यूपी में मिश्रा और मसूद पर कांग्रेस का बड़ा दांव, 'BMW' फॉर्मूले से सत्ता में वापसी की तैयारी

यूपी में मिश्रा और मसूद पर कांग्रेस का बड़ा दांव, 'BMW' फॉर्मूले से सत्ता में वापसी की तैयारी

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस आलाकमान ने संगठन में अचानक बड़ा बदलाव कर सबको चौंका दिया है। पार्टी ने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय राय की जगह रामपुर खास से लगातार तीन बार की विधायक और कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा 'मोना' को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है। इसके साथ ही पश्चिमी यूपी के कद्दावर नेता और सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। संगठन को सामाजिक संतुलन देने के लिए देविंदर निषाद (ओबीसी) और आलोक प्रसाद (दलित) को वरिष्ठ उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

कांग्रेस का यह कदम राज्य की सियासत में 'बीएमडब्ल्यू' (B-M-W यानी ब्राह्मण, मुस्लिम और महिला) समीकरण को धार देने की सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है। लगभग 15 साल बाद कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में किसी ब्राह्मण महिला चेहरे पर भरोसा जताया है; इससे पहले 2007 से 2012 के दौरान रीता बहुगुणा जोशी प्रदेश अध्यक्ष रही थीं।

क्या है कांग्रेस का 'BMW' मॉडल और क्यों चला यह कार्ड?

उत्तर प्रदेश के सियासी दंगल में कांग्रेस दशकों से अपने पुराने सामाजिक आधार को फिर से जीवित करने की कोशिश में है। 'बीएमडब्ल्यू' मॉडल के जरिए पार्टी ने तीन बड़े वर्गों को एक साथ साधने का लक्ष्य रखा है:

  • B (ब्राह्मण): राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा को आगे कर कांग्रेस प्रदेश के प्रबुद्ध वर्ग विशेषकर ब्राह्मण वोटरों में सेंध लगाना चाहती है। राजनीतिक हलकों में लंबे समय से यह चर्चा रही है कि ब्राह्मण समुदाय भाजपा से अपनी उपेक्षा को लेकर असहज है और ऐसे में कांग्रेस एक मजबूत विकल्प के तौर पर खुद को पेश करना चाहती है।

  • M (मुस्लिम): सहारनपुर सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक को सीधा पैगाम दिया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं का कांग्रेस के प्रति सकारात्मक रुझान देखने को मिला था, और इमरान मसूद की नियुक्ति से पश्चिमी यूपी सहित पूरे प्रदेश के अल्पसंख्यकों में पकड़ मजबूत होने की उम्मीद है।

  • W (महिला): उत्तर प्रदेश की आधी आबादी पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कानून-व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाओं की मजबूत पकड़ रही है। प्रियंका गांधी के 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' अभियान का प्रमुख चेहरा रहीं आराधना मिश्रा को कमान देकर कांग्रेस महिला मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

क्या 'BMW' के दम पर हो पाएगी कांग्रेस की वापसी?

कागजी समीकरणों पर यह फॉर्मूला जितना संतुलित नजर आता है, जमीनी हकीकत उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। उत्तर प्रदेश में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) के बीच केंद्रित रहा है। ऐसे में कांग्रेस के सामने कई अहम सवाल खड़े हैं:

  1. सपा के साथ गठबंधन और खींचतान: इमरान मसूद और समाजवादी पार्टी के बीच अतीत में जुबानी तल्खी रही है। हालांकि आराधना मिश्रा और उनके पिता प्रमोद तिवारी के सपा नेतृत्व से मधुर संबंध हैं। कांग्रेस अक्टूबर के भीतर ही सपा से सम्मानजनक सीट बंटवारे की उम्मीद कर रही है, लेकिन संगठन विस्तार के साथ दोनों दलों के बीच सीटों की सौदेबाजी कितनी आसान होगी, यह देखना बाकी है।

  2. जमीनी संगठन का अभाव: किसी भी फॉर्मूले को वोट में तब्दील करने के लिए बूथ स्तर पर मजबूत कार्यकर्ताओं की फौज चाहिए, जिसकी यूपी में कांग्रेस के पास भारी कमी रही है। नए नेतृत्व के सामने सबसे पहली चुनौती जिला और ब्लॉक स्तर पर बिखरे संगठन को दोबारा खड़ा करने की होगी।

2027 के रण की बिसात: नरम और गरम तेवर का संतुलन

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आराधना मिश्रा के रूप में सौम्य, संसदीय और वैधानिक अनुभव वाला नेतृत्व और इमरान मसूद के रूप में आक्रामक, जननेता का चेहरा देकर कांग्रेस ने नरम-गरम दोनों तेवरों का संतुलन साधा है। यदि यह तिकड़ी—ब्राह्मण, मुस्लिम और महिला—कांग्रेस की ओर आंशिक रूप से भी आकर्षित होती है, तो यह न केवल कांग्रेस के लिए संजीवनी बनेगी बल्कि उत्तर प्रदेश के पूरे चुनावी परिदृश्य को त्रिकोणीय या नए ध्रुवीकरण की ओर मोड़ सकती है।