और जिद पर अड़ी हुई है, ऐसे समय में द्विपक्षीय वार्ताओं का कोई औचित्य ही नहीं बचता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की सीधी बैठकों से अंततः तमिलनाडु का कानूनी पक्ष कमजोर होगा और सुप्रीम कोर्ट में चल रही लड़ाइयों में राज्य की स्थिति प्रभावित होगी। डीएमके ने इस विरोध को और आक्रामक बनाते हुए ऐलान किया है कि मुख्यमंत्री के इस कथित कदम के विरोध में आगामी 3 अगस्त को तंजावुर में एक विशाल राज्य-स्तरीय विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा, जिसकी कमान खुद तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता और युवा नेता उदयनिधि स्टालिन संभालेंगे। इसके अलावा, राज्य के तमाम प्रमुख किसान संगठनों और क्षेत्रीय दलों ने भी इस द्विपक्षीय बातचीत का पुरजोर विरोध किया है, जिससे टीवीके (TVK) सरकार पर भारी दबाव बन गया है।
सरकार पर बढ़ा चौतरफा दबाव, कानून मंत्री की सफाई और कानूनी विकल्प तलाशने के संकेत
विपक्ष के इस आक्रामक तेवर और किसानों के तीखे विरोध के चलते चौतरफा घिरने के बाद थलपति विजय की सरकार अब बैकफुट पर नजर आ रही है और डैमेज कंट्रोल में जुट गई है। विवाद को तूल पकड़ता देख तमिलनाडु के कानून मंत्री आर. निर्मल कुमार ने मीडिया के सामने आकर स्पष्टीकरण दिया है और यह साफ किया है कि मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के कर्नाटक दौरे या द्विपक्षीय बैठक को लेकर अभी तक कोई भी अंतिम आधिकारिक निर्णय नहीं लिया गया है। सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों ने यह भी संकेत दिए हैं कि यदि कर्नाटक सरकार सहयोग नहीं करती है, तो तमिलनाडु अपनी जनता और किसानों के हक के पानी की रक्षा के लिए बिना किसी समझौते के सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना जारी रखेगा। इस बीच, मुख्यमंत्री जोसेफ विजय लगातार अपने मंत्रिमंडल के वरिष्ठ मंत्रियों, कानूनी विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मैराथन बैठकें कर रहे हैं ताकि बिना राज्य के हितों से समझौता किए इस जटिल समस्या का कोई ठोस और व्यावहारिक रास्ता निकाला जा सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता की बागडोर संभालने के बाद से यह मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा और कड़ा कूटनीतिक इम्तिहान है, क्योंकि एक तरफ जहां उन्हें अपनी प्रशासनिक क्षमताओं का लोहा मनवाना है, वहीं दूसरी तरफ राज्य के जल अधिकारों की रक्षा पर भी कोई आंच नहीं आने देनी है।