मां हाउसवाइफ है या वर्किंग? स्कूल तय कर रहे बच्चे का भविष्य! बेंगलुरु के प्राइवेट स्कूलों पर उठे गंभीर सवाल

मां हाउसवाइफ है या वर्किंग? स्कूल तय कर रहे बच्चे का भविष्य! बेंगलुरु के प्राइवेट स्कूलों पर उठे गंभीर सवाल

भारत की सिलिकॉन वैली कहे जाने वाले बेंगलुरु में प्राइवेट स्कूलों की एडमिशन प्रक्रिया एक बार फिर गंभीर विवादों के घेरे में आ गई है। तीन से चार साल के मासूम बच्चों को नर्सरी, एलकेजी या यूकेजी में दाखिला दिलाने निकले अभिभावकों को इन दिनों ऐसे कड़वे अनुभवों से गुजरना पड़ रहा है, जिसने आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। शहर के कई नामी कॉन्वेंट और इंटरनेशनल स्कूलों में बच्चे की मानसिक क्षमता या उम्र देखने से पहले मां के प्रोफेशन और उसके करियर स्टेटस को एडमिशन का मुख्य पैमाना बनाया जा रहा है। स्थिति यह हो गई है कि मां अगर नौकरीपेशा (वर्किंग) है, तो भी सवाल उठते हैं और अगर वह पूर्णकालिक गृहिणी (हाउसवाइफ) है, तो भी बच्चे के एडमिशन पर तलवार लटक जाती है। अभिभावकों के इस दर्द ने अब सोशल मीडिया से लेकर शिक्षा विभाग के गलियारों तक एक नई बहस छेड़ दी है।

बच्चे का टैलेंट दरकिनार: मां के करियर स्टेटस से तय हो रहा है दाखिला

हाल के दिनों में बेंगलुरु के कई प्रमुख इलाकों जैसे कोरमंगला, इंदिरानगर, व्हाइटफील्ड और सरजापुर के नामी स्कूलों में एडमिशन इंटरव्यू के दौरान अजीबोगरीब ट्रेंड देखने को मिला है। कई अभिभावकों ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि स्कूल प्रबंधन ने एडमिशन फॉर्म में केवल बच्चे की बुनियादी जानकारी नहीं मांगी, बल्कि मां की शैक्षणिक योग्यता, उसका मौजूदा डेजिग्नेशन, कंपनी का नाम और उसके काम के घंटों की विस्तृत जानकारी तलब की।

हद तो तब हो गई जब कई इंटरव्यू पैनल्स में मां से सीधे तौर पर यह सवाल पूछा गया कि यदि वह 9 से 10 घंटे की कॉरपोरेट जॉब करती हैं, तो वे बच्चे के होमवर्क, स्कूल प्रोजेक्ट्स और सह-शैक्षणिक गतिविधियों (एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज) के लिए समय कैसे निकालेंगी। वहीं दूसरी तरफ, जो महिलाएं उच्च शिक्षित होने के बावजूद परिवार संभालने के लिए हाउसवाइफ बनी हैं, उनसे यह सवाल किया जाता है कि क्या वे आधुनिक अंग्रेजी पाठ्यक्रम और डिजिटल असाइनमेंट्स को समझने और बच्चे को गाइड करने में सक्षम होंगी। यानी मां चाहे घर संभाले या दफ्तर, दोनों ही स्थितियों में उसके बच्चे के एडमिशन को खारिज करने का बहाना ढूंढ लिया जाता है।

आखिर क्यों बच्चों का बोझ मां के कंधों पर डालना चाहते हैं स्कूल?

इस पूरे विवाद के पीछे स्कूलों की 'अकादमिक आउटसोर्सिंग' की प्रवृत्ति को सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। शिक्षा विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि आजकल के अधिकांश प्रीमियम और महंगे निजी स्कूल बच्चों को पढ़ाने की पूरी जिम्मेदारी खुद लेने के बजाय उसे घर पर माता-पिता के ऊपर डालना चाहते हैं। स्कूल ऐसे परिवार चाहते हैं जहां मां या तो अंशकालिक काम करती हो या फिर चौबीसों घंटे बच्चे की पढ़ाई और स्कूल के भारी-भरकम प्रोजेक्ट्स को पूरा कराने के लिए घर पर उपलब्ध रहे।

इसके पीछे स्कूलों की सोच यह रहती है कि अगर घर पर मां बच्चे को पूरा समय देकर पढ़ाएगी, तो स्कूल के परीक्षा परिणाम बेहतर रहेंगे और स्कूल की अपनी मेहनत कम लगेगी। जब मां वर्किंग होती है, तो स्कूल प्रबंधन को लगता है कि उन्हें बच्चे पर अतिरिक्त व्यक्तिगत ध्यान देना पड़ेगा, जिसे वे 'अतिरिक्त बोझ' मानते हैं। शिक्षा का यह बाजारीकरण बच्चों को सीखने का माहौल देने के बजाय उनके घरों को एक मिनी-कोचिंग सेंटर में बदलने की मांग कर रहा है।

सोशल मीडिया पर फूटा अभिभावकों का गुस्सा: 'क्या मां का करियर एक अभिशाप है?'

बेंगलुरु के एक टेक प्रोफेशनल ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) और रेडिट पर अपने अनुभव को साझा करते हुए लिखा कि एक प्रतिष्ठित स्कूल ने केवल इसलिए उनके 4 साल के बेटे का एडमिशन रोक दिया क्योंकि मां एक टेक कंपनी में सीनियर लीडरशिप रोल में है। स्कूल के प्रिंसिपल ने तर्क दिया कि बच्चे के शुरुआती विकास के लिए मां का घर पर रहना जरूरी है। इस पोस्ट के वायरल होते ही सैकड़ों अभिभावक अपने अनुभव साझा करने लगे।

कई महिलाओं ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि एक तरफ समाज और सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने, कॉरपोरेट लीडरशिप में आगे आने और अर्थव्यवस्था में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करती है, वहीं दूसरी तरफ शहर के तथाकथित प्रगतिशील स्कूल महिलाओं के काम करने को उनके बच्चों की पढ़ाई में बाधा मानकर उन्हें अपराधी जैसा महसूस कराते हैं। कई महिला प्रोफेशनल्स ने सवाल उठाया कि क्या 21वीं सदी में भी बच्चों के पालन-पोषण और पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी केवल मां के सिर पर मढ़ना पितृसत्तात्मक और संकीर्ण मानसिकता का सबूत नहीं है? बच्चे के पिता के समय और जिम्मेदारियों को लेकर ऐसे सवाल इंटरव्यू में क्यों नहीं पूछे जाते?

कानून क्या कहता है: क्या स्कूलों को पैरेंट्स का इंटरव्यू लेने का अधिकार है?

शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act, 2009) की धारा 13 के अनुसार, किसी भी मान्यता प्राप्त स्कूल को एडमिशन प्रक्रिया के दौरान किसी भी प्रकार की 'स्क्रीनिंग प्रक्रिया' (Screening Procedure) अपनाने या बच्चों और उनके माता-पिता का इंटरव्यू लेने की सख्त मनाही है। कानून के मुताबिक शुरुआती कक्षाओं में दाखिला बिना किसी भेदभाव, इंटरव्यू या स्क्रीनिंग टेस्ट के लॉटरी सिस्टम या सामान्य आवेदन के जरिए होना चाहिए।

इसके बावजूद बेंगलुरु समेत देश के कई बड़े महानगरों में निजी स्कूल 'अनौपचारिक बातचीत' (Casual Interaction) के नाम पर माता-पिता का विस्तृत इंटरव्यू लेते हैं। इस दौरान अभिभावकों की पारिवारिक आय, उनका लाइफस्टाइल, अंग्रेजी बोलने का लहजा और मां का पेशा आंका जाता है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह सीधे तौर पर आरटीई अधिनियम और बच्चों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन है। यदि कोई स्कूल मां के करियर या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर बच्चे को दाखिला देने से इनकार करता है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) का खुला हनन है।

शिक्षा विभाग से सख्त कार्रवाई और गाइडलाइंस की मांग

बढ़ते विवाद को देखते हुए बेंगलुरु के पैरेंट्स एसोसिएशंस ने कर्नाटक प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा विभाग से तत्काल हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है। अभिभावक संघों का कहना है कि शिक्षा विभाग को निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगाने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने चाहिए। किसी भी स्कूल को माता-पिता के व्यक्तिगत करियर चॉइस पर टिप्पणी करने या उसके आधार पर बच्चे का भविष्य तय करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। अभिभावकों की मांग है कि एडमिशन केवल पारदर्शी नियमों और पड़ोस के स्कूल (नेबरहुड क्राइटेरिया) के आधार पर हों, ताकि शिक्षा के नाम पर चल रही इस मानसिक प्रताड़ना और दोहरे मापदंड को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।