यूपी में 100 से ज्यादा बीजेपी विधायकों का कट सकता है टिकट, 2024 वाली गलती से सबक

यूपी में 100 से ज्यादा बीजेपी विधायकों का कट सकता है टिकट, 2024 वाली गलती से सबक

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जमीनी स्तर पर अपनी व्यापक चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। हालिया मीडिया रिपोर्ट्स और पार्टी के उच्चस्तरीय आंतरिक आकलनों के अनुसार, प्रदेश के करीब 100 से अधिक मौजूदा विधायकों के टिकट कटने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। पार्टी संगठन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा कराए गए गोपनीय सर्वे में यह बात सामने आई है कि कई सीटों पर मौजूदा विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर भारी सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) सक्रिय है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में बीजेपी के पास 255 सीटें हैं। इनमें से लगभग 100 सीटों पर विधायकों का जनता के बीच जनाधार कमजोर पाया गया है, जबकि कई जनप्रतिनिधियों का स्थानीय संगठन पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से गंभीर मतभेद चल रहा है। ऐसे में पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने साफ संकेत दे दिया है कि इस बार टिकट केवल वरिष्ठता या रसूख के दम पर नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से 'जीत की संभावना' (Winnability) के कड़े पैमाने पर ही तय किया जाएगा।

2024 के लोकसभा चुनाव से लिया बड़ा सबक: अति-विश्वास की पुनरावृत्ति नहीं

बीजेपी की इस सख्त घेराबंदी की सबसे बड़ी वजह 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम हैं। 2019 के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से अकेले 62 सीटें जीतने वाली बीजेपी 2024 में सिमटकर महज 33 सीटों पर आ गई थी। उस दौरान पार्टी ने 49 मौजूदा सांसदों को दोबारा चुनावी मैदान में उतारा था, जिनमें से 27 सांसदों को हार का मुंह देखना पड़ा था।

लोकसभा चुनाव में कई कद्दावर नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों की हार ने आलाकमान को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि जनता में मौजूदा जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी को नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है। उस वक्त टिकट वितरण में स्थानीय असंतोष और कार्यकर्ताओं की अनदेखी को मुख्य कमजोरी माना गया था। यही कारण है कि आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी दिल्ली या लखनऊ के किसी भी नेता की व्यक्तिगत सिफारिश के बजाय ग्राउंड रिपोर्ट और निष्पक्ष डेटा पर दांव लगाने की नीति पर काम कर रही है।

10 साल की एंटी-इनकंबेंसी और संगठन से टकराव बना मुख्य कारण

उत्तर प्रदेश में बीजेपी लगातार दो कार्यकालों से सत्ता में है। ऐसे में बड़ी संख्या में ऐसे विधायक हैं जो बीते 10 वर्षों से अपनी सीट पर लगातार काबिज हैं। लंबे समय तक पद पर बने रहने के कारण कई क्षेत्रों में मतदाताओं के बीच स्वाभाविक ऊब और असंतोष का माहौल देखा जा रहा है।

इसके साथ ही, सर्वे रिपोर्ट में यह भी उजागर हुआ है कि कई विधायक अपने क्षेत्र में कार्यकर्ताओं के सुख-दुख से कट चुके हैं और स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर मनमानी कर रहे हैं। बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं की नाराजगी सीधे तौर पर वोट ट्रांसफर और पोलिंग प्रतिशत को प्रभावित करती है। आरएसएस और स्वतंत्र एजेंसियों की रिपोर्ट में जिन विधायकों के बारे में 'जनता और संगठन दोनों से संवादहीनता' का इनपुट मिला है, उन्हें सुरक्षित जोन से बाहर कर दिया गया है।

युवाओं, महिलाओं और नए चेहरों को मिलेगा मौका

पुराने और अलोकप्रिय चेहरों की जगह पार्टी इस बार व्यापक बदलाव की तैयारी में है। राजनीति में युवाओं और 'जेन-जी' (Gen-Z) मतदाताओं की बढ़ती निर्णायक भूमिका को ध्यान में रखते हुए बीजेपी नए, ऊर्जावान और बेदाग छवि वाले युवा कार्यकर्ताओं को चुनावी मैदान में उतारने का मन बना रही है। इसके अलावा महिला आरक्षण और आधी आबादी के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए महिलाओं को भी बड़ी तादाद में टिकट दिए जाने की योजना है।

हालांकि, पार्टी के रणनीतिकारों का यह भी स्पष्ट कहना है कि केवल कई बार विधायक रहने भर से किसी का टिकट नहीं काटा जाएगा। यदि किसी वरिष्ठ विधायक ने क्षेत्र में जनता के बीच अपनी गहरी पैठ, संवाद और जीत की गारंटी बरकरार रखी है, तो उसके अनुभव को पूरा सम्मान दिया जाएगा। यानी टिकट वितरण की एकमात्र शर्त जमीनी स्वीकार्यता और जीत का समीकरण ही होगी।

सामाजिक समीकरण और विपक्ष की 'PDA' रणनीति का मुकाबला

बीजेपी के सामने इस बार सत्ता विरोधी लहर से निपटने के साथ-साथ सामाजिक संतुलन साधने की भी दोहरी चुनौती है। 2024 के चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और संविधान के विमर्श के जरिए गैर-यादव ओबीसी और दलित मतों में सेंध लगाई थी। वहीं कुछ सीटों पर सवर्ण मतदाताओं के छिटकने के संकेत भी मिले थे।

इस जटिल सामाजिक ताने-बाने को साधने के लिए बीजेपी टिकटों की नई सूची में हर वर्ग का संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेगी। गैर-यादव ओबीसी, अति-दलित, प्रबुद्ध वर्ग और व्यापारी समाज के बीच नए व प्रभावशाली चेहरों को आगे लाकर विपक्ष के जातिगत ध्रुवीकरण को कुंद करने की योजना पर काम चल रहा है। आने वाले दिनों में जब सर्वे के अंतिम चरण के आंकड़े सामने आएंगे, तो यूपी बीजेपी के सियासी गलियारे में टिकटों के बड़े फेरबदल की औपचारिक तस्वीर और साफ हो जाएगी।