महीने का खर्च देखकर खुद सहम गई कॉर्पोरेट गर्ल, हिसाब निकाला तो उड़े होश: रेंट से लेकर कैब तक, कहां गई सैलरी?
आज के दौर में मेट्रो शहरों में कॉर्पोरेट नौकरी करना बाहर से जितना ग्लैमरस और आकर्षक दिखता है, हकीकत की जमीन पर इसकी कीमत उतनी ही भारी चुकानी पड़ती है। हर महीने खाते में आने वाली छह अंकों या मोटी सैलरी महीने के 30 दिन पूरे होने से पहले ही कहां गायब हो जाती है, यह हर दूसरे कॉर्पोरेट प्रोफेशनल का सबसे बड़ा दर्द बन चुका है। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक कामकाजी युवती (कॉर्पोरेट गर्ल) की आपबीती जमकर वायरल हो रही है, जिसने पूरे महीने के बाद जब अपने बैंक स्टेटमेंट और क्रेडिट कार्ड के बिल का पाई-पाई हिसाब निकाला, तो वह खुद बुरी तरह सहम गई। उसकी सैलरी का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सिर्फ बुनियादी जरूरतों, दिखावे और महानगर की महंगी लाइफस्टाइल को मेंटेन करने में स्वाहा हो चुका था।
फ्लैट का भारी-भरकम किराया और मेंटेनेंस ले गया सैलरी का बड़ा हिस्सा
हिसाब लगाने बैठी युवती ने जब सबसे पहले अपने फिक्स्ड खर्चों की लिस्ट बनाई, तो उसमें सबसे बड़ा डेंट मकान के किराए ने मारा था। बेंगलुरु, मुंबई और गुरुग्राम जैसे तकनीकी और कॉर्पोरेट हब में ऑफिस के नजदीक 1BHK या शेयर्ड 2BHK फ्लैट का किराया ही 25,000 से 40,000 रुपये के बीच पहुंच जाता है। इसके ऊपर से सोसाइटी का भारी-भरकम मेंटेनेंस चार्ज, पानी और बिजली का बिल जोड़कर लगभग 35 से 45 हजार रुपये महीने की शुरुआत में ही खाते से उड़ गए। युवती ने साझा किया कि ऑफिस के ट्रैफिक से बचने के लिए वर्कप्लेस के पास रहना मजबूरी बन जाता है, लेकिन वहां के मकान मालिक हर साल जिस तरह किराया बढ़ाते हैं, उसने बचत की सारी गुंजाइश खत्म कर दी है।
रोज की कैब राइड्स और ऑनलाइन फूड डिलीवरी का खामोश जाल
किराए के बाद जिस चीज ने बजट को सबसे ज्यादा बिगाड़ा, वह थी रोजमर्रा की कन्विनियंस यानी आराम की आदत। ऑफिस जाने-आने के लिए पीक आवर्स में बुक की जाने वाली कैब और ऑटो के सर्ज प्राइजिंग ने महीने भर में 10,000 से 12,000 रुपये का चूना लगा दिया। इसके अलावा, देर रात तक चलने वाली शिफ्ट्स और काम के भारी तनाव के कारण खाना बनाने का वक्त या ऊर्जा न बचने पर हर दूसरे दिन ऑनलाइन फूड डिलीवरी ऐप्स से ऑर्डर करना आम दिनचर्या बन गया था। महीने भर में पिज्जा, बर्गर, हेल्दी सलाद और रोज की दो कप कैफे वाली कॉफी का बिल जब सामने आया, तो वह 15,000 रुपये से भी ऊपर निकल चुका था। युवती ने स्वीकार किया कि 200-300 रुपये के छोटे-छोटे ऑर्डर्स पूरे महीने में इतना बड़ा पहाड़ बन जाएंगे, इसका अंदाजा उसे कभी नहीं था।
वीकेंड पार्टी, ग्रूमिंग और ईएमआई के चक्रव्यूह में फंसी सेविंग्स
सिर्फ खाना और किराया ही नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट कल्चर का हिस्सा बन चुके वीकेंड हैंगआउट्स और खुद को प्रेजेंटेबल रखने का खर्च भी बजट पर भारी पड़ा। हर शुक्रवार या शनिवार को कलीग्स और दोस्तों के साथ पब या कैफे में डिनर और ड्रिंक्स के नाम पर एक ही झटके में 4,000 से 5,000 रुपये खर्च हो जाते थे। इसके अलावा महंगे जिम की मेंबरशिप, स्किनकेयर और कपड़े खरीदने के शौक ने क्रेडिट कार्ड के बिल को आसमान पर पहुंचा दिया। जब महीने की आखिरी तारीख को सैलरी अकाउंट चेक किया गया, तो पूरी मेहनत की कमाई खत्म हो चुकी थी और खाते में केवल इमरजेंसी फंड के नाम पर चंद हजार रुपये बचे थे।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस, हजारों युवाओं ने बयां किया अपना दर्द
इस युवती का बजट ब्रेकडाउन इंटरनेट पर आते ही हजारों कॉर्पोरेट कर्मचारियों और युवाओं ने इस पर अपनी सहमति जताई है। कमेंट सेक्शन में लोगों का कहना है कि आज के दौर में महंगाई और 'लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन' ने युवाओं को एक ऐसे दलदल में धकेल दिया है, जहां वे केवल कमाने और खर्च करने की मशीन बनकर रह गए हैं। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि महानगरों में रहने वाले प्रोफेशनल्स को 50-30-20 के बेसिक नियम (50% जरूरत, 30% शौक और 20% अनिवार्य बचत) का पालन करना चाहिए, वरना बिना किसी फाइनेंशियल प्लानिंग के कॉर्पोरेट की ऊंची तनख्वाह भी महीने के अंत में जेब खाली ही छोड़ेगी।