ब्राजील राष्ट्रपति चुनाव में लूला दा सिल्वा की ऐतिहासिक वापसी और नतीजों पर सियासी संग्राम

ब्राजील राष्ट्रपति चुनाव में लूला दा सिल्वा की ऐतिहासिक वापसी और नतीजों पर सियासी संग्राम

लैटिन अमेरिका के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश ब्राजील में सत्ता की जंग अब एक गहरे कानूनी और राजनीतिक संकट में बदल गई है। देश के 80 वर्षीय वामपंथी नेता और मौजूदा राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने बेहद कड़े और सांसें रोक देने वाले मुकाबले में दोबारा राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत लिया है। लूला की इस अप्रत्याशित जीत ने लैटिन अमेरिका में पिछले डेढ़ साल से चल रही दक्षिणपंथी ताकतों की विजय यात्रा पर अचानक विराम लगा दिया है। हालांकि चुनावी परिणाम आधिकारिक तौर पर घोषित होते ही राजधानी ब्रासीलिया से लेकर साओ पाउलो तक जश्न के साथ-साथ तनाव का माहौल बन गया है। पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे और दक्षिणपंथी सीनेटर फ्लावियो बोल्सोनारो ने चुनाव आयोग के आंकड़ों को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली का आरोप लगाते हुए पूरे चुनाव को रद्द कराने की मांग उठा दी है।

चुनावी आंकड़ों के मुताबिक 99.9 प्रतिशत मतों की गिनती पूरी होने के बाद लूला दा सिल्वा को कुल 51.8 प्रतिशत वोट हासिल हुए हैं, जबकि उनके धुर प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो को 48.2 प्रतिशत मतों से संतोष करना पड़ा। लूला ने यह मुकाबला 3.6 प्रतिशत वोटों के अंतर से अपने नाम किया, जो चार साल पहले हुए पिछले राष्ट्रपति चुनाव के मार्जिन की तुलना में काफी अधिक है। अधिकांश चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और एग्जिट पोल्स में दोनों उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर या दक्षिणपंथी खेमे के आगे रहने की भविष्यवाणी की गई थी, लेकिन लूला ने सभी अनुमानों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि पहले चरण के मतदान में दूसरे नंबर पर पिछड़ने के बावजूद लूला ने रन-ऑफ राउंड में ऐतिहासिक बढ़त हासिल की। ब्राजील के चुनावी इतिहास में यह पहला अवसर है जब किसी उम्मीदवार ने पहले दौर में पिछड़ने के बाद दूसरे दौर में जीत दर्ज कर राष्ट्रपति की कुर्सी हासिल की हो।

फ्लावियो बोल्सोनारो का धांधली का आरोप और मतदान का समय बढ़ाने पर उठा विवाद

चुनावी नतीजों के सामने आते ही पराजित उम्मीदवार फ्लावियो बोल्सोनारो ने एक आपातकालीन संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया। बेहद तल्ख तेवर अपनाते हुए उन्होंने ऐलान किया कि वे इस प्रक्रिया को किसी भी सूरत में वैध नहीं मानते। उन्होंने सवाल किया कि ब्राजील की जनता ऐसी चुनावी धांधली को बिना जांच के क्यों स्वीकार करे। बोल्सोनारो ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर अंगुली उठाते हुए एक न्यायाधीश द्वारा मतदान के अंतिम क्षणों में दिए गए उस विशेष आदेश को निशाने पर लिया, जिसके तहत कई मतदान केंद्रों पर वोटिंग का समय दो घंटे अतिरिक्त बढ़ा दिया गया था। बोल्सोनारो ने कहा कि जब मुकाबला चल रहा था, तब खेल के बीच में ही नियम बदल दिए गए, जिससे चुनावी संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया।

हालांकि इस पूरे मामले की पड़ताल से एक विरोधाभासी तथ्य भी सामने आया है। दरअसल मतदान के दिन ब्राजील के कई हिस्सों में अचानक खराब मौसम, भारी बारिश और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के बाधित होने के कारण दूरदराज के लाखों नागरिक समय पर बूथों तक नहीं पहुंच पाए थे। उस समय स्थिति को देखते हुए केवल वामपंथी खेमे ने ही नहीं, बल्कि खुद फ्लावियो बोल्सोनारो के चुनावी रणनीतिकारों ने भी चुनाव आयोग और न्यायिक प्राधिकरण से मतदान केंद्रों को अतिरिक्त समय तक खुला रखने की औपचारिक अपील की थी। दोनों पक्षों के अनुरोध पर ही अदालत ने दो घंटे का अतिरिक्त समय प्रदान किया था। अब उसी न्यायिक फैसले को आधार बनाकर बोल्सोनारो द्वारा पूरी चुनाव प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा करना उनके हताशा भरे राजनीतिक पैंतरे के तौर पर देखा जा रहा है।

साओ पाउलो में लूला का संबोधन: 'लोकतंत्र के पक्ष में ब्राजील की जनता का स्पष्ट जनादेश'

दूसरी तरफ अपनी जीत सुनिश्चित होने के बाद साओ पाउलो में आयोजित एक विशाल जनसभा में लूला दा सिल्वा ने समर्थकों का आभार व्यक्त किया। भावुक स्वर में लूला ने कहा कि वे ब्राजील की जनता के सदैव ऋणी रहेंगे, जिन्होंने उनके लंबे राजनीतिक जीवन में लगातार उनके प्रति उदारता और विश्वास प्रदर्शित किया है। 80 वर्ष की उम्र में एक बार फिर देश की कमान संभालने जा रहे लूला ने अपने इस पूरे चुनावी अभियान को केवल एक सामान्य राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि ब्राजील के लोकतंत्र को तानाशाही ताकतों से बचाने का जनादेश बताया। उन्होंने कहा कि बोल्सोनारो परिवार की सत्ता में वापसी को रोकना ही देश की संवैधानिक संस्थाओं, प्रेस की स्वतंत्रता और आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा का एकमात्र विकल्प था।

लूला के इस बयान के पीछे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गहरे तार भी जुड़े हुए हैं। पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो पर चार साल पहले राष्ट्रपति चुनाव हारने के बाद देश में हिंसक तख्तापलट की साजिश रचने के गंभीर आरोप सिद्ध हो चुके हैं। उस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुलकर बोल्सोनारो के बचाव में उतरे थे और ब्राजील पर टैरिफ व प्रतिबंध लगाने की चेतावनियां तक दी थीं। लूला का ट्रंप प्रशासन के साथ लगातार तीखा वैचारिक टकराव रहा है। लूला ने हमेशा यह आरोप लगाया कि विदेशी ताकतें ब्राजील की संप्रभुता को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं। अपनी इस जीत के साथ लूला ने स्पष्ट कर दिया है कि ब्राजील की विदेश नीति किसी वैश्विक शक्ति के दबाव में नहीं झुकेगी।

लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथ का विजय रथ थमा, सुप्रीम कोर्ट की नियुक्तियों से तय होगी देश की दिशा

लूला दा सिल्वा की इस जीत ने क्षेत्रीय भू-राजनीति में भी एक भारी बदलाव का संकेत दिया है। पिछले 18 महीनों के दौरान लैटिन अमेरिका के विभिन्न देशों में लगातार सात बार दक्षिणपंथी नेताओं ने सत्ता पर कब्जा जमाया था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि समूचा महाद्वीप वामपंथ से पूरी तरह विमुख हो चुका है। परंतु ब्राजील जैसे विशालकाय देश में लूला की जीत ने यह साबित कर दिया है कि लैटिन अमेरिका में मजदूर वर्ग, ग्रामीण जनता और पर्यावरणविदों के बीच वामपंथी विचारधारा की जड़ें अब भी काफी मजबूत हैं। इस चुनाव में संगठित अपराध और ड्रग कार्टेल्स से निपटने, गिरती क्रय शक्ति, पर्यावरण संरक्षण और सुस्त अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने जैसे अहम मुद्दों पर दोनों पक्षों की नीतियां एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत थीं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव का परिणाम आने वाले दशकों तक ब्राजील के आंतरिक ढांचे को प्रभावित करेगा। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ब्राजील के सर्वोच्च न्यायालय में कुल 11 न्यायाधीश होते हैं और अगले कार्यकाल के दौरान 4 न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने वाले हैं। अब दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद लूला दा सिल्वा को सुप्रीम कोर्ट की इन 4 रिक्त सीटों पर नए न्यायाधीशों को मनोनीत करने का सीधा संवैधानिक अधिकार मिल जाएगा। देश की न्यायपालिका का यह पुनर्गठन ब्राजील में पर्यावरण सुरक्षा, मानवाधिकारों और सामाजिक न्याय से जुड़े कानूनों को एक नई स्थिरता प्रदान करेगा। फिलहाल देश भर में कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सुरक्षा बलों को अलर्ट मोड पर रखा गया है ताकि बोल्सोनारो समर्थकों के संभावित उपद्रव से निपटा जा सके।